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प्रकरण 20: बीसवाँ प्रकरणश्लोक ११/१४79%

अध्याय 20 · अंतिम मौन

अष्टावक्र गीता, श्लोक 20.11

समीक्षा आवश्यक

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

क्व माया क्व च संसारः क्व प्रीतिर्विरतिः क्व वा । क्व जीवः क्व च तद्ब्रह्म सर्वदा विमलस्य मे ॥ ११ ॥

[पृष्ठ से सत्यापन आवश्यक] पुस्तक के छपे पाठ में भेद मिला है; नीचे “स्रोत और सत्यापन” देखें। पाठ को पुस्तक में जैसा छपा है वैसा ही रखा गया है।

IAST लिप्यंतरण

kva māyā kva ca saṃsāraḥ kva prītir viratiḥ kva vā | kva jīvaḥ kva ca tad brahma sarvadā vimalasya me || 11 ||

सरल उच्चारण: kva maayaa kva cha samsaarah kva preetir viratih kva vaa kva jeevah kva cha tad brahma sarvadaa vimalasya me (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

क्व, माया, क्व, च, संसारः, क्व, प्रीतिः, विरतिः, क्व, वा, क्व, जीवः, क्व, च, तत्, ब्रह्म, सर्वदा, विमलस्य, मे

क्व माया क्व संसारः
माया कहाँ, संसार कहाँ
क्व प्रीतिः क्व विरतिः
प्रीति कहाँ, विरक्ति कहाँ
क्व जीवः क्व तत् ब्रह्म
जीव कहाँ, वह ब्रह्म कहाँ
सर्वदा विमलस्य मे
सदा निर्मल मेरे लिए

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

सदा निर्मल मेरे लिए माया कहाँ, संसार कहाँ, प्रीति और विरति कहाँ, जीव कहाँ और वह ब्रह्म कहाँ?

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

माया और ब्रह्म की बड़ी जोड़ी प्रीति और विरति के साथ आती है। जीव और ब्रह्म का भेद भी प्रश्न है। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया।

सरल हिन्दी में समझें

माया, संसार, प्रेम, वैराग्य, जीव और ब्रह्म। इन शब्दों से पूरे शास्त्र खड़े हो जाते हैं।

अष्टावक्र पूछते हैं कि निर्मल स्वरूप में ये कहाँ हैं।

परिवार की प्रीति और संसार में की गई देखभाल इस प्रश्न से नहीं कटती। कटता है जीव और ब्रह्म को दो खेमे बनाकर लड़ने का भाव।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. माया और संसार प्रकटता के नाम हैं। 2. प्रीति और विरति लगाव और उसकी समाप्ति हैं। 3. जीव और ब्रह्म व्यक्ति और पूर्ण के नाम हैं। 4. तद् ब्रह्म उस कहे हुए ब्रह्म की ओर इशारा करता है। 5. विमल फिर मैल या पक्ष से रहित है। 6. प्रीति का प्रश्न संबंध तोड़ने का आदेश नहीं है।

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है।

उदाहरण से समझें: जैसे लहर समुद्र से अलग नाम पाती है और पानी छोड़कर अलग नहीं जा पाती। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति घर के लोगों से प्रेम करता है और ब्रह्म का शब्द भी जानता है, पर प्रेम को नीचा और शब्द को ऊँचा खेमा नहीं बनाता। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: माया और ब्रह्म के शब्द सीखें। प्रीति और देखभाल को उन शब्दों से न काटें।

सामान्य गलतफहमी

क्व प्रीतिः का अर्थ संबंध, बच्चों या मित्रों की देखभाल छोड़ना नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज एक अपने व्यक्ति को साधारण स्नेह का एक काम दें, बिना उसे माया कहे। (घर में)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं विरक्ति के शब्द से अपनी प्रीति को शर्म की बात बनाए बैठा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठें। फिर एक व्यक्ति को एक छोटा, साफ़ स्नेह का संकेत दें।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: निर्मल मेरे लिए माया, संसार, प्रीति, विरति, जीव और ब्रह्म कहाँ हैं?

English

Translation: Where are māyā and the world, love and dispassion, the person and that Brahman, for me who am always clear?

Simple explanation: The great pairs are questioned. Love and care of people are not cancelled.

विषय और संबंधित श्लोक

  • माया-संसार
  • प्रीति-विरति
  • जीव-ब्रह्म
  • विमल
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 20.10: क्व चैष व्यवहारो
  • श्लोक 20.12: क्व प्रवृत्तिर्निर्वृत्ति

स्रोत और सत्यापन

समीक्षा आवश्यक पृष्ठ इस सत्र में नहीं देखा गया

संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के विंश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक।