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अध्याय 12 · सहज आत्मस्थिति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 12.6
सत्यापित
मूल संस्कृत
कर्मानुष्ठानमज्ञानाद्यथैवोपरमस्तथा । बुद्ध्वा सम्यगिदं तत्त्वमेवमेवाहमास्थितः ॥ ६ ॥
IAST लिप्यंतरण
karmānuṣṭhānam ajñānād yathaivoparamas tathā | buddhvā samyag idaṃ tattvam evam evāham āsthitaḥ || 6 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
कर्मानुष्ठानम्, अज्ञानात्, यथा, एव, उपरमः, तथा, बुद्ध्वा, सम्यक्, इदम्, तत्त्वम्, एवम्, एव, अहम्, आस्थितः
- यथा कर्मानुष्ठानम् अज्ञानात्
- जैसे कर्तापन के अज्ञान से कर्मों का अनुष्ठान होता है
- तथा एव उपरमः
- वैसे ही कर्मों को हठपूर्वक छोड़ना भी अज्ञान ही है
- इदम् तत्त्वम् सम्यक् बुद्ध्वा
- इस परम सत्य को भली-भाँति समझकर
- एवम् एव
- कर्म और त्याग दोनों के अहंकार से मुक्त होकर
- अहम् आस्थितः
- मैं अपने सहज स्वरूप में स्थित हूँ
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जैसे कर्म करना अज्ञान से होता है, वैसे ही कर्म छोड़ना भी अज्ञान से ही होता है—इस तत्व को भली-भाँति जानकर मैं इस प्रकार सहज स्वरूप में स्थित हूँ।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार यह श्लोक अद्वैत बोध का अत्यंत सूक्ष्म शिखर है। जब तक मनुष्य सोचता है कि ‘मैं कर्म कर रहा हूँ’, तब तक वह अज्ञानी है। परंतु यदि वह हठपूर्वक कर्म छोड़कर सोचे कि ‘मैंने कर्मों का त्याग कर दिया है और अब मैं त्यागी हूँ’, तो वह त्याग का नया कर्ता बन जाता है। आत्मा न तो कर्म करती है और न कर्म छोड़ती है; वह तो सदा अक्रिय साक्षी है। इस तत्व को जानकर जनक कहते हैं कि मैं कर्म और त्याग दोनों के अभिमान से मुक्त होकर आत्मस्वरूप में स्थित हूँ।
सरल हिन्दी में समझें
यह श्लोक एक बहुत सूक्ष्म भ्रम को दूर करता है।
जब कोई कहता है ‘मैं बहुत काम कर रहा हूँ’, तो यह अहंकार है। लेकिन जब कोई काम छोड़कर घमंड से कहता है ‘मैंने सब कुछ छोड़ दिया है, मैं संन्यासी हूँ’, तो यह त्याग का नया अहंकार है।
आत्मा न तो कोई काम करती है और न ही कुछ छोड़ती है; वह तो केवल इन दोनों को देखने वाला प्रकाश है।
जब राजा जनक ने यह समझ लिया कि कर्म करना और कर्म छोड़ना दोनों ही मन के स्तर पर होते हैं, तो वे कर्म और त्याग दोनों की ज़िद से मुक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप में टिक गए।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. श्लोक कर्म (action) और अकर्म/उपरम (renunciation of action) दोनों को अहंकार-आधारित सिद्ध करता है। 2. बुद्ध्वा सम्यगिदं तत्त्वम् आत्म-तत्व की अक्रिय और असंग प्रकृति का यथार्थ बोध कराता है। 3. गीता के ४.१८ (कर्मण्यकर्म यः पश्येत्) का यह साक्षात दार्शनिक रूपांतर है। 4. बारहवें प्रकरण का छठा श्लोक है, जो कर्तापन के अंतिम सूक्ष्म आवरण को काटता है। 5. 12.5 के विकल्पों की समाप्ति के बाद कर्म-अकर्म के भ्रम का निवारण करता है। 6. यह आत्मिक दृष्टि है; व्यावहारिक जीवन में आवश्यक आचरण और दायित्व यथावत रहते हैं।
उदाहरण से समझें: जैसे सूर्य न तो किसी को जगाने का काम करता है और न रात में सोने का, वह केवल प्रकाशित रहता है, वैसे ही आत्मा में न कर्म है न कर्म-त्याग। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या
कर्म और कर्तापन
कर्म होता है, पर उसका पूरा स्वामित्व किसी एक सीमित “मैं” का नहीं।
आज की जिंदगी से उदाहरण
कोई व्यक्ति पहले काम के नशे में भागता है और तनाव पाता है, फिर सब छोड़कर आलस्य में बैठ जाता है और बोर होता है। जब वह समझता है कि शांति काम में या आलस्य में नहीं, बल्कि शांत साक्षी रहने में है, तब वह सहज हो जाता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: न कर्म का घमंड पालिए न त्याग का; आत्मा सदा अक्रिय और शांत है, उसी सहज भाव में स्थित रहिए।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। ‘कर्मानुष्ठानमज्ञानात्’ का अर्थ उत्तरदायित्वों से मुँह मोड़ना या आलसी बन जाना नहीं है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज अपना कर्तव्य पूरा करते हुए मन में न तो करने का घमंड आने दें और न छोड़ने का बहाना ढूँढें। (लगभग 3 मिनट)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने किए गए त्याग या अच्छे कामों का कोई गुप्त घमंड तो नहीं पाल रहा?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर कहें: ‘न मैं करने वाला हूँ, न मैं छोड़ने वाला हूँ; मैं दोनों को जानने वाला साक्षी हूँ।’
एक पंक्ति में सार: कर्म करना और कर्म छोड़ना दोनों मन का खेल हैं; तत्व को जानकर ज्ञानी सहज स्वरूप में स्थित रहता है।
English
Translation: Realizing fully that undertaking action is born of ignorance just as renouncing action is, I abide thus established in truth.
Simple explanation: Believing "I am the doer" is egoism, but proudly claiming "I have renounced action" is equally born of ego. Seeing that the Self neither acts nor refrains anchors the sage in effortless transcendence beyond both.
विषय और संबंधित श्लोक
- कर्म-अकर्म विवेक
- अकर्तापन
- त्याग का त्याग
- सहज आत्मस्थिति
- श्लोक 12.5: विकल्प-मुक्ति।
- श्लोक 12.7: अचिन्त्य आत्मस्वरूप।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। गीता के चौथे अध्याय के कर्म-अकर्म विवेचन से पूर्ण सामंजस्य।