दृश्य, गति और थीम की सेटिंग(इस डिवाइस पर सहेजी जाती हैं)
दृश्य मोड
गति
थीम

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स

141 पद-समूह।

स-अहंकारः अनहंकृतिः
  • और लोकव्यवहार में ‘मैं’ कहता हुआ भी वास्तव में अहंकार-शून्य है (श्लोक 18.95)
स-इन्द्रियः अपि निरिन्द्रियः
  • इंद्रियों से युक्त होकर भी इंद्रियातीत (अलिप्त) है (श्लोक 18.95)
संक्षोभात् सर्वत्र व्यग्रः
  • मन के क्षोभ और चिंताओं के कारण हर जगह व्याकुल रहता है (श्लोक 18.58)
संघातविलयम्
संयोग-अयोग-विरहात्
  • संग और असंग के बंधनों और आग्रहों से मुक्त होने के कारण (श्लोक 13.4)
संसक्तस्य अपि
संसरन् अपि शोभते
  • संसार में व्यवहार करता हुआ भी सदा शोभित होता है (श्लोक 18.26)
संसार-पोषकाः
  • संसार रूपी भ्रम का ही पोषण करते रहते हैं (श्लोक 18.38)
संसार-विटप-अङ्कुरः
  • संसार रूपी विशाल वृक्ष का अंकुर बना रहता है (श्लोक 16.7)
संसारः क्व
संसारकान्तारे
संसारम् विद्धि तत्र वै
संसारम् हातुम् इच्छति
  • संसार को छोड़ना और त्यागना चाहता है (श्लोक 16.9)
संसारवान् इव
  • संसार वाले जैसा प्रतीत होता है (श्लोक 1.12)
संसारी न अस्ति
  • न कोई संसार में भटकने वाला बद्ध जीव है (श्लोक 15.16)
संस्तवे
सः
सः अर्थ-संन्यासी जयति
  • वह यथार्थ (सच्चा) संन्यासी सर्वोत्कृष्ट रूप से विजयी होता है (श्लोक 18.67)
सः आत्मज्ञः एव धन्यः
  • वही आत्मज्ञानी वास्तव में धन्य (सराहनीय) है (श्लोक 18.65)
सः गत-क्लेशः
  • वह समस्त क्लेशों से मुक्त ज्ञानी (श्लोक 18.60)
सः नित्यम् शीतल-मनाः
सः महाशयः मुक्तः एव
  • वह विशाल-हृदय पुरुष वास्तव में सदा मुक्त ही है (श्लोक 17.12)
सः मुनिः कृतार्थः भवेत्
  • वही मुनि जीवन के परम लक्ष्य को पाकर तृप्त होता है (श्लोक 12.8)
  • वही मुनि वास्तव में कृतार्थ (सफल) होता है (श्लोक 12.8)
सः हि
सक्तम् कासु अपि दृष्टिषु
  • किसी भी दृष्टि (विषय) में लगा हुआ (श्लोक 8.3)
सङ्कल्प-विकल्पाभ्याम्
  • ‘यह करूँ, वह सोचूँ’ के संकल्पों और विकल्पों से (श्लोक 15.19)
सङ्कोचः क्व
सत्त्व-बुद्धिमान्
  • विशुद्ध सात्त्विक बुद्धि वाला उत्तम अधिकारी (श्लोक 15.1)
सत्य
सदा सर्वत्र नीरसः
  • और वह सदा सब जगह सांसारिक प्रपंचों से सर्वथा नीरस (अनासक्त) रहता है (श्लोक 18.68)
सन्
सन्तुष्टः अपि न सन्तुष्टः
  • लोकदृष्टि में संतुष्ट दिखने पर भी वास्तव में संतुष्ट (आसक्त) नहीं होता (श्लोक 18.56)
सन्निहिते मृत्यौ
सम-दुःख-सुखः तृप्तः
  • दुख और सुख में समान तथा अपनी आत्मा में तृप्त होकर (श्लोक 18.82)
सम-लोष्ट-अश्म-काञ्चनः
  • जिसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना तीनों एक समान हैं (श्लोक 18.88)
समः एव अवतिष्ठते
  • सदा सर्वत्र समभाव में ही प्रतिष्ठित रहता है (श्लोक 18.100)
समजीवितमृत्युः
समदुःखसुखः
समस्त-वासना-मुक्तः
  • समस्त वासनाओं से सर्वथा मुक्त होकर (श्लोक 17.11)
समस्तम् कल्पना-मात्रम्
  • यह संपूर्ण जगत केवल मन की कल्पना मात्र है (श्लोक 18.7)
समाधान-असमाधान-हित-अहित-विकल्पनाः
  • चित्त की एकाग्रता-विक्षेप और अपने भले-बुरे के मानसिक विकल्पों को (श्लोक 17.18)
समाधिम् अनुतिष्ठसि
  • तुम समाधि का अनुष्ठान करते हो (श्लोक 1.15)
समाधौ न समाधिमान्
  • और समाधि की अवस्था में भी उसे समाधि का कोई अहंकार नहीं होता (श्लोक 18.97)
समाध्यादिविक्षिप्तौ
  • समाधि लगाने का हठ भी एक प्रकार का विक्षेप (मानसिक प्रयास) है (श्लोक 12.3)
सम्पत्सु च विपत्सु च
  • तथा संपत्ति (अमीरी) और विपत्ति (गरीबी) में (श्लोक 17.15)
सर्व-आरम्भेषु निष्कामः
  • समस्त कर्मों के आरंभ में पूर्णतः निष्काम होकर (श्लोक 18.64)
सर्व-परित्यागम् अन्तरेण
  • सब कुछ के (आंतरिक मानसिक) त्याग के बिना (श्लोक 18.2)
सर्व-भावेषु असक्तः
  • समस्त पदार्थों और संबंधों में अनासक्त (श्लोक 18.87)
सर्व-विस्मरणात् ऋते
  • समस्त मानसिक प्रपंचों और धारणाओं को भुलाए बिना (श्लोक 16.11)
  • समस्त मानसिक प्रपंचों और स्मृतियों को भुलाए बिना (श्लोक 16.1)
सर्वत्र अनवधानस्य
  • संसार के समस्त प्रपंचों के प्रति स्वाभाविक रूप से असावधान (उदासीन) रहने वाले (श्लोक 18.89)
सर्वत्र अनादरम् कुरु
सर्वत्र गलितस्पृहः
  • और सब ओर से उसकी तृष्णा समाप्त हो जाती है (श्लोक 11.5)
सर्वत्र ध्यानम् त्यज एव
  • सब प्रकार के ध्यान लगाने के हठ को भी छोड़ दो (श्लोक 15.20)
सर्वत्र राजते
  • वह सब जगह शोभायमान और प्रकाशित रहता है (श्लोक 17.11)
सर्वत्र विमल-आशयः
  • उसका अंतःकरण सब जगह अत्यंत निर्मल और निष्कलंक रहता है (श्लोक 17.11)
सर्वत्र सम-दर्शिनः धीरस्य
  • सब जगह समान आत्मा को देखने वाले धैर्यवान ज्ञानी के लिए (श्लोक 17.15)
सर्वत्र स्वस्थः दृश्यते
  • हर स्थान और हर परिस्थिति में अपने स्वरूप में स्थित (स्वस्थ) दिखाई देता है (श्लोक 17.11)
सर्वदा
सर्वदा निरातङ्कस्य
  • जो सदा समस्त भयों और संतापों से सर्वथा मुक्त (निरातंक) है (श्लोक 18.78)
सर्वदा निरालम्बा एव निष्कामा
  • सदा सर्वथा बिना किसी सहारे के और निष्काम रहती है (श्लोक 18.44)
सर्वदा निर्विकल्पस्य
  • जो सदा समस्त विकल्पों से रहित है (श्लोक 18.66)
सर्वदा शान्त-मानसः
सर्वनिर्माता
सर्वभूतानि आत्मनि
सर्वभूतानि च आत्मनि
  • और अपनी आत्मा में समस्त प्राणियों को (श्लोक 15.6)
सर्वभूतानि मयि
सर्वभूतेषु अहम्
सर्वभूतेषु आत्मानम्
  • सब प्राणियों में आत्मा को (श्लोक 3.5)
  • समस्त प्राणियों में अपनी ही आत्मा को (श्लोक 15.6)
सर्वम्
सर्वम् आत्मा इति निश्चित्य
  • 'सब कुछ मेरी ही आत्मा है’ ऐसा पक्का निश्चय करके (श्लोक 18.9)
  • सब कुछ केवल आत्मा ही है, ऐसा दृढ़ निश्चय करके (श्लोक 15.15)
सर्वस्य
सर्वाः विमुञ्च ताः
सल्लकी-पल्लव-प्रीतम् इभम्
  • सल्लकी के मीठे पत्तों का प्रेमी हाथी (श्लोक 17.3)
साकारम्
साक्षिणम्
साक्षिपुरुषे परमात्मनि च ईश्वरे विज्ञाते
  • साक्षी स्वरूप, परमात्मा और परमेश्वर का प्रत्यक्ष बोध हो जाने पर (श्लोक 14.3)
साक्षी
सागरे तरङ्गाः इव
साध्यम् क्व च साधनम् क्व
  • और उसके लिए साध्य (लक्ष्य) कहाँ है और साधन कहाँ है? (श्लोक 18.66)
साध्यादर्शी
  • कर्म के फल में अपनी पहचान या सुख न तलाशने वाला (श्लोक 11.4)
सानुरागाम् स्त्रियम् दृष्ट्वा
  • प्रेम और कामुक आकर्षण से भरी स्त्री को सामने देखकर (श्लोक 17.14)
सामर्थ्यम्
सिद्धिम् अवाप्नुयात्
सुकृतेन अपि कर्मणा
सुख-आदि-रूप-अनियमम्
  • सुख-दुःख के आने-जाने की अनिश्चितता और क्षणभंगुरता को (श्लोक 13.7)
सुखं चर
सुखं दुःखम्
सुखदुःखे जन्ममृत्यू
सुखम्
  • मैं सुखपूर्वक विश्राम पाता हूँ (श्लोक 13.2)
सुखम् आयाति याति च
सुखम् आस्ते सुखम् शेते
  • सुखपूर्वक बैठता है, सुखपूर्वक सोता है (श्लोक 18.59)
सुखम् चर
सुखम् तिष्ठ
सुखम् वक्ति सुखम् भुङ्क्ते
  • सुखपूर्वक बोलता है और सुखपूर्वक भोजन करता है (श्लोक 18.59)
सुखी न हि भवेत्
  • मनुष्य कभी सच्चा सुखी नहीं हो सकता (श्लोक 18.2)
सुखी भव
सुखी शान्तः
सुखीभव
सुखे दुःखे
सुखेन एव
सुप्तः अपि सुषुप्तौ न च
  • सोया हुआ दिखने पर भी वह वास्तव में गहरी नींद (सुषुप्ति के अज्ञान) में नहीं होता (श्लोक 18.94)
सुप्तवत् स्व-पदे स्थिताः
  • सुषुप्ति की भाँति सहज अपने आत्मपद में स्थित रहते हैं (श्लोक 18.33)
सुबुद्धिः अपि निर्बुद्धिः
  • कुशाग्र बुद्धि वाला होकर भी बुद्धि के आग्रहों से परे है (श्लोक 18.95)
सुभिन्न-हृदय-ग्रन्थिः
  • जिसके हृदय की अविद्या रूपी गाँठ पूरी तरह कट चुकी है (श्लोक 18.88)
सूरयः ताम् न पश्यन्ति
  • ज्ञानी पुरुष उस कर्तव्यता को नहीं देखते (श्लोक 18.57)
सोऽहमस्मि
स्थितिः अद्य यथा तथा
  • शरीर की स्थिति अब जैसी है वैसी (प्रारब्ध के अनुसार) रहे (श्लोक 9.8)
स्थित्या
स्फुरति
स्फूर्ति-मात्रः
  • केवल शुद्ध चेतना के स्फुरण (प्रकाश) रूप में स्थित होकर (श्लोक 15.17)
स्व-आत्मनः अकर्तृत्वम्
स्व-आरामम् न जातु हर्षयन्ति
  • अपनी आत्मा में रमण करने वाले ज्ञानी को कदापि आकर्षित (हर्षित) नहीं कर पाते (श्लोक 17.3)
स्व-आरामस्य धीरस्य एव
  • किंतु अपने ही आत्म-आनंद में रमण करने वाले ज्ञानी के लिए (श्लोक 18.41)
स्व-शरीरे अपि निश्चिन्तः
  • अपने शरीर के प्रति भी पूर्णतः चिंता-मुक्त (श्लोक 18.84)
स्वं शरीरम्
स्वच्छ-इन्द्रियः
  • जिसकी इंद्रियाँ राग-द्वेष के मैल से रहित हैं (श्लोक 17.1)
स्वच्छन्दम् देशान् चरतः
  • और बिना किसी बंधन के स्वतंत्र रूप से देशों में विचरण करता है (श्लोक 18.85)
स्वपतः मे हानिः न अस्ति
  • सोने पर मेरी आत्मा का कोई नुकसान नहीं होता (श्लोक 13.6)
स्वपन्
स्वप्नवत् भवति
  • स्वप्न के समान मिथ्या सिद्ध हो जाता है (श्लोक 18.1)
स्वप्ने अपि शयितः न च
  • और स्वप्नावस्था में भी वह सोता नहीं है (श्लोक 18.94)
स्वप्नेन्द्रजालवत्
स्वप्रकाशः
स्वभाव-भूमि-विश्रान्ति
  • क्योंकि अपने आत्म-स्वभाव रूपी परम भूमि में विश्राम पा लेने से (श्लोक 18.86)
स्वभावतः
स्वभावात्
  • प्रकृति के अपने स्वभाव से ही होते हैं (श्लोक 11.1)
स्वभावात् एव
स्वभावानाम् अभावः न अस्ति
  • स्वाभाविक चैतन्य स्वरूप का कभी अभाव नहीं होता (श्लोक 18.4)
स्वभावेन एव शाम्यति
  • अपने स्वाभाविक स्वरूप से ही स्वतः परम शांत हो जाता है (श्लोक 18.70)
स्वरूप-आदान-मात्रतः
  • और अपने वास्तविक स्वरूप को स्वीकार कर लेने मात्र से (श्लोक 18.6)
स्वरूपस्थः भविष्यसि
स्वर्गनरकौ
स्वस्थः महाशयः
  • वह अपने स्वरूप में स्थित महान पुरुष (श्लोक 17.14)
स्वस्थेन्द्रियः
  • शांत और संयत इंद्रियों वाला होकर (श्लोक 11.3)
स्वाच्छन्द्यम् क्व
स्वातन्त्र्यात् निर्वृतिम् गच्छेत्
  • स्वतंत्रता से ही चित्त की परम शांति (निर्वृति) मिलती है (श्लोक 18.50)
स्वातन्त्र्यात् परमम् पदम्
  • और स्वतंत्रता से ही परम पद (मोक्ष) की प्राप्ति होती है (श्लोक 18.50)
स्वातन्त्र्यात् परम् लभते
  • स्वतंत्रता से ही परम ब्रह्म की प्राप्ति होती है (श्लोक 18.50)
स्वातन्त्र्यात् सुखम् आप्नोति
  • सच्ची स्वतंत्रता (आत्म-निर्भरता) से ही सच्चा सुख मिलता है (श्लोक 18.50)
स्वान्तवातेन
स्वास्थ्यम्
  • आंतरिक स्थिरता और शांति (स्वास्थ्य) (श्लोक 13.1)