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अध्याय 20 · अंतिम मौन
अष्टावक्र गीता, श्लोक 20.7
समीक्षा आवश्यक
मूल संस्कृत
क्व सृष्टिः क्व च संहारः क्व साध्यं क्व च साधनम् । क्व साधकः क्व सिद्धिर्वा स्वस्वरूपेऽहमद्वये ॥ ७ ॥
IAST लिप्यंतरण
kva sṛṣṭiḥ kva ca saṃhāraḥ kva sādhyaṃ kva ca sādhanam | kva sādhakaḥ kva siddhir vā svasvarūpe'ham advaye || 7 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
क्व, सृष्टिः, क्व, च, संहारः, क्व, साध्यम्, क्व, च, साधनम्, क्व, साधकः, क्व, सिद्धिः, वा, स्व-स्वरूपे, अहम्, अद्वये
- क्व सृष्टिः क्व संहारः
- रचना कहाँ, संहार कहाँ
- क्व साध्यम् क्व साधनम्
- लक्ष्य कहाँ, साधन कहाँ
- क्व साधकः क्व सिद्धिः
- साधक कहाँ, सिद्धि कहाँ
- स्व-स्वरूपे अहम् अद्वये
- मैं अपने अद्वय स्वरूप में
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
अपने अद्वय स्वरूप में मैं हूँ। वहाँ सृष्टि कहाँ, संहार कहाँ, साध्य कहाँ, साधन कहाँ, साधक कहाँ और सिद्धि कहाँ?
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
सृष्टि और संहार के बड़े शब्द साधना के छोटे शब्दों से जा मिलते हैं। साधक और सिद्धि भी वही प्रश्न हैं। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया।
सरल हिन्दी में समझें
दुनिया बनती और मिटती है। साधना में भी लक्ष्य, तरीका, करने वाला और सफलता होती है।
अष्टावक्र दोनों स्तर एक श्लोक में पूछते हैं।
आज की योजना और उसका ईमानदार प्रयास इस प्रश्न से व्यर्थ नहीं होता। व्यर्थ होता है सिद्धि को अपनी पहचान बनाना।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. सृष्टि और संहार ब्रह्मांड के दो सिरे हैं। 2. साध्य और साधन अनुशासन की जोड़ी हैं। 3. साधक और सिद्धि व्यक्ति और फल हैं। 4. अद्वय फिर वही धुरी है जो 20.6 में थी। 5. प्रश्न अभ्यास की उपयोगिता नहीं काटता। 6. फल की लालसा ही यहाँ पूछी गई है।
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है।
उदाहरण से समझें: जैसे तीरंदाज निशाना देखता है और निशाना लगने के बाद भी अपना नाम आकाश में नहीं लिखता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
कोई व्यक्ति योजना बनाकर काम खत्म करता है, फिर सफलता को अपनी जीवनी का एकमात्र वाक्य नहीं बनाता। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: साधन रखें और काम पूरा करें। सिद्धि को अपना चेहरा न बनाएँ।
सामान्य गलतफहमी
क्व सिद्धिः का अर्थ प्रयास छोड़कर निष्क्रिय हो जाना नहीं है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज एक छोटा लक्ष्य पूरा करें और पूरा होते ही अगली प्रशंसा की प्रतीक्षा बंद करें। (काम के बाद)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या साधक या सिद्ध की पहचान मेरे काम से बड़ी हो गई है?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठें। फिर आज का एक साधन, एक छोटा काम, बिना फल की कहानी के पूरा करें।
एक पंक्ति में सार: अद्वय स्वरूप में सृष्टि, संहार, साध्य, साधन, साधक और सिद्धि कहाँ हैं?
English
Translation: Where are creation and dissolution, the end and the means, the seeker and success? I am in my own nondual nature.
Simple explanation: Cosmic and personal achievement are questioned together. Honest work remains.
विषय और संबंधित श्लोक
- सृष्टि-संहार
- साध्य-साधन
- साधक-सिद्धि
- अद्वय
- श्लोक 20.6: क्व लोकं क्व मुमुक्षु
- श्लोक 20.8: क्व प्रमाता प्रमाणं
स्रोत और सत्यापन
समीक्षा आवश्यक
संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के विंश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक।