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अध्याय 20 · अंतिम मौन
अष्टावक्र गीता, श्लोक 20.8
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मूल संस्कृत
क्व प्रमाता प्रमाणं वा क्व प्रमेयं क्व च प्रमा । क्व किञ्चित् क्व न किञ्चिद् वा सर्वदा विमलस्य मे ॥ ८ ॥
IAST लिप्यंतरण
kva pramātā pramāṇaṃ vā kva prameyaṃ kva ca pramā | kva kiñcit kva na kiñcid vā sarvadā vimalasya me || 8 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
क्व, प्रमाता, प्रमाणम्, वा, क्व, प्रमेयम्, क्व, च, प्रमा, क्व, किञ्चित्, क्व, न, किञ्चित्, वा, सर्वदा, विमलस्य, मे
- क्व प्रमाता क्व प्रमाणम्
- जानने वाला कहाँ, प्रमाण कहाँ
- क्व प्रमेयम् क्व प्रमा
- ज्ञेय कहाँ, ज्ञान कहाँ
- क्व किञ्चित् क्व न किञ्चित्
- कुछ कहाँ, कुछ भी नहीं कहाँ
- सर्वदा विमलस्य मे
- सदा निर्मल मेरे लिए
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
सदा निर्मल मेरे लिए प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमा कहाँ, कुछ कहाँ और कुछ भी नहीं कहाँ?
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
ज्ञान की चार संज्ञाएँ एक पंक्ति में हैं। दूसरी पंक्ति कुछ और कुछ-नहीं दोनों को पूछती है, ताकि शून्य भी मत न बन जाए। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया।
सरल हिन्दी में समझें
कौन जानता है, किस प्रमाण से, क्या जाना गया, और जानना स्वयं क्या है। दर्शन इन चार को अलग करता है।
अष्टावक्र चारों पूछते हैं, और साथ ही कुछ तथा कुछ-नहीं भी।
हिसाब रखना, पढ़ना और सच बोलना बंद नहीं होता। बंद होती है यह ज़िद कि जानने वाला ही मेरा स्वरूप है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमा ज्ञान का चौकठा हैं। 2. चारों एक श्लोक में आने से चौकठा पूरा पूछा गया है। 3. किञ्चित् और न किञ्चित् होने और शून्य के दो मत हैं। 4. विमल मैल या पक्ष से रहित कहता है। 5. सर्वदा वर्णन है, हर क्षण का प्रदर्शन नहीं। 6. सत्य बोलना और प्रमाण देखना व्यवहार में रहता है।
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है।
उदाहरण से समझें: जैसे दीपक घड़ा, आँख और देखना चार कहानी सुनाता है, और प्रकाश उन चार नामों से अलग नहीं बिकता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
कोई व्यक्ति स्रोत जाँचता है और फिर भी अपने आपको केवल जानने वाले के पद पर नहीं बिठाता। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: प्रमाण देखें और सच कहें। जानने वाले के पद को अपनी आत्मा न बनाएँ।
सामान्य गलतफहमी
क्व प्रमाणं का अर्थ सब दावे बराबर मान लेना या झूठ को ज्ञान कहना नहीं है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज एक बात का स्रोत देखें, और देखकर यह गर्व न जोड़ें कि आप जानने वाले हैं। (पढ़ते समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं जानने वाले बनने की पहचान में ही अटका हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट बिना नया सिद्धान्त जोड़े बैठें। फिर एक साधारण सच, जो आज कहना है, शांत होकर कहें।
एक पंक्ति में सार: निर्मल मेरे लिए जानने वाला, प्रमाण, ज्ञेय, ज्ञान, कुछ और कुछ-नहीं कहाँ हैं?
English
Translation: Where are the knower, the means, the object, and knowing, where something or nothing, for me who am always clear?
Simple explanation: The whole frame of knowledge is questioned, including the claim that nothing exists. Truth-telling remains.
विषय और संबंधित श्लोक
- प्रमाता-प्रमाण
- प्रमेय-प्रमा
- किञ्चित्
- विमल
- श्लोक 20.7: क्व सृष्टिः क्व च
- श्लोक 20.9: क्व विक्षेपः क्व चैकाग्र्यं
स्रोत और सत्यापन
समीक्षा आवश्यक
संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के विंश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक।