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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.20
समीक्षा आवश्यक
मूल संस्कृत
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः । यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठतः सुखम् ॥ २० ॥
IAST लिप्यंतरण
pravṛttau vā nivṛttau vā naiva dhīrasya durgrahaḥ | yadā yat kartum āyāti tat kṛtvā tiṣṭhataḥ sukham || 20 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
प्रवृत्तौ, वा, निवृत्तौ, वा, न, एव, धीरस्य, दुर्ग्रहः, यदा, यत्, कर्तुम्, आयाति, तत्, कृत्वा, तिष्ठतः, सुखम्
- धीरस्य
- धैर्यवान तत्त्वज्ञानी का
- प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा
- कर्म करने में (प्रवृत्ति) अथवा कर्म छोड़ने में (निवृत्ति)
- दुर्ग्रहः न एव
- तनिक भी कोई दुराग्रह या हठ नहीं होता
- यदा यत् कर्तुम् आयाति
- जब जो कार्य प्रारब्धवश सामने आ जाता है
- तत् कृत्वा
- उसे सहजता से पूरा करके
- सुखम् तिष्ठतः
- वह सदा सुखपूर्वक अपनी शांति में रहता है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
कर्म करने में या कर्म छोड़ने में धीर पुरुष का कोई हठ (दुराग्रह) नहीं होता; जब जो करने को सामने आ जाता है, उसे करके वह सुखपूर्वक रहता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक अद्वैत जीवन के परम लचीलेपन और सहजता को दर्शाता है। संसारी लोग कर्म करने के पीछे पड़े रहते हैं और हठयोगी सब कुछ छोड़कर भागने की ज़िद करते हैं। किंतु ज्ञानी का न कर्म करने का कोई दुराग्रह (हठ) होता है और न कर्म छोड़ने की कोई ज़िद। वह समय और परिस्थिति के अनुसार जो कर्तव्य सामने आ जाए, उसे बिना किसी राग-द्वेष के सहजता से पूरा कर लेता है, और फिर अपनी स्वाभाविक शांति में सुख से स्थित रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
बहुत से लोग ज़िंदगी में अड़ियल हो जाते हैं—"मैं तो यही करूँगा" या "मैं यह कभी नहीं करूँगा।"
लेकिन ज्ञानी व्यक्ति के अंदर कोई अड़ियलपन या हठ नहीं होता। अगर कोई काम सामने आ जाए, तो वह उसे बिना किसी नखरे के शांति से पूरा कर देता है; और अगर कोई काम न हो, तो वह चुपचाप आराम से बैठ जाता है।
वह न तो काम के पीछे भागता है और न काम से जी चुराता है। जब जो परिस्थिति सामने आ जाए, उसके साथ तालमेल बिठाकर वह हर समय खुश और शांत रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. दुर्ग्रहः का अभाव चित्त के समस्त आग्रहों, पूर्वग्रहों और हठधर्मिता की समाप्ति का सूचक है। 2. प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों को समभाव से स्वीकार करना ही वास्तविक योग है। 3. यदा यत्कर्तुमायाति प्रारब्ध के सहज स्वीकार और वर्तमान में जीने की कला है। 4. तत्कृत्वा सुखं तिष्ठतः कर्म के फल या परिणाम की चिंता से मुक्ति को दर्शाता है। 5. यह साधक को किसी भी प्रकार की धार्मिक या दार्शनिक कट्टरता से मुक्त करता है। 6. सहज जीवन ही आत्म-साक्षात्कार की सबसे परिपक्व और सुंदर अभिव्यक्ति है।
उदाहरण से समझें: जैसे पानी जिस बर्तन में डाला जाए उसी का आकार ले लेता है बिना किसी विरोध के, वैसे ही ज्ञानी जिस परिस्थिति में हो उसी में बिना हठ के सहज रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप किसी यात्रा में हों और अचानक ट्रेन लेट हो जाए, तो आप गुस्सा करने के बजाय शांति से एक किताब पढ़ने लगें; ज्ञानी जीवन के हर मोड़ को ऐसे ही सहजता से लेता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: किसी बात की ज़िद या हठ मत पालिए; जो परिस्थिति सामने आए उसे शांति से निभाकर अपने आनंद में मस्त रहिए।
सामान्य गलतफहमी
ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ‘यदा यत्कर्तुमायाति’ का अर्थ जो मन में आए वही अनैतिक काम कर लेना नहीं है; यह धर्मसंगत और स्वाभाविक कर्तव्यों की बात है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब कोई अनपेक्षित काम अचानक सामने आ जाए, तो चिढ़ने के बजाय कहें: "इसे भी सहजता से पूरा करते हैं।" (अचानक काम आने पर)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपनी योजनाओं में ज़रा-सा बदलाव होने पर तुरंत गुस्सा और बेचैन हो जाता हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अपने मन के सारे हठ और पूर्वाग्रहों को ढीला छोड़ दें; अनुभव करें कि आप पानी की तरह पूरी तरह लचीले और शांत हैं।
एक पंक्ति में सार: कर्म करने या छोड़ने में ज्ञानी का कोई हठ नहीं होता; जब जो सामने आ जाए उसे करके वह सुख से रहता है।
English
Translation: In worldly engagement or renunciation, the steadfast one harbors no obstinate insistence. Whatever action presents itself to be done, performing it, he abides happily.
Simple explanation: Neither fanatically committed to action nor dogmatically attached to inaction, the steadfast sage is free from rigid preconceptions. Engaging gracefully with whatever task destiny brings, he acts and immediately returns to serene repose.
विषय और संबंधित श्लोक
- हठ-मुक्ति
- प्रवृत्ति-निवृत्ति-समता
- प्रारब्ध-स्वीकार
- सहज-सुख
- श्लोक 18.19: लोकदृष्ट्या विकुर्वता।
- श्लोक 18.21: क्षिप्तः संस्कारवातेन।
स्रोत और सत्यापन
समीक्षा आवश्यक
संपादकीय टिप्पणी: मानक 100-श्लोक क्रम में यह श्लोक 20 है (पहले ड्राफ्ट में 19 लिखा गया था, क्योंकि स्वाराज्ये वाला श्लोक छूट गया था)। मूल पाठ सार्वजनिक अष्टावक्रगीता से मिलाया गया; इस सत्र में पुस्तक का स्कैन फिर नहीं देखा गया।