श्लोक 11.1
भावाभावविकारश्च स्वभावान्नेति निश्चयी । निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति ॥ १ ॥
सृष्टि के परिवर्तन प्रकृति के स्वभाव से हैं; आत्मा सदा निर्विकार और शांत है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअध्याय 11 · ग्यारहवाँ प्रकरण
आठ श्लोकों के इस ग्यारहवें प्रकरण में अष्टावक्र आठ 'निश्चय' सूत्रों द्वारा प्रकृति के नियमों, प्रारब्ध और शुद्ध चेतन आत्मस्वरूप का बोध कराकर परम शांति की ओर ले जाते हैं।
दसवें प्रकरण में तृष्णा-त्याग और क्रिया-शमन का उपदेश देने के बाद, ग्यारहवें प्रकरण में अष्टावक्र मुनि 'निश्चय' (दृढ़ ज्ञान-निष्ठा) के आठ महासूत्र प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकरण के प्रत्येक श्लोक में 'इति निश्चयी' (ऐसा जिसका पक्का निश्चय है) पद आता है। पुस्तक में कोई वक्ता-लेबल नहीं छपा; संदर्भ और भावार्थ से वक्ता अष्टावक्र मुनि हैं।
आठ श्लोकों की यह यात्रा चित्त को समस्त व्यर्थ चिंताओं, कर्तापन के दंभ और द्वैत-भ्रम से निकालकर शुद्ध साक्षी-चेतना में स्थापित करती है। पहला श्लोक (11.1) बताता है कि समस्त उत्पत्ति और विनाश प्रकृति के स्वभाव से हैं, आत्मा सदा निर्विकार है। दूसरा श्लोक (11.2) ईश्वर को ही सबका नियंता जानकर व्यक्तिगत वासनाओं को गलाने की राह दिखाता है। तीसरा श्लोक (11.3) काल और दैव के अधीन सुख-दुख को देखकर संतुष्ट रहने की प्रेरणा देता है। चौथा श्लोक (11.4) जन्म-मरण को प्रारब्ध-नियम जानकर कर्म करते हुए भी निर्लेप रहने का मार्ग देता है। पाँचवाँ श्लोक (11.5) स्पष्ट करता है कि दुःख परिस्थितियों से नहीं, केवल मन की चिन्ता से जन्म लेता है। छठा श्लोक (11.6) 'न मैं देह हूँ, न देह मेरा है' के निश्चय से किए-अनकिए कर्मों के बोझ को उतार फेंकता है। सातवाँ श्लोक (11.7) ब्रह्मा से लेकर तिनके तक एक ही आत्म-सत्ता का दर्शन कराता है। और आठवाँ श्लोक (11.8) विश्व के आश्चर्यों को स्वप्नवत् जानकर शुद्ध चिन्मात्र स्थिति में मौन विश्राम का उपदेश देता है।
सावधानी: 'दैवादेव' और 'अकर्ता' का अर्थ भाग्यवादिता या अकर्मण्यता नहीं है। व्यावहारिक जीवन में कर्तव्य, नैतिकता, परिवार की देखभाल और स्वास्थ्य की रक्षा यथावत् बनी रहती है।
क्या मेरे जीवन का सुख-दुख बाहरी घटनाओं पर निर्भर है, या मेरे अपने आंतरिक निश्चय और साक्षी-बोध पर?
जब साधक यह निश्चय कर लेता है कि जगत के विकार प्रकृति के स्वभाव और ईश्वरीय विधान से घटित होते हैं, और आत्मा देहातीत शुद्ध चैतन्य है, तब कर्तापन का भ्रम और भविष्य की चिन्ता स्वतः विलीन हो जाती है। यह परम अद्वैत दृष्टि है; व्यावहारिक जीवन में यह विवेक, उत्तरदायित्व और मानसिक संतुलन का आधार बनती है।
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भावाभावविकारश्च स्वभावान्नेति निश्चयी । निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति ॥ १ ॥
सृष्टि के परिवर्तन प्रकृति के स्वभाव से हैं; आत्मा सदा निर्विकार और शांत है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंईश्वरः सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी । अन्तर्गलितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते ॥ २ ॥
ईश्वर को ही सबका कर्ता जानने वाला समस्त आशाओं से मुक्त होकर परम शांत हो जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंआपदः सम्पदः काले दैवादेवेति निश्चयी । तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वाञ्छति न शोचति ॥ ३ ॥
सुख-दुख समय और प्रारब्ध से आते हैं; ज्ञानी न भविष्य की चाह करता है न अतीत का शोक।
पूरी व्याख्या पढ़ेंसुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवादेवेति निश्चयी । साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ४ ॥
सुख-दुख और जन्म-मरण को प्रारब्ध जानकर तनाव-मुक्त होकर कर्म कीजिए; आप कभी लिप्त नहीं होंगे।
पूरी व्याख्या पढ़ेंचिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी । तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः ॥ ५ ॥
दुःख केवल मन की चिंता से उत्पन्न होता है; चिंता छोड़ते ही मनुष्य सुखी और शांत हो जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंनाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी । कैवल्यमिव सम्प्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम् ॥ ६ ॥
‘मैं देह नहीं, शुद्ध बोध हूँ’—इस निश्चय से मनुष्य किए-अनकिए के बोझ से मुक्त होकर कैवल्य पाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंआब्रह्मस्तम्बपर्यन्तम् अहमेवेति निश्चयी । निर्विकल्पः शुचिः शान्तः प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः ॥ ७ ॥
सबमें एक ही आत्मा को देखने वाला मनुष्य विकल्पों से रहित, शांत और सदा तृप्त रहता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंनानाश्चर्यमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी । चिन्मात्रो वासनाशून्यः प्रवृत्तोऽपि शमं गतः ॥ ८ ॥
विश्व को स्वप्नवत् जानकर शुद्ध चेतना में स्थित पुरुष कार्य करते हुए भी परम शांत रहता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंग्यारहवाँ प्रकरण आठ 'निश्चय' सूत्रों का प्रकरण है। इसमें अष्टावक्र समझाते हैं कि संसार के बदलाव प्रकृति के नियम से होते हैं और ईश्वरीय विधान से घटित होते हैं। दुख का कारण वस्तुएं नहीं, मन की चिन्ता है। जब मनुष्य समझता है कि वह देह नहीं, शुद्ध चेतन बोध है, और सब कुछ उसी एक आत्मा में समाया है, तब वह बिना किसी तनाव के सहज शांति में विश्राम पाता है।
पाँच मिनट शांत बैठकर अपनी रीढ़ सीधी रखें। मन में उठने वाली किसी भी तात्कालिक चिंता को देखें और मन ही मन कहें: 'यह केवल विचार है, मैं इसका साक्षी शुद्ध बोध हूँ।' साक्षी भाव से श्वास को आते-जाते देखें। कोई भारीपन लगे तो तुरंत रुकें।
ग्यारहवें प्रकरण का मुख्य विषय आठ 'निश्चय' सूत्रों द्वारा चित्त को समस्त चिंताओं और बंधनों से मुक्त कर शुद्ध चैतन्य में स्थित करना है।
इसका अर्थ है ऐसा साधक जिसे अपने आत्मस्वरूप और जगत के नियमों का संशयरहित, अडिग बोध प्राप्त हो चुका है।
नहीं, यहाँ उपदेश परिणाम की आसक्ति और कर्तापन का अहंकार मिटाने के लिए है, ताकि मनुष्य बिना मानसिक तनाव के अपना कर्तव्य कर सके।