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अध्याय 20 · अंतिम मौन
अष्टावक्र गीता, श्लोक 20.12
समीक्षा आवश्यक
मूल संस्कृत
क्व प्रवृत्तिर्निर्वृत्तिर्वा क्व मुक्तिः क्व च बन्धनम् । कूटस्थनिर्विभागस्य स्वस्थस्य मम सर्वदा ॥ १२ ॥
IAST लिप्यंतरण
kva pravṛttir nirvṛttir vā kva muktiḥ kva ca bandhanam | kūṭasthaanirvibhāgasya svasthasya mama sarvadā || 12 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
क्व, प्रवृत्तिः, निर्वृत्तिः, वा, क्व, मुक्तिः, क्व, च, बन्धनम्, कूटस्थ-निर्विभागस्य, स्वस्थस्य, मम, सर्वदा
- क्व प्रवृत्तिः क्व निर्वृत्तिः
- प्रवृत्ति कहाँ, निवृत्ति कहाँ
- क्व मुक्तिः क्व बन्धनम्
- मुक्ति कहाँ, बंधन कहाँ
- कूटस्थ-निर्विभागस्य
- अचल और विभाग-रहित के लिए
- स्वस्थस्य मम सर्वदा
- सदा अपने में स्थित मेरे लिए
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
सदा अचल, विभाग-रहित और अपने में स्थित मेरे लिए प्रवृत्ति या निवृत्ति कहाँ, मुक्ति कहाँ और बंधन कहाँ?
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
करने और हटने की जोड़ी मुक्ति और बंधन के साथ फिर आती है। कूटस्थ और स्वस्थ वर्णन हैं, काम छोड़ने के आदेश नहीं। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया।
सरल हिन्दी में समझें
कोई सब काम में लग जाता है। कोई सब काम से हटता है। दोनों एक तनाव हो सकते हैं।
अष्टावक्र पूछते हैं कि जो अपने में स्थित है, उसके लिए ये कहाँ हैं।
स्वस्थ का अर्थ यहाँ बीमार होने का लाइसेंस नहीं है। अर्थ है अपने स्थान पर होना। काम और आराम दोनों की ईमानदारी बनी रहती है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. प्रवृत्ति और निर्वृत्ति कर्म की दो नीतियाँ हैं। 2. मुक्ति और बन्धन फिर जोड़ा हैं। 3. कूटस्थ अचल कहता है, जड़ नहीं। 4. निर्विभाग भीतर के खंडों का न रहना है। 5. स्वस्थ अपने में स्थित है। यह चिकित्सा-शब्द नहीं है। 6. करने और छोड़ने का हठ गिरता है। उत्तरदायित्व नहीं गिरता।
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती।
उदाहरण से समझें: जैसे धुरी घूमते पहिये के बीच खड़ी रहती है और पहिया धुरी नहीं बन जाता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
कोई व्यक्ति काम के घंटे पूरे करता है और विश्राम भी रखता है, पर न व्यस्तता को गर्व बनाता है न छुट्टी को धर्म। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: काम और विश्राम दोनों रखें। एक को धर्म और दूसरे को पतन न कहें।
सामान्य गलतफहमी
क्व प्रवृत्तिः का अर्थ नौकरी, परिवार या कानूनी दायित्व छोड़ देना नहीं है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज तय घंटे काम करें और तय समय विश्राम भी लें। दोनों को पहचान न बनाएँ। (दिन की लय में)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं व्यस्त रहने या सब छोड़ने में से एक को अपनी पवित्रता माने बैठा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठें। फिर आज का एक काम और एक विश्राम, दोनों का समय रखें।
एक पंक्ति में सार: अचल और अपने में स्थित मेरे लिए प्रवृत्ति, निवृत्ति, मुक्ति और बंधन कहाँ हैं?
English
Translation: Where are engagement or withdrawal, liberation or bondage, for me always immovable, undivided, and at home in myself?
Simple explanation: Action and withdrawal are both questioned. Duty and rest remain.
विषय और संबंधित श्लोक
- प्रवृत्ति-निर्वृत्ति
- मुक्ति-बंधन
- कूटस्थ
- स्वस्थ
- श्लोक 20.11: क्व माया क्व च
- श्लोक 20.13: क्वोपदेशः क्व वा
स्रोत और सत्यापन
समीक्षा आवश्यक
संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के विंश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक।