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अध्याय 20 · अंतिम मौन
अष्टावक्र गीता, श्लोक 20.9
समीक्षा आवश्यक
मूल संस्कृत
क्व विक्षेपः क्व चैकाग्र्यं क्व निर्बोधः क्व मूढता । क्व हर्षः क्व विषादो वा सर्वदा निष्क्रियस्य मे ॥ ९ ॥
IAST लिप्यंतरण
kva vikṣepaḥ kva caikāgryaṃ kva nirbodhaḥ kva mūḍhatā | kva harṣaḥ kva viṣādo vā sarvadā niṣkriyasya me || 9 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
क्व, विक्षेपः, क्व, च, एकाग्र्यम्, क्व, निर्बोधः, क्व, मूढता, क्व, हर्षः, क्व, विषादः, वा, सर्वदा, निष्क्रियस्य, मे
- क्व विक्षेपः क्व एकाग्र्यम्
- भटकना कहाँ, एकाग्रता कहाँ
- क्व निर्बोधः क्व मूढता
- न जानना कहाँ, मूढ़ता कहाँ
- क्व हर्षः क्व विषादः
- हर्ष कहाँ, विषाद कहाँ
- सर्वदा निष्क्रियस्य मे
- सदा निष्क्रिय मेरे लिए
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
सदा निष्क्रिय मेरे लिए विक्षेप कहाँ, एकाग्रता कहाँ, निर्बोध कहाँ, मूढ़ता कहाँ, हर्ष कहाँ और विषाद कहाँ?
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
हर्ष और विषाद मन के दो छोर हैं। अष्टावक्र उन्हें एकाग्रता और मूढ़ता के साथ पूछते हैं। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया। विषाद घेर ले तो यह श्लोक सहायता का विकल्प नहीं है।
सरल हिन्दी में समझें
मन कभी भटकता है, कभी एक जगह चिपकता है। कभी हर्ष होता है, कभी विषाद।
अष्टावक्र कहते हैं कि ये अवस्थाएँ शांति की मालकिन नहीं हैं।
विषाद को नकारकर चुप रहना, या हर्ष के नाम पर दूसरों की पीड़ा न देखना, इस श्लोक में नहीं है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. विक्षेप और एकाग्र्य ध्यान की प्रचलित जोड़ी हैं। 2. निर्बोध और मूढता ज्ञान के अभाव के नाम हैं। 3. हर्ष और विषाद रस के दो छोर हैं। 4. निष्क्रियस्य मे करने की धुन से हटा वर्णन है। 5. विषाद का प्रश्न इलाज से इनकार नहीं है। 6. यदि हानि का विचार आए तो सहायता-सेवा पहले है।
तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है।
उदाहरण से समझें: जैसे आकाश में धूप और छाया दोनों आते हैं और आकाश न धूप होता है न छाया। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
कोई व्यक्ति खुशी मनाता है और उदासी में किसी से बात भी करता है, पर दोनों को अपनी पूरी पहचान नहीं बनाता। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: हर्ष और विषाद को नाम दें। विषाद घेर ले तो सहायता माँगें। उसे आध्यात्मिक ऊँचाई मत कहें।
सामान्य गलतफहमी
क्व विषादः का अर्थ उदासी में अकेले पड़े रहना या सहायता-सेवा से न बोलना नहीं है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज यदि मन भारी हो तो एक विश्वसनीय व्यक्ति को एक वाक्य भेजें। हल्का हो तो भी एक काम शांत होकर करें। (मन भारी हो तो)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं विषाद को या तो छिपा रहा हूँ या उसे अपनी पहचान बनाए बैठा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट साँस गिनें। मन हानि की ओर जाए तो तुरंत आँख खोलें और सहायता के लिए किसी को बताएँ।
एक पंक्ति में सार: निष्क्रिय मेरे लिए भटकना, एकाग्रता, मूढ़ता, हर्ष और विषाद कहाँ हैं?
English
Translation: Where are distraction and concentration, unknowing and dullness, joy and sorrow, for me who am always without that striving?
Simple explanation: Joy and sorrow are both questioned. Sorrow that closes in still calls for help.
विषय और संबंधित श्लोक
- विक्षेप-एकाग्र्य
- हर्ष-विषाद
- निष्क्रिय
- सहायता
- श्लोक 20.8: क्व प्रमाता प्रमाणं
- श्लोक 20.10: क्व चैष व्यवहारो
स्रोत और सत्यापन
समीक्षा आवश्यक
संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के विंश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक।