दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
स
- स-अहंकारः अनहंकृतिः
- और लोकव्यवहार में ‘मैं’ कहता हुआ भी वास्तव में अहंकार-शून्य है
- स-इन्द्रियः अपि निरिन्द्रियः
- इंद्रियों से युक्त होकर भी इंद्रियातीत (अलिप्त) है
- संक्षोभात् सर्वत्र व्यग्रः
- मन के क्षोभ और चिंताओं के कारण हर जगह व्याकुल रहता है
- संघातविलयम्
- देह-संघात (देहाभिमान) का लय
- संयोग-अयोग-विरहात्
- संग और असंग के बंधनों और आग्रहों से मुक्त होने के कारण
- संसक्तस्य अपि
- आसक्त रहते हुए भी
- संसरन् अपि शोभते
- संसार में व्यवहार करता हुआ भी सदा शोभित होता है
- संसार-पोषकाः
- संसार रूपी भ्रम का ही पोषण करते रहते हैं
- संसार-विटप-अङ्कुरः
- संसार रूपी विशाल वृक्ष का अंकुर बना रहता है
- संसारः क्व
- संसार कहाँ है?
- संसारकान्तारे
- संसार-रूपी वन में
- संसारम् विद्धि तत्र वै
- वहीं संसार जान
- संसारम् हातुम् इच्छति
- संसार को छोड़ना और त्यागना चाहता है
- संसारवान् इव
- संसार वाले जैसा प्रतीत होता है
- संसारी न अस्ति
- न कोई संसार में भटकने वाला बद्ध जीव है
- संस्तवे
- स्तुति में
- सः
- वह (दर्पण)
- सः अर्थ-संन्यासी जयति
- वह यथार्थ (सच्चा) संन्यासी सर्वोत्कृष्ट रूप से विजयी होता है
- सः आत्मज्ञः एव धन्यः
- वही आत्मज्ञानी वास्तव में धन्य (सराहनीय) है
- सः गत-क्लेशः
- वह समस्त क्लेशों से मुक्त ज्ञानी
- सः नित्यम् शीतल-मनाः
- वह शांत (शीतल) मन वाला ज्ञानी
- सः महाशयः मुक्तः एव
- वह विशाल-हृदय पुरुष वास्तव में सदा मुक्त ही है
- सः मुनिः कृतार्थः भवेत्
- वही मुनि जीवन के परम लक्ष्य को पाकर तृप्त होता है
- वही मुनि वास्तव में कृतार्थ (सफल) होता है
- सः हि
- तो वह वास्तव में
- सक्तम् कासु अपि दृष्टिषु
- किसी भी दृष्टि (विषय) में लगा हुआ
- सङ्कल्प-विकल्पाभ्याम्
- ‘यह करूँ, वह सोचूँ’ के संकल्पों और विकल्पों से
- सङ्कोचः क्व
- संकोच (बंधन) कहाँ?
- सत्त्व-बुद्धिमान्
- विशुद्ध सात्त्विक बुद्धि वाला उत्तम अधिकारी
- सत्य
- सत्य
- सदा सर्वत्र नीरसः
- और वह सदा सब जगह सांसारिक प्रपंचों से सर्वथा नीरस (अनासक्त) रहता है
- सन्
- होकर
- सन्तुष्टः अपि न सन्तुष्टः
- लोकदृष्टि में संतुष्ट दिखने पर भी वास्तव में संतुष्ट (आसक्त) नहीं होता
- सन्निहिते मृत्यौ
- मृत्यु के पास आने पर
- सम-दुःख-सुखः तृप्तः
- दुख और सुख में समान तथा अपनी आत्मा में तृप्त होकर
- सम-लोष्ट-अश्म-काञ्चनः
- जिसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना तीनों एक समान हैं
- समः एव अवतिष्ठते
- सदा सर्वत्र समभाव में ही प्रतिष्ठित रहता है
- समजीवितमृत्युः
- जीवन और मृत्यु में सम
- समदुःखसुखः
- सुख और दुख में सम
- समस्त-वासना-मुक्तः
- समस्त वासनाओं से सर्वथा मुक्त होकर
- समस्तम् कल्पना-मात्रम्
- यह संपूर्ण जगत केवल मन की कल्पना मात्र है
- समाधान-असमाधान-हित-अहित-विकल्पनाः
- चित्त की एकाग्रता-विक्षेप और अपने भले-बुरे के मानसिक विकल्पों को
- समाधिम् अनुतिष्ठसि
- तुम समाधि का अनुष्ठान करते हो
- समाधौ न समाधिमान्
- और समाधि की अवस्था में भी उसे समाधि का कोई अहंकार नहीं होता
- समाध्यादिविक्षिप्तौ
- समाधि लगाने का हठ भी एक प्रकार का विक्षेप (मानसिक प्रयास) है
- सम्पत्सु च विपत्सु च
- तथा संपत्ति (अमीरी) और विपत्ति (गरीबी) में
- सर्व-आरम्भेषु निष्कामः
- समस्त कर्मों के आरंभ में पूर्णतः निष्काम होकर
- सर्व-परित्यागम् अन्तरेण
- सब कुछ के (आंतरिक मानसिक) त्याग के बिना
- सर्व-भावेषु असक्तः
- समस्त पदार्थों और संबंधों में अनासक्त
- सर्व-विस्मरणात् ऋते
- समस्त मानसिक प्रपंचों और धारणाओं को भुलाए बिना
- समस्त मानसिक प्रपंचों और स्मृतियों को भुलाए बिना
- सर्वत्र अनवधानस्य
- संसार के समस्त प्रपंचों के प्रति स्वाभाविक रूप से असावधान (उदासीन) रहने वाले
- सर्वत्र अनादरम् कुरु
- सब जगह अनादर (अनासक्ति) कर
- सर्वत्र गलितस्पृहः
- और सब ओर से उसकी तृष्णा समाप्त हो जाती है
- सर्वत्र ध्यानम् त्यज एव
- सब प्रकार के ध्यान लगाने के हठ को भी छोड़ दो
- सर्वत्र राजते
- वह सब जगह शोभायमान और प्रकाशित रहता है
- सर्वत्र विमल-आशयः
- उसका अंतःकरण सब जगह अत्यंत निर्मल और निष्कलंक रहता है
- सर्वत्र सम-दर्शिनः धीरस्य
- सब जगह समान आत्मा को देखने वाले धैर्यवान ज्ञानी के लिए
- सर्वत्र स्वस्थः दृश्यते
- हर स्थान और हर परिस्थिति में अपने स्वरूप में स्थित (स्वस्थ) दिखाई देता है
- सर्वदा
- सदा
- सर्वदा निरातङ्कस्य
- जो सदा समस्त भयों और संतापों से सर्वथा मुक्त (निरातंक) है
- सर्वदा निरालम्बा एव निष्कामा
- सदा सर्वथा बिना किसी सहारे के और निष्काम रहती है
- सर्वदा निर्विकल्पस्य
- जो सदा समस्त विकल्पों से रहित है
- सर्वदा शान्त-मानसः
- सदा ही शांत मन वाला रहता है
- सर्वनिर्माता
- सबका विधाता और रचयिता है
- सर्वभूतानि आत्मनि
- सब प्राणियों को आत्मा में
- सर्वभूतानि च आत्मनि
- और अपनी आत्मा में समस्त प्राणियों को
- सर्वभूतानि मयि
- सब प्राणी मुझमें हैं
- सर्वभूतेषु अहम्
- मैं सब प्राणियों में हूँ
- सर्वभूतेषु आत्मानम्
- सब प्राणियों में आत्मा को
- समस्त प्राणियों में अपनी ही आत्मा को
- सर्वम्
- सब कुछ
- सर्वम् आत्मा इति निश्चित्य
- 'सब कुछ मेरी ही आत्मा है’ ऐसा पक्का निश्चय करके
- सब कुछ केवल आत्मा ही है, ऐसा दृढ़ निश्चय करके
- सर्वस्य
- सबका
- सर्वाः विमुञ्च ताः
- उन सबको छोड़ दे
- सल्लकी-पल्लव-प्रीतम् इभम्
- सल्लकी के मीठे पत्तों का प्रेमी हाथी
- साकारम्
- आकार वाला, शरीर आदि
- साक्षिणम्
- साक्षी, देखने वाला
- साक्षिपुरुषे परमात्मनि च ईश्वरे विज्ञाते
- साक्षी स्वरूप, परमात्मा और परमेश्वर का प्रत्यक्ष बोध हो जाने पर
- साक्षी
- साक्षी, द्रष्टा
- सागरे तरङ्गाः इव
- समुद्र में लहरों की भाँति
- साध्यम् क्व च साधनम् क्व
- और उसके लिए साध्य (लक्ष्य) कहाँ है और साधन कहाँ है?
