श्लोक 12.1
कायकृत्यासहस्तूर्ध्वं ततो वाग्विस्तरासहः । अथ चिन्तासहस्तस्मादेवमेवाहमास्थितः ॥ १ ॥
क्रिया, वाणी और चिंतन के विस्तार से उपराम होकर मैं अपने सहज आत्मस्वरूप में स्थित हूँ।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअध्याय 12 · बारहवाँ प्रकरण
आठ श्लोकों के इस बारहवें प्रकरण में राजा जनक शारीरिक, वाचिक और मानसिक क्रियाओं से उपराम होकर अपनी सहज, निष्प्रयत्न आत्मस्थिति और परम विश्रांति का अनुभव प्रकट करते हैं।
ग्यारहवें प्रकरण में गुरु अष्टावक्र द्वारा 'निश्चय' के आठ सूत्रों का उपदेश सुनने के बाद, बारहवें प्रकरण में शिष्य राजा जनक अपने अंतरंग अनुभव का निनाद करते हैं। इस प्रकरण के लगभग प्रत्येक श्लोक की अंतिम पंक्ति 'एवमेवाहमास्थितः' (इस प्रकार मैं अपने सहज स्वरूप में स्थित हूँ) है।
जनक बताते हैं कि कैसे उन्होंने हठपूर्वक कुछ करने या छोड़ने का प्रयास बंद कर दिया। पहला श्लोक (12.1) शारीरिक चेष्टाओं, वाग्विस्तार और मानसिक चिंतन से सहज उपराम होने का क्रम दिखाता है। दूसरा श्लोक (12.2) विषयों में राग न रहने और आत्मा के अदृश्य होने से विक्षेप और एकाग्रता के द्वन्द्व से छूटने का अनुभव देता है। तीसरा श्लोक (12.3) समाधि लगाने के हठ को भी एक विक्षेप समझकर स्वाभाविक स्थिति में रहने की बात करता है। चौथा श्लोक (12.4) 'हेय' (त्यागने योग्य) और 'उपादेय' (ग्रहण करने योग्य) के समाप्त होने पर हर्ष-विषाद से मुक्ति दिखाता है। पाँचवाँ श्लोक (12.5) आश्रम-धर्मों, ध्यान-विधियों और विधि-निषेधों को मन का ही विकल्प जानकर उनसे परे स्थित होने की घोषणा करता है। छठा श्लोक (12.6) अद्वैत का शिखर प्रस्तुत करता है: जैसे कर्म का अहंकार अज्ञान है, वैसे ही 'मैंने कर्म छोड़ दिया' का अभिमान भी अज्ञान है। सातवाँ श्लोक (12.7) बताता है कि अचिन्त्य आत्मा का चिंतन करने पर भी मन चिंतन का ही रूप ले लेता है, इसलिए चिंतन की चेष्टा भी छोड़ दी गई। और आठवाँ श्लोक (12.8) इस निष्प्रयत्न, स्वाभाविक आत्मस्थिति को ही मुनि का कृतार्थ होना बताता है।
सावधानी: 'कायकृत्यासहः' और 'कर्मों से उपरामता' का अर्थ आलस्य, उत्तरदायित्वहीनता या पलायन नहीं है; यह कर्तापन के मानसिक तनाव से मुक्ति का आंतरिक अनुभव है।
क्या आत्मशांति किसी विशेष प्रयास या ध्यान की अवस्था से पाई जाती है, या सारे बनावटी प्रयासों के थम जाने पर सहज रूप से विद्यमान रहती है?
राजा जनक का अनुभव दिखाता है कि परम विश्रांति किसी नई क्रिया को करने में नहीं, बल्कि शारीरिक, वाचिक और मानसिक चेष्टाओं के शांत होने में है। समाधि और व्यवहार, ग्रहण और त्याग के द्वन्द्व समाप्त हो जाने पर जो सहज स्वभाव बचता है, वही आत्मा है। यह साधक की चरम निष्प्रयत्न स्थिति है; व्यावहारिक जीवन में यह अहंकार-रहित कर्तव्य-पालन का आधार बनती है।
सत्यापितसमीक्षा आवश्यक
कायकृत्यासहस्तूर्ध्वं ततो वाग्विस्तरासहः । अथ चिन्तासहस्तस्मादेवमेवाहमास्थितः ॥ १ ॥
क्रिया, वाणी और चिंतन के विस्तार से उपराम होकर मैं अपने सहज आत्मस्वरूप में स्थित हूँ।
पूरी व्याख्या पढ़ेंप्रीत्यभावेन शब्दादेरदृश्यत्वेन चात्मनः । विक्षेपैकाग्र्यहृदय एवमेवाहमास्थितः ॥ २ ॥
विषयों में राग न रहने और आत्मा के ज्ञाता स्वरूप को जानने से मैं सहज स्थिति में स्थित हूँ।
पूरी व्याख्या पढ़ेंसमाध्यादिविक्षिप्तौ व्यवहारसमाधये । एवं विलोक्य नियमम् एवमेवाहमास्थितः ॥ ३ ॥
समाधि के हठ और व्यवहार के भेद को मिटाकर ज्ञानी अपने सहज स्वरूप में शांत रहता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंहेयोपादेयविरहादेवं हर्षविषादयोः । अभावादद्य हे ब्रह्मन्नेवमेवाहमास्थितः ॥ ४ ॥
ग्रहण और त्याग से परे होकर, हर्ष और विषाद से मुक्त मैं अपने सहज स्वरूप में स्थित हूँ।
पूरी व्याख्या पढ़ेंआश्रमानाश्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनम् । विकल्पं मम वीक्ष्यैतदेवमेवाहमास्थितः ॥ ५ ॥
आश्रम, ध्यान और नियमों को मन का विकल्प जानकर मैं अपने सहज स्वरूप में स्थित हूँ।
पूरी व्याख्या पढ़ेंकर्मानुष्ठानमज्ञानाद्यथैवोपरमस्तथा । बुद्ध्वा सम्यगिदं तत्त्वमेवमेवाहमास्थितः ॥ ६ ॥
कर्म करना और कर्म छोड़ना दोनों मन का खेल हैं; तत्व को जानकर ज्ञानी सहज स्वरूप में स्थित रहता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअचिन्त्यं चिन्त्यमानोऽपि चिन्तारूपं भजत्यसौ । त्यक्त्वा तद्भावनं तस्मादेवमेवाहमास्थितः ॥ ७ ॥
अचिन्त्य आत्मा पर सोचना भी विचार ही है; चिंतन छोड़कर मैं सहज स्वरूप में स्थित हूँ।
पूरी व्याख्या पढ़ेंएवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेन्मुनिः । एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेन्मुनिः ॥ ८ ॥
सहज आत्मस्थिति को अपना स्वभाव बना लेने वाला मुनि ही जीवन में सच्चा कृतार्थ होता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंबारहवाँ प्रकरण सहज आत्मस्थिति का प्रकरण है जहाँ राजा जनक अपने अंतर का बोध प्रकट करते हैं। वे बताते हैं कि कर्म, वाणी और विचारों का तनाव छूटने पर वे अपने स्वरूप में स्थित हुए। न विषयों में राग रहा और न समाधि का हठ। त्याग और ग्रहण के द्वन्द्व से परे होकर वे अचिन्त्य आत्मा में विश्राम पा चुके हैं। यही मुनि का सहज और कृतार्थ जीवन है।
पाँच मिनट आराम से बैठें। शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ दें। न कोई विचार लाने की कोशिश करें, न रोकने की। न कुछ पाने का लक्ष्य रखें, न कुछ छोड़ने का। केवल 'जैसी स्थिति है, वैसी है' के सहज भाव में मौन विश्राम करें। यदि कोई असुविधा हो तो सामान्य स्थिति में आ जाएँ।
बारहवें प्रकरण का मुख्य विषय राजा जनक द्वारा शारीरिक, वाचिक और मानसिक क्रियाओं से उपराम होकर सहज आत्मस्थिति में विश्राम पाने का अनुभव है।
इसका अर्थ है 'इस प्रकार मैं अपने सहज आत्मस्वरूप में स्थित हूँ'—यह जनक की निष्प्रयत्न, स्वाभाविक आत्मनिष्ठा का उद्घोष है।
हाँ, क्योंकि 'मैं कर्ता हूँ' यह भी अहंकार है और 'मैंने कर्म छोड़ दिया है' यह भी अहंकार है; आत्मा इन दोनों से परे साक्षी है।