दृश्य, गति और थीम की सेटिंग(इस डिवाइस पर सहेजी जाती हैं)
दृश्य मोड
गति
थीम

आपके डिवाइस की “कम गति” सेटिंग हमेशा मानी जाती है। “केवल पाठ” मोड में कोई सजावटी चित्र या गति नहीं रहती।

अध्याय 13 · तेरहवाँ प्रकरण

सहज सुख

संपादकीय विषय-शीर्षक · पुस्तक में नाम: तेरहवाँ प्रकरण

सात श्लोकों के इस तेरहवें प्रकरण में राजा जनक संग्रह और त्याग के द्वंद्व से परे होकर अपनी अकिंचनता, निष्कामता और 'यथासुखम्' सहज आत्म-आनंद की स्थिति का वर्णन करते हैं।

श्लोकों की कुल संख्या
7
अनुमानित पठन समय
लगभग 25 से 35 मिनट (अनुमान: प्रति श्लोक 4 से 5 मिनट)
मुख्य संस्कृत शब्द
अकिञ्चन · स्वास्थ्य · यथासुखम् · पुरुषार्थ · अकर्ता · कर्मनैष्कर्म्य · सिद्धि · शुभाशुभ
प्रमुख विषय
अकिंचनता का आंतरिक स्वास्थ्य · हठ-साधना के क्लेशों से मुक्ति · सहज प्रारब्ध-कर्म और अकर्ता-भाव · कर्म और नैष्कर्म्य के द्वंद्व से परे · उठने, बैठने और सोने में समता · हानि और लाभ के उल्लास से मुक्ति · सुख-दुःख की क्षणभंगुरता और परम विश्राम

चित्र-विवरण (संपादकीय): दिन के उजाले में खिला कमल। कमल बिना ज़ोर के धीरे खिलता है। (इस अध्याय का अपना चित्र अभी बनना शेष है; यहाँ सरल सामान्य पृष्ठभूमि दिखाई गई है।)

अध्याय का परिचय

बारहवें प्रकरण में आत्मस्थिति की घोषणा करने के बाद, तेरहवें प्रकरण में राजा जनक अपने सहज जीवन-रस का साक्षात्कार प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकरण के प्रत्येक श्लोक की अंतिम टेक 'अहमासे यथासुखम्' (मैं सहज सुख में स्थित हूँ) है।

जनक स्पष्ट करते हैं कि आंतरिक शांति (स्वास्थ्य) केवल बाहरी वेशभूषा या लंगोटी पहनने से नहीं मिलती (13.1)। जब तक छोड़ने और पकड़ने का द्वंद्व बना है, तब तक शांति असंभव है। दूसरे श्लोक (13.2) में वे बताते हैं कि हठपूर्वक देह, वाणी और मन को तपाने के सारे क्लेश उन्होंने त्याग दिए हैं और वास्तविक आत्म-पुरुषार्थ में टिक गए हैं। तीसरे श्लोक (13.3) में वे कर्म का महान सूत्र देते हैं: आत्मा तत्त्वतः अकर्ता है, अतः जब जो कर्तव्य सामने आता है, उसे सहजता से निभाकर वे सुखपूर्वक रहते हैं। चौथे श्लोक (13.4) में वे देहाभिमानी योगियों के कर्म और अकर्म के आग्रहों से परे होने की बात कहते हैं। पाँचवें (13.5) और छठे (13.6) श्लोक में वे दिखाते हैं कि चलने, बैठने, सोने या जागने से आत्मा की कोई हानि या लाभ नहीं होता, इसलिए वे हानि-लाभ के हर्ष-शोक से मुक्त हैं। सातवें श्लोक (13.7) में वे संसार के सुख-दुःखों की चंचलता देखकर शुभ-अशुभ के पार अपने अखंड आनंद में विश्राम पाते हैं।

सावधानी: 'यथासुखम्' का अर्थ उच्छृंखलता, प्रमाद या भोगवाद नहीं है; यह कर्तापन के अहम् से मुक्त होकर प्राप्त होने वाली आंतरिक समरसता और अनासक्ति है।

केंद्रीय प्रश्न

क्या सच्चा सुख त्याग करने में है, या त्याग और भोग दोनों के मानसिक तनाव से मुक्त होकर अपनी स्वाभाविक चेतना में जीने में है?

अध्याय की मुख्य शिक्षा

राजा जनक का उद्गार सिखाता है कि आत्म-सुख किसी बाहरी वेशभूषा, संन्यास या हठ-साधना का परिणाम नहीं है। जब व्यक्ति संग्रह और त्याग के आग्रह को छोड़कर वर्तमान में प्राप्त कर्तव्यों को अकर्ता-भाव से करता है, तो हर परिस्थिति में 'यथासुखम्' परम शांति बनी रहती है।

पढ़ने से पहले समझें

  • ‘त्यागादाने विहायास्मादहमासे यथासुखम्’ का अर्थ पारिवारिक, व्यावसायिक या सामाजिक ज़िम्मेदारियों से भागना नहीं है। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है।
  • ‘यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वासे यथासुखम्’ का अर्थ विधि-निषेध और नैतिक मर्यादाओं की अनदेखी नहीं है। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है।
  • ‘स्वपतो नास्ति मे हानिः’ प्रमाद या आलस्य को उचित ठहराना नहीं है; यह आत्मा के नित्यसिद्ध और अविकारी स्वभाव का प्रतिपादन है। आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है।
  • तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है।
  • यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें।

प्रमुख अवधारणाएँ

यथासुखम्
जैसी भी परिस्थिति सामने आए, उसमें बिना मानसिक प्रतिरोध या आसक्ति के आत्म-स्वरूप में आनंदपूर्वक टिके रहना।
अकिञ्चनता
किसी भी बाहरी वस्तु, उपाधि या अहंकार के प्रति 'यह मेरा है' की भावना न होना; आंतरिक पूर्णता।
कर्म-नैष्कर्म्य-मुक्ति
कर्म करने या कर्म छोड़ने के हठ से परे होकर निष्काम भाव से जीवन जीना।

श्लोक-दर-श्लोक व्याख्या

7 श्लोक, पुस्तक के क्रम में। सभी श्लोक पृष्ठ से मिलान किए गए हैं।

सत्यापितसमीक्षा आवश्यक

श्लोक 13.1

सत्यापित

अकिञ्चनभवं स्वास्थ्यं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम् । त्यागादाने विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ १ ॥

त्याग और संग्रह दोनों का तनाव छोड़कर मैं अपने सहज आत्म-आनंद में सुखपूर्वक स्थित हूँ।

पूरी व्याख्या पढ़ें

श्लोक 13.2

सत्यापित

कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते । मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम् ॥ २ ॥

शरीर, वाणी और मन के बनावटी क्लेशों को छोड़कर मैं अपने सहज आत्मस्वरूप में सुखपूर्वक स्थित हूँ।

पूरी व्याख्या पढ़ें

श्लोक 13.3

सत्यापित

कृतं किमपि नैव स्यादिति सञ्चिन्त्य तत्त्वतः । यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वासे यथासुखम् ॥ ३ ॥

आत्मा को अकर्ता जानकर जो कर्तव्य सामने आए उसे सहजता से करके मैं सुखपूर्वक स्थित रहता हूँ।

पूरी व्याख्या पढ़ें

श्लोक 13.4

सत्यापित

कर्मनैष्कर्म्यनिर्बन्धभावा देहस्थयोगिनः । संयोगायोगविरहादहमासे यथासुखम् ॥ ४ ॥

कर्म और अकर्म के आग्रहों से परे होकर, संयोग और वियोग के भय से मुक्त मैं सुखपूर्वक स्थित हूँ।

पूरी व्याख्या पढ़ें

श्लोक 13.5

सत्यापित

अर्थानर्थौ न मे स्थित्या गत्या न शयनेन वा । तिष्ठन्गच्छन्स्वपंस्तस्मादहमासे यथासुखम् ॥ ५ ॥

उठने, चलने या सोने से आत्मा की कोई हानि-लाभ नहीं होती; अतः हर अवस्था में मैं सुखपूर्वक स्थित हूँ।

पूरी व्याख्या पढ़ें

श्लोक 13.6

सत्यापित

स्वपतो नास्ति मे हानिः सिद्धिर्यत्नवतो न वा । नाशोल्लासौ विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ६ ॥

हानि के शोक और लाभ के उल्लास को त्यागकर मैं अपने नित्यसिद्ध स्वरूप में सुखपूर्वक स्थित हूँ।

पूरी व्याख्या पढ़ें

श्लोक 13.7

सत्यापित

सुखादिरूपानियमं भावेष्वालोक्य भूरिशः । शुभाशुभे विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ७ ॥

संसार में सुख-दुःख की अनिश्चितता देखकर, शुभ-अशुभ के पार मैं अपने सहज आनंद में सुखपूर्वक स्थित हूँ।