- साध्यादर्शी
- कर्म के फल में अपनी पहचान या सुख न तलाशने वाला
- सानुरागाम् स्त्रियम् दृष्ट्वा
- प्रेम और कामुक आकर्षण से भरी स्त्री को सामने देखकर
- सामर्थ्यम्
- सामर्थ्य है
- सिद्धिम् अवाप्नुयात्
- सिद्धि (मोक्ष) पाता है
- सुकृतेन अपि कर्मणा
- पुण्य-कर्म से भी
- सुख-आदि-रूप-अनियमम्
- सुख-दुःख के आने-जाने की अनिश्चितता और क्षणभंगुरता को
- सुखं चर
- सुखपूर्वक विचरो
- सुखं दुःखम्
- सुख और दुःख
- सुखदुःखे जन्ममृत्यू
- सुख-दुःख और जन्म-मरण
- सुखम्
- मैं सुखपूर्वक विश्राम पाता हूँ
- सुखम् आयाति याति च
- सुखपूर्वक आता है और जाता है
- सुखम् आस्ते सुखम् शेते
- सुखपूर्वक बैठता है, सुखपूर्वक सोता है
- सुखम् चर
- अतः सुखपूर्वक विचरण करो
- आनंदपूर्वक विचरण करो
- सुखम् तिष्ठ
- सुखपूर्वक स्थित रहो
- सुखम् वक्ति सुखम् भुङ्क्ते
- सुखपूर्वक बोलता है और सुखपूर्वक भोजन करता है
- सुखी न हि भवेत्
- मनुष्य कभी सच्चा सुखी नहीं हो सकता
- सुखी भव
- परम सुखी हो जाओ
- सुखी हो
- सुखी शान्तः
- सदा सुखी और प्रशांत रहता है
- सुखी और शान्त
- सुखीभव
- सुखी हो
- सुखे दुःखे
- सुख में और दुख में
- सुखेन एव
- सहज ही परम सुख से
- सुप्तः अपि सुषुप्तौ न च
- सोया हुआ दिखने पर भी वह वास्तव में गहरी नींद (सुषुप्ति के अज्ञान) में नहीं होता
- सुप्तवत् स्व-पदे स्थिताः
- सुषुप्ति की भाँति सहज अपने आत्मपद में स्थित रहते हैं
- सुबुद्धिः अपि निर्बुद्धिः
- कुशाग्र बुद्धि वाला होकर भी बुद्धि के आग्रहों से परे है
- सुभिन्न-हृदय-ग्रन्थिः
- जिसके हृदय की अविद्या रूपी गाँठ पूरी तरह कट चुकी है
- सूरयः ताम् न पश्यन्ति
- ज्ञानी पुरुष उस कर्तव्यता को नहीं देखते
- सोऽहमस्मि
- वही मैं हूँ
- स्थितिः अद्य यथा तथा
- शरीर की स्थिति अब जैसी है वैसी (प्रारब्ध के अनुसार) रहे
- स्थित्या
- बैठने या रुकने से
- स्फुरति
- प्रकट और विलीन होता है
- स्फुरित होता है, प्रकट होता है
- स्फूर्ति-मात्रः
- केवल शुद्ध चेतना के स्फुरण (प्रकाश) रूप में स्थित होकर
- स्व-आत्मनः अकर्तृत्वम्
- कि मेरी आत्मा सर्वथा अकर्ता है
- स्व-आरामम् न जातु हर्षयन्ति
