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प्रकरण 11: ग्यारहवाँ प्रकरणश्लोक ३/८38%

अध्याय 11 · शुद्ध चेतना

अष्टावक्र गीता, श्लोक 11.3

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल नहीं छपा; भावार्थ के संदर्भ से)

आपदः सम्पदः काले दैवादेवेति निश्चयी । तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वाञ्छति न शोचति ॥ ३ ॥

IAST लिप्यंतरण

āpadaḥ sampadaḥ kāle daivād eveti niścayī | tṛptaḥ svasthendriyo nityaṃ na vāñchati na śocati || 3 ||

सरल उच्चारण: aapadah sampadah kaale daivaad eveti nishchayee triptah svasthendriyo nityam na vaanychhati na shochati (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

आपदः, सम्पदः, काले, दैवात्, एव, इति, निश्चयी, तृप्तः, स्वस्थेन्द्रियः, नित्यम्, न, वाञ्छति, न, शोचति

आपदः सम्पदः
कष्ट (विपत्तियाँ) और सुख (सम्पत्तियाँ)
काले
समय आने पर
दैवात् एव
प्रारब्ध और ईश्वरीय विधान से ही आते हैं
इति निश्चयी
ऐसा जिसका दृढ़ निश्चय है
तृप्तः
वह सदा संतुष्ट रहकर
स्वस्थेन्द्रियः
शांत और संयत इंद्रियों वाला होकर
नित्यम्
सदा
न वाञ्छति न शोचति
न भविष्य की इच्छा करता है और न अतीत का शोक करता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

विपत्तियाँ और संपत्तियाँ समय आने पर प्रारब्ध-विधान से ही आती हैं—ऐसा दृढ़ निश्चय रखने वाला पुरुष सदा तृप्त और स्वस्थ-इंद्रिय होकर न कोई इच्छा करता है और न कोई शोक।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

टीका के अनुसार अनुकूलता और प्रतिकूलता कालचक्र के अधीन पूर्वकृत कर्मों के फल (दैव) से घटित होती हैं। अज्ञानी मनुष्य संपत्ति मिलने पर फूला नहीं समाता और विपत्ति आने पर विलाप करता है। परंतु ज्ञानी जानता है कि सुख-दुःख धूप-छाँव की तरह आते-जाते हैं। अतः वह वर्तमान में पूर्ण तृप्त रहकर इंद्रियों को शांत रखता है; न भविष्य की कामना करता है और न अतीत का शोक।

सरल हिन्दी में समझें

सुख और दुःख, लाभ और हानि समय के अनुसार आते-जाते रहते हैं। यह जीवन का स्वाभाविक चक्र है।

जो व्यक्ति इस बात को गहराई से समझ लेता है, वह न तो अच्छी परिस्थिति में घमंड से भरता है और न बुरी परिस्थिति में हताश होकर रोता है। उसकी इंद्रियाँ शांत रहती हैं और वह वर्तमान में संतुष्ट रहता है।

वह न तो आने वाले कल की व्यर्थ चिंता में दौड़ता है और न बीते हुए कल पर पछताता है। यह जीवन को गहरी समता के साथ जीने की कला है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक काल और दैव के अधीन सुख-दुख के आने-जाने की वास्तविकता को उजागर करता है। 2. न वाञ्छति न शोचति गीता के स्थितप्रज्ञ लक्षण (2.56) से प्रत्यक्ष मेल खाता है। 3. स्वस्थेन्द्रियः शब्द इंद्रियों के स्वाभाविक संयम और स्वस्थता को दर्शाता है। 4. ग्यारहवें प्रकरण का तीसरा श्लोक है, जो समत्व-योग का शिखर है। 5. 11.2 के ईश्वरीय विधान को व्यक्तिगत जीवन की परिस्थितियों पर लागू करता है। 6. यह मानसिक संतुलन की दृष्टि है; विपत्ति में उचित सावधानी और चिकित्सा की उपेक्षा न करें।

उदाहरण से समझें: जैसे ऋतुएँ अपने समय पर आती-जाती हैं और बुद्धिमान व्यक्ति हर ऋतु को सहज भाव से स्वीकार करता है, वैसे ही ज्ञानी सुख-दुख को स्वीकार करता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

खेती करने वाला किसान अच्छी बारिश या सूखे को कालचक्र का हिस्सा समझकर न तो अति-उत्साहित होता है और न हिम्मत हारता है, बल्कि निरंतर अपना काम करता रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: सुख-दुख समय के अनुसार आते-जाते हैं; वर्तमान में संतुष्ट रहिए, न भविष्य की चिंता कीजिए न अतीत का शोक।

सामान्य गलतफहमी

यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ‘दैवात्’ का अर्थ यह नहीं कि किसी संकट या बीमारी में इलाज न कराया जाए।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी मन में किसी पुरानी हानि का पछतावा उठे, तो कहें: ‘वह समय बीत गया, मैं वर्तमान में शांत हूँ।’ (लगभग 2 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने जीवन के किसी बीते हुए नुकसान पर आज भी व्यर्थ शोक मना रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अपनी उन तीन परिस्थितियों को याद करें जिन्हें आप बदल नहीं सकते थे, और उन्हें मन से विदा देकर वर्तमान में विश्राम करें।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: सुख-दुख समय और प्रारब्ध से आते हैं; ज्ञानी न भविष्य की चाह करता है न अतीत का शोक।

English

Translation: Sure that fortune and misfortune arrive in time through destiny alone, one ever content, with senses poised, neither yearns nor grieves.

Simple explanation: Understanding that highs and lows are part of time’s unfolding order frees us from clinging to prosperity and despairing in adversity, anchoring the mind in steady contentment and peaceful senses.

विषय और संबंधित श्लोक

  • समत्व
  • संतोष
  • प्रारब्ध
  • शोकरहितता
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 11.2: ईश्वर-विधान।
  • श्लोक 11.4: सुख-दुख और जन्म-मरण।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 166–167 (PDF पृ. 173–174)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। गीता के ‘नाभिनन्दति न द्वेष्टि’ और ‘समदुःखसुखः’ से सीधा वैचारिक साम्य।