पूरी व्याख्या पढ़ें

अध्याय का सरल सार

तेरहवाँ प्रकरण सहज सुख और परम तृप्ति का प्रकरण है जहाँ राजा जनक 'अहमासे यथासुखम्' की गूँज के साथ बताते हैं कि संग्रह और त्याग दोनों का तनाव छूटने पर सच्चा स्वास्थ्य मिलता है। हठ-साधना के क्लेशों से हटकर, सामने आए कर्तव्य को अकर्ता भाव से पूरा करते हुए, वे लाभ-हानि, उठने-बैठने और सोने-जागने के द्वंद्व से मुक्त होकर अखंड आत्म-आनंद में विश्राम पाते हैं।

पाँच प्रमुख शिक्षाएँ

  1. सच्ची आंतरिक शांति केवल वेशभूषा या त्याग के अहंकार से नहीं, बल्कि पकड़ने और छोड़ने दोनों के तनाव से मुक्त होने पर मिलती है। (13.1)
  2. हठपूर्वक देह, वाणी और मन को तपाने के क्लेश छोड़कर स्वाभाविक आत्मस्वरूप में टिकना ही श्रेष्ठ पुरुषार्थ है। (13.2)
  3. आत्मा को अकर्ता जानकर वर्तमान में प्राप्त कर्तव्य को बिना व्यक्तिगत अहंकार के निष्काम भाव से संपन्न करना चाहिए। (13.3)
  4. कर्म करने का हठ और कर्म छोड़ने का आग्रह दोनों देहाभिमान के रूप हैं; साक्षी आत्मा दोनों से परे है। (13.4, 13.5)
  5. आत्मा नित्यसिद्ध है; लाभ में उल्लास और हानि में शोक छोड़कर जीवन के उतार-चढ़ाव में समरस रहना ही यथासुखम् है। (13.6, 13.7)

सामान्य गलतफहमियाँ

  • ‘यथासुखम्’ का अर्थ भौतिक सुख-सुविधाओं का भोग या मनमाना आचरण नहीं है।
  • ‘त्यागादाने विहाय’ का अर्थ समाज या परिवार के कर्तव्यों का परित्याग करना नहीं है।
  • ‘स्वपतो नास्ति मे हानिः’ का अर्थ आलस्य या दिनभर सोते रहना नहीं है।
  • ‘कृतं किमपि नैव स्यात्’ का अर्थ अकर्मण्यता या निष्क्रियता को बढ़ावा देना नहीं है।
  • यदि मानसिक तनाव या अवसाद की स्थिति हो, तो विशेषज्ञ चिकित्सक या सहायता-सेवा से संपर्क करें।

आत्मचिंतन प्रश्न

  1. क्या मैं किसी वस्तु को पाने या त्यागने के अहंकार में अपनी वर्तमान शांति खो रहा हूँ?
  2. जब कोई अप्रत्याशित काम सामने आता है, तो क्या मैं शिकायत करता हूँ या उसे सहजता से पूरा करता हूँ?
  3. क्या मेरी खुशी केवल लाभ और हानि के तराजू पर तौली जा रही है?

संक्षिप्त चिंतन अभ्यास

पाँच मिनट आराम से बैठें। मन से यह संकल्प हटा दें कि मुझे कुछ हासिल करना है या कुछ त्यागना है। अपने सामने उपस्थित क्षण को पूरी तरह स्वीकार करें और मन में कहें: 'अहमासे यथासुखम्—मैं अपने सहज स्वरूप में शांत हूँ।' यदि कोई असुविधा हो तो सामान्य स्थिति में आ जाएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तेरहवें प्रकरण का मुख्य सूत्र क्या है?

तेरहवें प्रकरण का मुख्य सूत्र 'अहमासे यथासुखम्' है, जिसका अर्थ है संग्रह और त्याग के द्वंद्व से मुक्त होकर सहज आत्म-आनंद में स्थित रहना।

‘कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम्’ से जनक क्या कहना चाहते हैं?

जनक समझाते हैं कि केवल लंगोटी पहनकर संन्यासी बन जाने से शांति नहीं मिलती यदि मन में त्याग का अहंकार बना रहे।

‘यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वासे’ का कर्म के लिए क्या संदेश है?

यह कर्मयोग का सर्वोच्च संदेश है: बिना किसी व्यक्तिगत अहंकार या चिंता के, प्रारब्धवश सामने आए कर्तव्य को निष्काम भाव से करना।