- अपनी आत्मा में रमण करने वाले ज्ञानी को कदापि आकर्षित (हर्षित) नहीं कर पाते
- स्व-आरामस्य धीरस्य एव
- किंतु अपने ही आत्म-आनंद में रमण करने वाले ज्ञानी के लिए
- स्व-शरीरे अपि निश्चिन्तः
- अपने शरीर के प्रति भी पूर्णतः चिंता-मुक्त
- स्वं शरीरम्
- अपने शरीर को
- स्वच्छ-इन्द्रियः
- जिसकी इंद्रियाँ राग-द्वेष के मैल से रहित हैं
- स्वच्छन्दम् देशान् चरतः
- और बिना किसी बंधन के स्वतंत्र रूप से देशों में विचरण करता है
- स्वपतः मे हानिः न अस्ति
- सोने पर मेरी आत्मा का कोई नुकसान नहीं होता
- स्वपन्
- सोते हुए
- स्वप्नवत् भवति
- स्वप्न के समान मिथ्या सिद्ध हो जाता है
- स्वप्ने अपि शयितः न च
- और स्वप्नावस्था में भी वह सोता नहीं है
- स्वप्नेन्द्रजालवत्
- स्वप्न और इन्द्रजाल के समान
- स्वप्रकाशः
- स्वयं प्रकाशित
- स्वभाव-भूमि-विश्रान्ति
- क्योंकि अपने आत्म-स्वभाव रूपी परम भूमि में विश्राम पा लेने से
- स्वभावतः
- प्रकृति के अपने स्वभाव से
- स्वभाव से
- स्वभावात्
- प्रकृति के अपने स्वभाव से ही होते हैं
- स्वभावात् एव
- स्वभाव से ही
- स्वभावानाम् अभावः न अस्ति
- स्वाभाविक चैतन्य स्वरूप का कभी अभाव नहीं होता
- स्वभावेन एव शाम्यति
- अपने स्वाभाविक स्वरूप से ही स्वतः परम शांत हो जाता है
- स्वरूप-आदान-मात्रतः
- और अपने वास्तविक स्वरूप को स्वीकार कर लेने मात्र से
- स्वरूपस्थः भविष्यसि
- अपने स्वरूप में स्थित होगा
- स्वर्गनरकौ
- स्वर्ग और नरक
- स्वस्थः महाशयः
- वह अपने स्वरूप में स्थित महान पुरुष
- स्वस्थेन्द्रियः
- शांत और संयत इंद्रियों वाला होकर
- स्वाच्छन्द्यम् क्व
- स्वच्छंदता कहाँ?
- स्वातन्त्र्यात् निर्वृतिम् गच्छेत्
- स्वतंत्रता से ही चित्त की परम शांति (निर्वृति) मिलती है
- स्वातन्त्र्यात् परमम् पदम्
- और स्वतंत्रता से ही परम पद (मोक्ष) की प्राप्ति होती है
- स्वातन्त्र्यात् परम् लभते
- स्वतंत्रता से ही परम ब्रह्म की प्राप्ति होती है
- स्वातन्त्र्यात् सुखम् आप्नोति
- सच्ची स्वतंत्रता (आत्म-निर्भरता) से ही सच्चा सुख मिलता है
- स्वान्तवातेन
- मन-रूपी पवन से
- स्वास्थ्यम्
- आंतरिक स्थिरता और शांति (स्वास्थ्य)