श्लोक 13.1
अकिञ्चनभवं स्वास्थ्यं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम् । त्यागादाने विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ १ ॥
त्याग और संग्रह दोनों का तनाव छोड़कर मैं अपने सहज आत्म-आनंद में सुखपूर्वक स्थित हूँ।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअध्याय 13 · तेरहवाँ प्रकरण
सात श्लोकों के इस तेरहवें प्रकरण में राजा जनक संग्रह और त्याग के द्वंद्व से परे होकर अपनी अकिंचनता, निष्कामता और 'यथासुखम्' सहज आत्म-आनंद की स्थिति का वर्णन करते हैं।
बारहवें प्रकरण में आत्मस्थिति की घोषणा करने के बाद, तेरहवें प्रकरण में राजा जनक अपने सहज जीवन-रस का साक्षात्कार प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकरण के प्रत्येक श्लोक की अंतिम टेक 'अहमासे यथासुखम्' (मैं सहज सुख में स्थित हूँ) है।
जनक स्पष्ट करते हैं कि आंतरिक शांति (स्वास्थ्य) केवल बाहरी वेशभूषा या लंगोटी पहनने से नहीं मिलती (13.1)। जब तक छोड़ने और पकड़ने का द्वंद्व बना है, तब तक शांति असंभव है। दूसरे श्लोक (13.2) में वे बताते हैं कि हठपूर्वक देह, वाणी और मन को तपाने के सारे क्लेश उन्होंने त्याग दिए हैं और वास्तविक आत्म-पुरुषार्थ में टिक गए हैं। तीसरे श्लोक (13.3) में वे कर्म का महान सूत्र देते हैं: आत्मा तत्त्वतः अकर्ता है, अतः जब जो कर्तव्य सामने आता है, उसे सहजता से निभाकर वे सुखपूर्वक रहते हैं। चौथे श्लोक (13.4) में वे देहाभिमानी योगियों के कर्म और अकर्म के आग्रहों से परे होने की बात कहते हैं। पाँचवें (13.5) और छठे (13.6) श्लोक में वे दिखाते हैं कि चलने, बैठने, सोने या जागने से आत्मा की कोई हानि या लाभ नहीं होता, इसलिए वे हानि-लाभ के हर्ष-शोक से मुक्त हैं। सातवें श्लोक (13.7) में वे संसार के सुख-दुःखों की चंचलता देखकर शुभ-अशुभ के पार अपने अखंड आनंद में विश्राम पाते हैं।
सावधानी: 'यथासुखम्' का अर्थ उच्छृंखलता, प्रमाद या भोगवाद नहीं है; यह कर्तापन के अहम् से मुक्त होकर प्राप्त होने वाली आंतरिक समरसता और अनासक्ति है।
क्या सच्चा सुख त्याग करने में है, या त्याग और भोग दोनों के मानसिक तनाव से मुक्त होकर अपनी स्वाभाविक चेतना में जीने में है?
राजा जनक का उद्गार सिखाता है कि आत्म-सुख किसी बाहरी वेशभूषा, संन्यास या हठ-साधना का परिणाम नहीं है। जब व्यक्ति संग्रह और त्याग के आग्रह को छोड़कर वर्तमान में प्राप्त कर्तव्यों को अकर्ता-भाव से करता है, तो हर परिस्थिति में 'यथासुखम्' परम शांति बनी रहती है।
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अकिञ्चनभवं स्वास्थ्यं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम् । त्यागादाने विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ १ ॥
त्याग और संग्रह दोनों का तनाव छोड़कर मैं अपने सहज आत्म-आनंद में सुखपूर्वक स्थित हूँ।
पूरी व्याख्या पढ़ेंकुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते । मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम् ॥ २ ॥
शरीर, वाणी और मन के बनावटी क्लेशों को छोड़कर मैं अपने सहज आत्मस्वरूप में सुखपूर्वक स्थित हूँ।
पूरी व्याख्या पढ़ेंकृतं किमपि नैव स्यादिति सञ्चिन्त्य तत्त्वतः । यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वासे यथासुखम् ॥ ३ ॥
आत्मा को अकर्ता जानकर जो कर्तव्य सामने आए उसे सहजता से करके मैं सुखपूर्वक स्थित रहता हूँ।
पूरी व्याख्या पढ़ेंकर्मनैष्कर्म्यनिर्बन्धभावा देहस्थयोगिनः । संयोगायोगविरहादहमासे यथासुखम् ॥ ४ ॥
कर्म और अकर्म के आग्रहों से परे होकर, संयोग और वियोग के भय से मुक्त मैं सुखपूर्वक स्थित हूँ।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअर्थानर्थौ न मे स्थित्या गत्या न शयनेन वा । तिष्ठन्गच्छन्स्वपंस्तस्मादहमासे यथासुखम् ॥ ५ ॥
उठने, चलने या सोने से आत्मा की कोई हानि-लाभ नहीं होती; अतः हर अवस्था में मैं सुखपूर्वक स्थित हूँ।
पूरी व्याख्या पढ़ेंस्वपतो नास्ति मे हानिः सिद्धिर्यत्नवतो न वा । नाशोल्लासौ विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ६ ॥
हानि के शोक और लाभ के उल्लास को त्यागकर मैं अपने नित्यसिद्ध स्वरूप में सुखपूर्वक स्थित हूँ।
पूरी व्याख्या पढ़ेंसुखादिरूपानियमं भावेष्वालोक्य भूरिशः । शुभाशुभे विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ७ ॥
संसार में सुख-दुःख की अनिश्चितता देखकर, शुभ-अशुभ के पार मैं अपने सहज आनंद में सुखपूर्वक स्थित हूँ।
पूरी व्याख्या पढ़ेंतेरहवाँ प्रकरण सहज सुख और परम तृप्ति का प्रकरण है जहाँ राजा जनक 'अहमासे यथासुखम्' की गूँज के साथ बताते हैं कि संग्रह और त्याग दोनों का तनाव छूटने पर सच्चा स्वास्थ्य मिलता है। हठ-साधना के क्लेशों से हटकर, सामने आए कर्तव्य को अकर्ता भाव से पूरा करते हुए, वे लाभ-हानि, उठने-बैठने और सोने-जागने के द्वंद्व से मुक्त होकर अखंड आत्म-आनंद में विश्राम पाते हैं।
पाँच मिनट आराम से बैठें। मन से यह संकल्प हटा दें कि मुझे कुछ हासिल करना है या कुछ त्यागना है। अपने सामने उपस्थित क्षण को पूरी तरह स्वीकार करें और मन में कहें: 'अहमासे यथासुखम्—मैं अपने सहज स्वरूप में शांत हूँ।' यदि कोई असुविधा हो तो सामान्य स्थिति में आ जाएँ।
तेरहवें प्रकरण का मुख्य सूत्र 'अहमासे यथासुखम्' है, जिसका अर्थ है संग्रह और त्याग के द्वंद्व से मुक्त होकर सहज आत्म-आनंद में स्थित रहना।
जनक समझाते हैं कि केवल लंगोटी पहनकर संन्यासी बन जाने से शांति नहीं मिलती यदि मन में त्याग का अहंकार बना रहे।
यह कर्मयोग का सर्वोच्च संदेश है: बिना किसी व्यक्तिगत अहंकार या चिंता के, प्रारब्धवश सामने आए कर्तव्य को निष्काम भाव से करना।