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प्रकरण 13: तेरहवाँ प्रकरणश्लोक २/७29%

अध्याय 13 · सहज सुख

अष्टावक्र गीता, श्लोक 13.2

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: जनक (पुस्तक में वक्ता-लेबल: जनक उवाच)

कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते । मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम् ॥ २ ॥

IAST लिप्यंतरण

kutrāpi khedaḥ kāyasya jihvā kutrāpi khidyate | manaḥ kutrāpi tat tyaktvā puruṣārthe sthitaḥ sukham || 2 ||

सरल उच्चारण: kutraapi khedah kaayasya jihvaa kutraapi khidyate manah kutraapi tat tyaktvaa purushaarthe sthitah sukham (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

कुत्रापि, खेदः, कायस्य, जिह्वा, कुत्रापि, खिद्यते, मनः, कुत्रापि, तत्, त्यक्त्वा, पुरुषार्थे, स्थितः, सुखम्

कुत्रापि कायस्य खेदः
कहीं हठ-तपस्या से शरीर को कष्ट होता है
कुत्रापि जिह्वा खिद्यते
कहीं लगातार जप और पाठ से वाणी थकती है
कुत्रापि मनः (खिद्यते)
कहीं बलपूर्वक एकाग्रता साधने से मन थकता है
तत् त्यक्त्वा
उन सब कृत्रिम क्लेशों को छोड़कर
पुरुषार्थे स्थितः
परम पुरुषार्थ (सहज आत्मस्वरूप) में स्थित होकर
सुखम्
मैं सुखपूर्वक विश्राम पाता हूँ

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

कहीं शरीर को कष्ट होता है, कहीं वाणी थक जाती है, और कहीं मन खिन्न होता है; उन सबको छोड़कर परम पुरुषार्थ (आत्मा) में स्थित होकर मैं सुखपूर्वक हूँ।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: हठयोगियों और क्रियाकांडी लोगों को साधना में अत्यधिक शारीरिक और मानसिक श्रम करना पड़ता है। कठिन आसनों से देह दुखी होती है, निरंतर मंत्रोच्चार से जिह्वा थकती है, और चित्तवृत्ति-निरोध के हठ से मन पीड़ित होता है। राजा जनक कहते हैं कि जब यह बोध हो गया कि आत्मा तो स्वतः शुद्ध-बुद्ध-मुक्त है, तब इन सब कृत्रिम क्लेशों को विदा कर वे सीधे आत्म-पुरुषार्थ में सुखपूर्वक टिक गए।

सरल हिन्दी में समझें

इस श्लोक में राजा जनक आध्यात्मिक साधना के नाम पर किए जाने वाले जबरन कष्टों पर प्रकाश डालते हैं।

लोग सोचते हैं कि जितना शरीर को तपाएंगे, जितनी देर बिना रुके मंत्र बोलेंगे, या जितना मन को ज़ोर-ज़बरदस्ती से रोकेंगे, उतना ही पुण्य मिलेगा। लेकिन इससे शरीर थकता है, वाणी थकती है और मन चिड़चिड़ा हो जाता है।

जनक कहते हैं कि आत्मा को पाने के लिए किसी हठ की ज़रूरत नहीं है। जब वे इस बनावटी संघर्ष से बाहर आए और अपनी स्वाभाविक उपस्थिति में टिके, तो उन्हें परम सुख मिल गया।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. हठ और कृत्रिम अभ्यास की सीमा का स्पष्ट उद्घाटन करता है। 2. शरीर, वाणी और मन की थकान आत्मा के स्वरूप को नहीं जान पाती। 3. पुरुषार्थे स्थितः का तात्पर्य यहाँ चारों पुरुषार्थों के चरम फल—मोक्ष स्वरूप आत्मा—में टिकना है। 4. सहजता ही साधना की पूर्णता है; संघर्ष अज्ञान का लक्षण है। 5. यह हठ-क्लेश से सहज समाधि की ओर संक्रमण की घोषणा है। 6. व्यावहारिक स्वास्थ्य और शांति के लिए यह श्लोक अति उपयोगी दृष्टिकोण देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे पानी को शांत करने के लिए उसमें लाठी चलाना पानी को और गंदला करता है, वैसे ही मन को जबरन दबाने से थकान बढ़ती है; शांत बैठ जाना ही पानी को निर्मल करता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

आधुनिक जीवन में जब कोई ध्यान लगाने के नाम पर सिरदर्द और मानसिक तनाव पैदा कर लेता है, तो वह जनक की यह बात भूल जाता है कि ध्यान कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं, बल्कि सहज विश्रांति है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: साधना के नाम पर शरीर और मन को अनावश्यक तनाव मत दीजिए; सहज साक्षी बनकर आत्मस्वरूप में विश्राम पाइए।

सामान्य गलतफहमी

आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। इसका अर्थ यह नहीं है कि स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा की जाए अथवा साधना का अनुशासन ही छोड़ दिया जाए।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज यदि मन या शरीर किसी मानसिक तनाव से भारी लगे, तो पाँच मिनट के लिए सारे प्रयास रोककर केवल श्वास के आने-जाने के साक्षी बनें। (लगभग 5 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने दैनिक जीवन या साधना में ऐसा कोई व्यर्थ तनाव पैदा कर रहा हूँ जिससे मन और शरीर केवल थक रहे हैं?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट अपनी आँखों और माथे की मांसपेशियों को पूरी तरह ढीला छोड़ें और अनुभव करें कि बिना किसी चेष्टा के भी चेतना पूर्णतः सजग है।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: शरीर, वाणी और मन के बनावटी क्लेशों को छोड़कर मैं अपने सहज आत्मस्वरूप में सुखपूर्वक स्थित हूँ।

English

Translation: Somewhere the body tires, somewhere the tongue grows weary, somewhere the mind is strained; leaving all that, established in the Self, I abide in peace.

Simple explanation: King Janaka recognizes that forceful spiritual gymnastics strain the body, speech, and intellect. By abandoning artificial effort and resting in the natural Self, one finds effortless joy.

विषय और संबंधित श्लोक

  • सहज साधना
  • हठ-मुक्ति
  • पुरुषार्थ
  • आत्मविश्राम
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 12.1: ततो वाग्विस्तरासहः।
  • श्लोक 13.3: यदा यत्कर्तुमायाति।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 189–190 (PDF पृ. 196–197)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। जनक उवाच।