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अध्याय 12 · बारहवाँ प्रकरण

सहज आत्मस्थिति

संपादकीय विषय-शीर्षक · पुस्तक में नाम: बारहवाँ प्रकरण

आठ श्लोकों के इस बारहवें प्रकरण में राजा जनक शारीरिक, वाचिक और मानसिक क्रियाओं से उपराम होकर अपनी सहज, निष्प्रयत्न आत्मस्थिति और परम विश्रांति का अनुभव प्रकट करते हैं।

श्लोकों की कुल संख्या
8
अनुमानित पठन समय
लगभग 30 से 45 मिनट (अनुमान: प्रति श्लोक 4 से 6 मिनट)
मुख्य संस्कृत शब्द
कायकृत्य · वाग्विस्तर · चिन्ता · अदृश्य · समाधि · हेयोपादेय · उपरम · कृतार्थ
प्रमुख विषय
क्रिया, वाणी और चिंतन से उपरामता · विक्षेप और एकाग्रता के द्वन्द्व से परे · हठ-समाधि की सीमा और सहज समाधि · त्याग और ग्रहण से मुक्ति · आश्रम-धर्म और विकल्पों से परे · कर्म और अकर्म के आग्रह से मुक्ति · अचिन्त्य आत्मस्वरूप में विश्राम · सहज स्वभाव से कृतार्थ मुनि

चित्र-विवरण (संपादकीय): शांत जल के पास रखा पत्थर। तरंगें धीरे-धीरे थम जाती हैं। (इस अध्याय का अपना चित्र अभी बनना शेष है; यहाँ सरल सामान्य पृष्ठभूमि दिखाई गई है।)

अध्याय का परिचय

ग्यारहवें प्रकरण में गुरु अष्टावक्र द्वारा 'निश्चय' के आठ सूत्रों का उपदेश सुनने के बाद, बारहवें प्रकरण में शिष्य राजा जनक अपने अंतरंग अनुभव का निनाद करते हैं। इस प्रकरण के लगभग प्रत्येक श्लोक की अंतिम पंक्ति 'एवमेवाहमास्थितः' (इस प्रकार मैं अपने सहज स्वरूप में स्थित हूँ) है।

जनक बताते हैं कि कैसे उन्होंने हठपूर्वक कुछ करने या छोड़ने का प्रयास बंद कर दिया। पहला श्लोक (12.1) शारीरिक चेष्टाओं, वाग्विस्तार और मानसिक चिंतन से सहज उपराम होने का क्रम दिखाता है। दूसरा श्लोक (12.2) विषयों में राग न रहने और आत्मा के अदृश्य होने से विक्षेप और एकाग्रता के द्वन्द्व से छूटने का अनुभव देता है। तीसरा श्लोक (12.3) समाधि लगाने के हठ को भी एक विक्षेप समझकर स्वाभाविक स्थिति में रहने की बात करता है। चौथा श्लोक (12.4) 'हेय' (त्यागने योग्य) और 'उपादेय' (ग्रहण करने योग्य) के समाप्त होने पर हर्ष-विषाद से मुक्ति दिखाता है। पाँचवाँ श्लोक (12.5) आश्रम-धर्मों, ध्यान-विधियों और विधि-निषेधों को मन का ही विकल्प जानकर उनसे परे स्थित होने की घोषणा करता है। छठा श्लोक (12.6) अद्वैत का शिखर प्रस्तुत करता है: जैसे कर्म का अहंकार अज्ञान है, वैसे ही 'मैंने कर्म छोड़ दिया' का अभिमान भी अज्ञान है। सातवाँ श्लोक (12.7) बताता है कि अचिन्त्य आत्मा का चिंतन करने पर भी मन चिंतन का ही रूप ले लेता है, इसलिए चिंतन की चेष्टा भी छोड़ दी गई। और आठवाँ श्लोक (12.8) इस निष्प्रयत्न, स्वाभाविक आत्मस्थिति को ही मुनि का कृतार्थ होना बताता है।

सावधानी: 'कायकृत्यासहः' और 'कर्मों से उपरामता' का अर्थ आलस्य, उत्तरदायित्वहीनता या पलायन नहीं है; यह कर्तापन के मानसिक तनाव से मुक्ति का आंतरिक अनुभव है।

केंद्रीय प्रश्न

क्या आत्मशांति किसी विशेष प्रयास या ध्यान की अवस्था से पाई जाती है, या सारे बनावटी प्रयासों के थम जाने पर सहज रूप से विद्यमान रहती है?

अध्याय की मुख्य शिक्षा

राजा जनक का अनुभव दिखाता है कि परम विश्रांति किसी नई क्रिया को करने में नहीं, बल्कि शारीरिक, वाचिक और मानसिक चेष्टाओं के शांत होने में है। समाधि और व्यवहार, ग्रहण और त्याग के द्वन्द्व समाप्त हो जाने पर जो सहज स्वभाव बचता है, वही आत्मा है। यह साधक की चरम निष्प्रयत्न स्थिति है; व्यावहारिक जीवन में यह अहंकार-रहित कर्तव्य-पालन का आधार बनती है।

पढ़ने से पहले समझें

  • ‘कायकृत्यासहः’ और कर्मों से उपराम होने का अर्थ आलस्य, पलायन या कर्तव्यों का परित्याग नहीं है; यह कर्तापन के अहंकार और मानसिक तनाव से मुक्ति है। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है।
  • ‘आश्रम-अनाश्रम ध्यानम्... विकल्पं मम’ का अर्थ सामाजिक या नैतिक मर्यादाओं को तोड़ना नहीं है; यह आत्मबोध के स्तर पर विधियों की सीमा को समझना है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती।
  • ‘समाध्यादिविक्षिप्तौ’ ध्यान के अभ्यास का तिरस्कार नहीं है; यह आरंभिक साधकों के लिए नहीं, बल्कि उस स्थिति का वर्णन है जहाँ एकाग्रता का हठ भी शांत हो चुका है।
  • यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें।
  • वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है।

प्रमुख अवधारणाएँ

सहज आत्मस्थिति
बिना किसी हठ, प्रयास या बनावटी अवस्था के अपने वास्तविक स्वरूप में निरंतर विश्राम।
हेयोपादेय
किसी वस्तु को त्यागने योग्य (हेय) या ग्रहण करने योग्य (उपादेय) मानकर की जाने वाली मानसिक खींचतान।
अचिन्त्य
जो मन, बुद्धि या विचारों की सीमा में न समा सके; शुद्ध चैतन्य।
उपरम
क्रियाओं के अहंकार और तनाव का स्वतः शांत हो जाना।
कृतार्थ
जिसका जीवन-लक्ष्य पूर्ण हो चुका हो, जो परम तृप्त और संतुष्ट हो।

श्लोक-दर-श्लोक व्याख्या

8 श्लोक, पुस्तक के क्रम में। सभी श्लोक पृष्ठ से मिलान किए गए हैं।

सत्यापितसमीक्षा आवश्यक

श्लोक 12.1

सत्यापित

कायकृत्यासहस्तूर्ध्वं ततो वाग्विस्तरासहः । अथ चिन्तासहस्तस्मादेवमेवाहमास्थितः ॥ १ ॥

क्रिया, वाणी और चिंतन के विस्तार से उपराम होकर मैं अपने सहज आत्मस्वरूप में स्थित हूँ।

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श्लोक 12.2

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प्रीत्यभावेन शब्दादेरदृश्यत्वेन चात्मनः । विक्षेपैकाग्र्यहृदय एवमेवाहमास्थितः ॥ २ ॥

विषयों में राग न रहने और आत्मा के ज्ञाता स्वरूप को जानने से मैं सहज स्थिति में स्थित हूँ।

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श्लोक 12.3

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समाध्यादिविक्षिप्तौ व्यवहारसमाधये । एवं विलोक्य नियमम् एवमेवाहमास्थितः ॥ ३ ॥

समाधि के हठ और व्यवहार के भेद को मिटाकर ज्ञानी अपने सहज स्वरूप में शांत रहता है।

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श्लोक 12.4

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हेयोपादेयविरहादेवं हर्षविषादयोः । अभावादद्य हे ब्रह्मन्नेवमेवाहमास्थितः ॥ ४ ॥

ग्रहण और त्याग से परे होकर, हर्ष और विषाद से मुक्त मैं अपने सहज स्वरूप में स्थित हूँ।

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श्लोक 12.5

सत्यापित

आश्रमानाश्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनम् । विकल्पं मम वीक्ष्यैतदेवमेवाहमास्थितः ॥ ५ ॥

आश्रम, ध्यान और नियमों को मन का विकल्प जानकर मैं अपने सहज स्वरूप में स्थित हूँ।

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श्लोक 12.6

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कर्मानुष्ठानमज्ञानाद्यथैवोपरमस्तथा । बुद्ध्वा सम्यगिदं तत्त्वमेवमेवाहमास्थितः ॥ ६ ॥

कर्म करना और कर्म छोड़ना दोनों मन का खेल हैं; तत्व को जानकर ज्ञानी सहज स्वरूप में स्थित रहता है।

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श्लोक 12.7

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अचिन्त्यं चिन्त्यमानोऽपि चिन्तारूपं भजत्यसौ । त्यक्त्वा तद्भावनं तस्मादेवमेवाहमास्थितः ॥ ७ ॥

