दृश्य, गति और थीम की सेटिंग(इस डिवाइस पर सहेजी जाती हैं)
दृश्य मोड
गति
थीम

आपके डिवाइस की “कम गति” सेटिंग हमेशा मानी जाती है। “केवल पाठ” मोड में कोई सजावटी चित्र या गति नहीं रहती।

प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ३/१००3%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.3

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

कर्तव्यदुःखमार्तण्डज्वालादग्धान्तरात्मनः । कुतः प्रशमपीयूषधारासारमृते सुखम् ॥ ३ ॥

IAST लिप्यंतरण

kartavyaduḥkhamārtaṇḍajvālādagdhāntarātmanaḥ | kutaḥ praśamapīyūṣadhārāsāram ṛte sukham || 3 ||

सरल उच्चारण: kartavyaduhkhamaartandajvaalaadagdhaantaraatmanah kutah prashamapeeyooshadhaaraasaaram rite sukham (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

कर्तव्य-दुःख-मार्तण्ड-ज्वाला-दग्ध-अन्तरात्मनः, कुतः, प्रशम-पीयूष-धारा-असारम्, ऋते, सुखम्

कर्तव्य-दुःख-मार्तण्ड-ज्वाला-दग्ध-अन्तरात्मनः
कर्तव्य के बोझ रूपी सूर्य की प्रचंड लपटों से जिसका अंतःकरण झुलस रहा है
प्रशम-पीयूष-धारा-असारम् ऋते
उस पुरुष को परम शांति रूपी अमृत की मूसलाधार वर्षा के बिना
कुतः सुखम्
सुख कहाँ से मिल सकता है?

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

कर्तव्य रूपी सूर्य की प्रचंड ज्वाला से झुलसते हुए अंतःकरण वाले मनुष्य को परम शांति रूपी अमृत की वर्षा के बिना सुख कहाँ मिल सकता है?

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक मनुष्य के सबसे गहरे तनाव को उजागर करता है। मनुष्य दिन-रात "मुझे यह करना है, वह करना है, मेरा यह कर्तव्य बाकी है" के मानसिक बोझ में तपता रहता है। कर्तव्य की यह भावना किसी जलते हुए सूर्य (मार्तण्ड) की तरह उसके हृदय को सुखा देती है। अष्टावक्र कहते हैं कि इस जलन को कोई सांसारिक भोग शांत नहीं कर सकता; इसे केवल आत्म-ज्ञान की परम शांति (प्रशम) रूपी अमृत की वर्षा ही शीतल कर सकती है।

सरल हिन्दी में समझें

हममें से ज़्यादातर लोग दिन-रात एक ही आग में जल रहे होते हैं—"मुझे यह भी करना है, वह भी संभालना है, अगर यह नहीं हुआ तो क्या होगा?"

यह जो लगातार कुछ न कुछ करते रहने का तनाव (कर्तव्य का बोझ) है, यह किसी जलते हुए सूरज की तरह हमारे दिल और दिमाग को थका देता है।

अष्टावक्र कहते हैं कि जब तक आपके अंदर आत्म-शांति की ठंडी फुहार नहीं बरसेगी, तब तक आप चाहे जो कर लें, आपको कभी चैन नहीं मिलेगा। सच्ची राहत तब मिलती है जब आप कर्तापन का यह भारी बोझ नीचे रख देते हैं।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. कर्तव्य-बुद्धि (sense of obligation) कर्तृत्व-अहंकार का सबसे सम्मानित और सूक्ष्म बंधन है। 2. मार्तण्ड-ज्वाला रूपक चित्त के उस भीषण तनाव को दर्शाता है जिसे आज बर्नआउट (burnout) कहा जाता है। 3. प्रशमपीयूष आत्म-साक्षात्कार से उत्पन्न परम शांति रूपी अमृत है। 4. जब तक साधक समझता है कि उसे कुछ ‘करना’ है, तब तक वह अकर्ता आत्मा को नहीं जान पाता। 5. यह श्लोक कर्मकांड और सतत सक्रियता के मानसिक दबाव से मुक्ति का मार्ग दिखाता है। 6. साधक को विश्रांति और आत्म-समर्पण की अनिवार्यता का बोध कराता है।

उदाहरण से समझें: जैसे तपती दुपहरी में रेगिस्तान में जलते हुए मुसाफिर को केवल ठंडे पानी की फुहार ही जीवन दे सकती है, वैसे ही कर्तव्य की आग में जलते मन को केवल आत्म-शांति शीतल करती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

आधुनिक कॉर्पोरेट जीवन में जब कोई व्यक्ति दिन-रात ईमेल, डेडलाइन्स और लक्ष्यों के दबाव में डिप्रेशन का शिकार हो जाता है, तो उसे कुछ पल ठहरकर सब छोड़ना पड़ता है; यही उस अमृत वर्षा का आधुनिक रूप है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: लगातार कुछ करने के मानसिक दबाव में जलना बंद कीजिए; अपने स्वरूप की परम शांति के अमृत में विश्राम कीजिए।

सामान्य गलतफहमी

यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ‘कर्तव्यदुःख’ से मुक्ति का अर्थ अपने परिवार या कार्य की ज़िम्मेदारियों से भागना नहीं है, बल्कि उनके पीछे छिपे मानसिक तनाव और कर्ता-अहंकार को शांत करना है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी काम का बोझ बहुत भारी लगे, 2 मिनट के लिए आँखें मूँदें और कहें: "सृष्टि ईश्वर चला रहा है, मैं सब कुछ करने वाला कर्ता नहीं हूँ।" (काम के तनाव में)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने कर्तव्यों को इतना भारी बना चुका हूँ कि मेरी आंतरिक शांति पूरी तरह सूख चुकी है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट आँखें मूँदकर अनुभव करें कि आपके हृदय पर शांति के शीतल अमृत की वर्षा हो रही है और सारी थकान धुल रही है।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: कर्तव्य रूपी सूर्य की ज्वाला से झुलसते अंतःकरण को आत्म-शांति के अमृत की वर्षा के बिना सुख कभी नहीं मिल सकता।

English

Translation: For one whose inner self is scorched by the fierce flames of the sun of duty, whence can there be happiness without the torrential shower of the nectar of supreme peace?

Simple explanation: The compulsive obsession with duty and perpetual accomplishment acts as a scorching sun, burning the heart with anxiety. No worldly diversion can soothe this agony; relief comes only through the torrential downpour of Self-realized peace.

विषय और संबंधित श्लोक

  • कर्तव्य-ज्वाला
  • प्रशम-पीयूष
  • मानसिक-तनाव-मुक्ति
  • परम-शांति
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.2: सर्वपरित्यागमन्तरेण।
  • श्लोक 18.4: भवोऽयं भावनामात्रो।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 261–262 (PDF पृ. 268–269)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का तीसरा श्लोक।