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प्रकरण 12: बारहवाँ प्रकरणश्लोक ४/८50%

अध्याय 12 · सहज आत्मस्थिति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 12.4

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: जनक (पुस्तक में वक्ता-लेबल: जनक उवाच)

हेयोपादेयविरहादेवं हर्षविषादयोः । अभावादद्य हे ब्रह्मन्नेवमेवाहमास्थितः ॥ ४ ॥

IAST लिप्यंतरण

heyopādeyavirahād evaṃ harṣaviṣādayoḥ | abhāvād adya he brahmann evam evāham āsthitaḥ || 4 ||

सरल उच्चारण: heyopaadeyavirahaad evam harshavishaadayoh abhaavaad adya he brahmann evam evaaham aasthitah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

हेयोपादेयविरहात्, एवम्, हर्षविषादयोः, अभावात्, अद्य, हे, ब्रह्मन्, एवम्, एव, अहम्, आस्थितः

हेयोपादेयविरहात्
त्यागने योग्य (हेय) और ग्रहण करने योग्य (उपादेय) के अभाव से
एवम्
तथा
हर्षविषादयोः अभावात्
हर्ष और विषाद के अभाव से
अद्य हे ब्रह्मन्
आज हे गुरुदेव (हे ब्रह्मन्)!
एवम् एव
इस प्रकार सब द्वन्द्वों से छूटकर
अहम् आस्थितः
मैं अपने आत्मस्वरूप में स्थित हूँ

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

त्यागने योग्य और ग्रहण करने योग्य कुछ न रहने से, और हर्ष तथा विषाद के समाप्त हो जाने से, हे गुरुदेव! आज मैं इस प्रकार सहज स्वरूप में स्थित हूँ।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार जब साधक के लिए न कुछ छोड़ने योग्य बचता है और न कुछ पाने योग्य, तो पकड़ने और ठुकराने की मानसिक खींचतान शांत हो जाती है। जब अनुकूल मिलने पर उल्लास (हर्ष) नहीं होता और प्रतिकूल आने पर दुख (विषाद) नहीं होता, तो हृदय परम समता में प्रतिष्ठित हो जाता है। जनक कृतज्ञतापूर्वक गुरु अष्टावक्र को सम्बोधित करते हुए कहते हैं: हे ब्रह्मन्! अब मैं इसी अखंड समता में स्थित हूँ।

सरल हिन्दी में समझें

मनुष्य का सारा तनाव दो चीज़ों में फँसा रहता है: ‘मुझे यह पाना है’ (उपादेय) और ‘मुझे इससे बचना है’ (हेय)। इसी से जीवन में कभी अत्यधिक खुशी (हर्ष) और कभी गहरा दुख (विषाद) आता है।

राजा जनक कहते हैं: जब मैंने देखा कि आत्मा में न कुछ घटता है न बढ़ता है, तो पाने और छोड़ने की यह दौड़ समाप्त हो गई।

परिणामस्वरूप न तो सफलता पर पागल होने वाला हर्ष बचा और न असफलता पर टूटने वाला विषाद। दोनों द्वन्द्वों के शांत होने पर वे अपने भीतर की गहरी समता में टिक गए।

यह किसी से विमुख होना नहीं, बल्कि जीवन के उतार-चढ़ाव में अटूट संतुलन बनाए रखना है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक हेय (त्याज्य) और उपादेय (ग्राह्य) के पार जाकर पूर्ण अद्वैत स्थिति को प्रकट करता है। 2. हर्षविषादयोरभावात् गीता के समत्वम् योग उच्यते (2.48) का जीवंत प्रमाण है। 3. हे ब्रह्मन् गुरु अष्टावक्र के प्रति शिष्य जनक के परम आदर और बोध की अभिव्यक्ति है। 4. बारहवें प्रकरण का चौथा श्लोक है, जो द्वन्द्व-मुक्ति का हृदय-स्थल है। 5. 12.3 के सहज नियम का भावनात्मक परिणाम यहाँ प्रकट होता है। 6. यह मानसिक संतुलन है; जीवन में दूसरों के प्रति संवेदनशीलता और प्रेम यथावत रहता है।

उदाहरण से समझें: जैसे दर्पण के सामने सुंदर या कुरूप वस्तु आने पर दर्पण न तो खुश होता है न दुखी, वैसे ही ज्ञानी हर्ष और विषाद से अछूता रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

एक अनुभवी न्यायाधीश दोनों पक्षों की बात सुनते समय किसी के प्रति व्यक्तिगत राग या द्वेष नहीं रखता, बल्कि न्याय और सत्य की समता में स्थिर रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: पाने और छोड़ने की मानसिक खींचतान छोड़िए; जब हर्ष और विषाद शांत होंगे, तो अखंड समता मिलेगी।

सामान्य गलतफहमी

यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। ‘हर्षविषादयोरभावात्’ का अर्थ संवेदनाहीन या पत्थर बन जाना नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी कोई अच्छी या बुरी खबर मिले, तुरंत प्रतिक्रिया देने से पहले दस सेकंड मौन रहकर अपनी भीतरी स्थिरता को छुएँ। (लगभग 2 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरी मानसिक शांति इस बात पर टिकी है कि दुनिया मेरी मनपसंद चीज़ें देती रहे?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर कहें: ‘जो आया सो अच्छा, जो गया सो अच्छा; मैं दोनों का साक्षी शुद्ध चैतन्य हूँ।’

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: ग्रहण और त्याग से परे होकर, हर्ष और विषाद से मुक्त मैं अपने सहज स्वरूप में स्थित हूँ।

English

Translation: Free from what is to be rejected or accepted, and devoid of exhilaration and despair, O holy teacher, I abide thus established today.

Simple explanation: Relinquishing the compulsive struggle to grasp pleasant things and push away unpleasant ones ends the swing between excitement and misery, anchoring the soul in majestic, steady peace.

विषय और संबंधित श्लोक

  • समता
  • हेयोपादेय-मुक्ति
  • हर्ष-विषाद से परे
  • गुरु-कृतज्ञता
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 12.3: सहज नियम।
  • श्लोक 12.5: विकल्पों से परे आत्मस्थिति।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 180–181 (PDF पृ. 187–188)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। गीता के ५.२० (न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य) से सीधा वैचारिक मेल।