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प्रकरण 20: बीसवाँ प्रकरणश्लोक १०/१४71%

अध्याय 20 · अंतिम मौन

अष्टावक्र गीता, श्लोक 20.10

समीक्षा आवश्यक

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

क्व चैष व्यवहारो वा क्व च सा परमार्थता । क्व सुखं क्व च वा दुखं निर्विमर्शस्य मे सदा ॥ १० ॥

[पृष्ठ से सत्यापन आवश्यक] पुस्तक के छपे पाठ में भेद मिला है; नीचे “स्रोत और सत्यापन” देखें। पाठ को पुस्तक में जैसा छपा है वैसा ही रखा गया है।

IAST लिप्यंतरण

kva caiṣa vyavahāro vā kva ca sā paramārthatā | kva sukhaṃ kva ca vā dukhaṃ nirvimarśasya me sadā || 10 ||

सरल उच्चारण: kva chaisha vyavahaaro vaa kva cha saa paramaarthataa kva sukham kva cha vaa dukham nirvimarshasya me sadaa (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

क्व, च, एषः, व्यवहारः, वा, क्व, च, सा, परमार्थता, क्व, सुखम्, क्व, च, वा, दुखम्, निर्विमर्शस्य, मे, सदा

एषः व्यवहारः क्व
यह व्यावहारिक दुनिया कहाँ
सा परमार्थता क्व
वह परमार्थता कहाँ
क्व सुखम् क्व दुखम्
सुख कहाँ, दुख कहाँ
निर्विमर्शस्य मे सदा
सदा विचार-जाल से रहित मेरे लिए

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

सदा निर्विमर्श मेरे लिए यह व्यवहार कहाँ, वह परमार्थता कहाँ, सुख कहाँ और दुख कहाँ?

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

व्यवहार और परमार्थ की प्रसिद्ध जोड़ी सुख और दुख के साथ पूछी गई है। सार्वजनिक पाठ में ‘दुखं’ है, ‘दुःखं’ नहीं। पुस्तक से मिलान शेष है। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया।

सरल हिन्दी में समझें

रोज़ का संसार एक तरफ रखा जाता है और असली सत्य दूसरी तरफ। सुख और दुख भी ऐसे ही बाँटे जाते हैं।

अष्टावक्र दोनों जोड़ियों को प्रश्न बनाते हैं।

बाज़ार का हिसाब, किसी का दुख और अपनी भूख इस प्रश्न से झूठे नहीं हो जाते। झूठी होती है यह ज़िद कि परमार्थ रोज के जीवन का विरोधी खेमा है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. व्यवहार और परमार्थता वेदान्त की प्रचलित जोड़ी हैं। 2. एषः और सा दोनों को उंगली से दिखाकर पूछते हैं। 3. सुख और दुख उसी प्रश्न में आते हैं। 4. निर्विमर्श बार-बार के विचार से रहित कहता है। 5. दुखं की वर्तनी सार्वजनिक पाठ की है। 6. दूसरे के दुख की उपेक्षा इस जोड़ी से जायज़ नहीं होती।

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है।

उदाहरण से समझें: जैसे पानी घड़े में और समुद्र में दो नाम पाता है और पानी दो नहीं हो जाता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति दफ्तर का हिसाब रखता है और गहरे प्रश्न भी पढ़ता है, पर हिसाब को झूठ और प्रश्न को रोज़ से अलग लोक नहीं बनाता। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: व्यवहार का हिसाब रखें। परमार्थ के नाम पर किसी के दुख को छोटा न कहें।

सामान्य गलतफहमी

परमार्थता कहाँ है, इसका अर्थ रोज़ के वचन, मज़दूरी या दूसरे के दर्द को नकारना नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज एक व्यावहारिक हिसाब पूरा करें और एक व्यक्ति का हाल भी पूछें। (दिन के काम में)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं परमार्थ के शब्द से रोज़ की जिम्मेदारी को छोटा कर रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठें। फिर एक छोटा व्यावहारिक काम, एक संदेश या एक हिसाब, पूरा करें।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: निर्विमर्श मेरे लिए व्यवहार, परमार्थ, सुख और दुख कहाँ हैं?

English

Translation: Where is this ordinary dealing, where that ultimate truth, where pleasure or pain, for me always free of mental spinning?

Simple explanation: The everyday and the ultimate are one question. Pain is not cancelled by the question.

विषय और संबंधित श्लोक

  • व्यवहार-परमार्थ
  • सुख-दुख
  • निर्विमर्श
  • वर्तनी
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 20.9: क्व विक्षेपः क्व चैकाग्र्यं
  • श्लोक 20.11: क्व माया क्व च

स्रोत और सत्यापन

समीक्षा आवश्यक पृष्ठ इस सत्र में नहीं देखा गया

संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के विंश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक। सार्वजनिक पाठ में ‘दुखं’ है।