अचिन्त्य आत्मा पर सोचना भी विचार ही है; चिंतन छोड़कर मैं सहज स्वरूप में स्थित हूँ।

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श्लोक 12.8

सत्यापित

एवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेन्मुनिः । एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेन्मुनिः ॥ ८ ॥

सहज आत्मस्थिति को अपना स्वभाव बना लेने वाला मुनि ही जीवन में सच्चा कृतार्थ होता है।

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अध्याय का सरल सार

बारहवाँ प्रकरण सहज आत्मस्थिति का प्रकरण है जहाँ राजा जनक अपने अंतर का बोध प्रकट करते हैं। वे बताते हैं कि कर्म, वाणी और विचारों का तनाव छूटने पर वे अपने स्वरूप में स्थित हुए। न विषयों में राग रहा और न समाधि का हठ। त्याग और ग्रहण के द्वन्द्व से परे होकर वे अचिन्त्य आत्मा में विश्राम पा चुके हैं। यही मुनि का सहज और कृतार्थ जीवन है।

पाँच प्रमुख शिक्षाएँ

  1. शरीर, वाणी और मन की व्यर्थ चेष्टाएँ शांत होने पर सहज आत्मविश्रांति प्रकट होती है। (12.1)
  2. आत्मा को देखने या एकाग्र करने की वस्तु न मानकर उसके साक्षी स्वरूप में रहना ही सच्ची स्थिरता है। (12.2, 12.3)
  3. पकड़ने और छोड़ने (हेय-उपादेय) की ललक समाप्त होने पर मन हर्ष और विषाद से मुक्त हो जाता है। (12.4)
  4. कर्म करना जितना अज्ञान है, 'मैंने कर्म छोड़ दिया' का हठ भी उतना ही अहंकार है; साक्षी दोनों से परे है। (12.5, 12.6)
  5. अचिन्त्य आत्मा को विचारों में बाँधने की चेष्टा छोड़कर सहज मौन में स्थित होना ही जीवन की कृतार्थता है। (12.7, 12.8)

सामान्य गलतफहमियाँ

  • ‘कायकृत्यासहः’ का अर्थ काम-धंधा छोड़कर अकर्मण्य बैठ जाना नहीं है।
  • ‘समाध्यादिविक्षिप्तौ’ ध्यान के अभ्यास का विरोध नहीं है, बल्कि उसके हठ और अहंकार से मुक्ति है।
  • विधि-निषेध से परे होने का अर्थ नैतिक या सामाजिक कानूनों का उल्लंघन करना नहीं है।
  • ‘हेयोपादेयविरहात्’ का अर्थ जीवन की ज़रूरतों या दूसरों की भलाई के प्रति लापरवाह होना नहीं है।
  • यदि मानसिक भारीपन या उदासी सताए, तो किसी योग्य चिकित्सक या सहायता-सेवा से परामर्श लें।

आत्मचिंतन प्रश्न

  1. मेरे कौन-से कार्य और विचार केवल अहंकार और आदत की वजह से चल रहे हैं, जिनकी कोई वास्तविक ज़रूरत नहीं?
  2. क्या मैं शांति पाने के लिए भी एक नया मानसिक तनाव (हठ) तो पैदा नहीं कर रहा?
  3. यदि मैं पकड़ने और छोड़ने की ज़बरदस्ती ढीली कर दूँ, तो मेरा वर्तमान क्षण कितना हल्का हो जाएगा?

संक्षिप्त चिंतन अभ्यास

पाँच मिनट आराम से बैठें। शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ दें। न कोई विचार लाने की कोशिश करें, न रोकने की। न कुछ पाने का लक्ष्य रखें, न कुछ छोड़ने का। केवल 'जैसी स्थिति है, वैसी है' के सहज भाव में मौन विश्राम करें। यदि कोई असुविधा हो तो सामान्य स्थिति में आ जाएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बारहवें प्रकरण का मुख्य विषय क्या है?

बारहवें प्रकरण का मुख्य विषय राजा जनक द्वारा शारीरिक, वाचिक और मानसिक क्रियाओं से उपराम होकर सहज आत्मस्थिति में विश्राम पाने का अनुभव है।

‘एवमेवाहमास्थितः’ का क्या आशय है?

इसका अर्थ है 'इस प्रकार मैं अपने सहज आत्मस्वरूप में स्थित हूँ'—यह जनक की निष्प्रयत्न, स्वाभाविक आत्मनिष्ठा का उद्घोष है।

क्या कर्म और अकर्म दोनों को अज्ञान कहना सही है?

हाँ, क्योंकि 'मैं कर्ता हूँ' यह भी अहंकार है और 'मैंने कर्म छोड़ दिया है' यह भी अहंकार है; आत्मा इन दोनों से परे साक्षी है।