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अध्याय 16 · ज्ञान-संग्रह से परे
अष्टावक्र गीता, श्लोक 16.7
सत्यापित
मूल संस्कृत
हेयोपादेयता तावत्संसारविटपाङ्कुरः । स्पृहा जीवति यावद्वै निर्विचारदशास्पदम् ॥ ७ ॥
IAST लिप्यंतरण
heyopādeyatā tāvat saṃsāraviṭapāṅkuraḥ | spṛhā jīvati yāvad vai nirvicāradaśāspadam || 7 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
हेय-उपादेयता, तावत्, संसार-विटप-अङ्कुरः, स्पृहा, जीवति, यावत्, वै, निर्विचार-दशा-आस्पदम्
- यावत् स्पृहा जीवति
- जब तक मन में किसी वस्तु की चाह या वासना जीवित रहती है
- तावत् हेय-उपादेयता
- तब तक 'यह त्यागने योग्य है और यह ग्रहण करने योग्य' का भेद
- संसार-विटप-अङ्कुरः
- संसार रूपी विशाल वृक्ष का अंकुर बना रहता है
- निर्विचार-दशा-आस्पदम् वै
- स्पृहा समाप्त होने पर ही निर्विचार शांत अवस्था का वास होता है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जब तक चाह (स्पृहा) जीवित है, तब तक ‘यह छोड़ने योग्य है और यह पकड़ने योग्य’ की बुद्धि संसार-वृक्ष का अंकुर बनी रहती है; इसके मिटने पर ही निर्विचार स्थिति आती है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: संसार रूपी वृक्ष की जड़ क्या है? अष्टावक्र कहते हैं कि वह ‘स्पृहा’ (चाह या वासना) है। जब तक मन में किसी चीज़ की चाह है, तब तक इंसान यह हिसाब लगाता रहता है कि ‘यह बुरा है इसे छोड़ूँ’ (हेय) और ‘यह अच्छा है इसे पाऊँ’ (उपादेय)। यही भेद-बुद्धि संसार को जीवित रखती है। जब अंतःकरण से हर प्रकार की चाह समाप्त हो जाती है, तब मन निर्विचार होकर अपने वास्तविक शांत स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।
सरल हिन्दी में समझें
हमारा मन लगातार दो काम करता है—कुछ चीज़ों को पकड़ना चाहता है और कुछ से छुटकारा पाना चाहता है।
अष्टावक्र कहते हैं कि यह जो "पकड़ने और छोड़ने" का खेल है, यही आपकी सारी परेशानियों और मानसिक उलझनों की जड़ है। और यह खेल सिर्फ इसलिए चलता है क्योंकि आपके अंदर कोई न कोई चाहत (स्पृहा) छिपी बैठी है।
जब आपके अंदर से किसी चीज़ को पाने की बेचैनी खत्म हो जाती है, तो यह भेद भी खत्म हो जाता है। तब मन में कोई फालतू विचार नहीं उठते और आप एक गहरी, शांत अवस्था में पहुँच जाते हैं।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. स्पृहा (इच्छा/तृष्णा) ही समस्त मानसिक द्वैत और सांसारिक विस्तार का मूल बीज है। 2. हेयोपादेयता मन का वह निर्णयकारी स्वभाव है जो राग और द्वेष के आधार पर जगत को बांटता है। 3. निर्विचार दशा वह स्थिति है जहाँ विचारों का उपशम हो जाता है क्योंकि चाहत का ईंधन समाप्त हो चुका है। 4. संसार-विटपांकुर का रूपक सिद्ध करता है कि वृक्ष की शाखाएं काटने से नहीं, बीज नष्ट करने से मुक्ति मिलती है। 5. यह बौद्ध दर्शन के तृष्णा-निरोध और वेदान्त के वासना-क्षय का सुंदर समन्वय है। 6. साधक को बाह्य वस्तुओं के त्याग के बजाय आंतरिक चाहत के विसर्जन पर ध्यान देना चाहिए।
उदाहरण से समझें: जैसे जब तक आग में घी डाला जाता रहेगा तब तक लपटें उठती रहेंगी, वैसे ही जब तक चाहत रहेगी तब तक अच्छे-बुरे के विचार मन को भटकाते रहेंगे। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
आधुनिक बाज़ार और विज्ञापन लगातार हमारे अंदर नई चाहतें जगाते हैं जिससे हम लगातार खरीदने और बदलने के चक्र में फंसे रहते हैं; अपनी बुनियादी ज़रूरतों में संतुष्ट होकर इस चक्र को तोड़ा जा सकता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मन की सारी उथल-पुथल की जड़ ‘चाहत’ है; जब चाहत शांत होती है, तब मन बिना किसी प्रयास के निर्विचार और शांत हो जाता है।
सामान्य गलतफहमी
तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। ‘हेयोपादेयता’ मिटने का अर्थ सही-गलत या भले-बुरे का व्यावहारिक विवेक खो देना नहीं है, बल्कि मानसिक आसक्ति और तनाव से मुक्त होना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब भी मन में किसी नई चीज़ को पाने की तीव्र इच्छा उठे, तो ठहरकर पूछें: "क्या इसके बिना मेरा काम चल सकता है?" (लगभग 1 मिनट)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपनी आंतरिक शांति को बाहरी चीज़ों के मिलने या छूटने की शर्तों पर निर्भर कर रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट आँखें मूँदकर बैठें और अनुभव करें: "मुझे इस क्षण कुछ नहीं चाहिए, मेरी आत्मा स्वयं तृप्त है।"
एक पंक्ति में सार: जब तक चाह जीवित है, तब तक पकड़ने-छोड़ने का भेद संसार को बढ़ाता है; चाह मिटने पर ही निर्विचार शांति मिलती है।
English
Translation: As long as craving lives, the discrimination of "this is to be rejected and this accepted" remains the sprout of the tree of worldly existence.
Simple explanation: Craving (spṛhā) is the subtle seed from which the entire tree of conditioned existence sprouts, constantly categorizing life into "desirable" and "undesirable." When craving subsides, the mind dissolves into thought-free tranquility (nirvicāra).
विषय और संबंधित श्लोक
- स्पृहा-त्याग
- हेयोपादेयता
- संसार-वृक्ष
- निर्विचार-दशा
- श्लोक 16.6: ग्रहमोक्षविहीनस्तु।
- श्लोक 16.8: प्रवृत्तौ जायते रागः।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सोलहवें प्रकरण का सातवाँ श्लोक।