श्लोक 16.1
आचक्ष्व शृणु वा तात नानाशास्त्राण्यनेकशः । तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणादृते ॥ १ ॥
अनेक शास्त्र पढ़ने या सुनने से शांति नहीं मिलती; समस्त मानसिक प्रपंचों को भुलाकर ही आत्म-स्वास्थ्य संभव है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअध्याय 16 · सोलहवाँ प्रकरण
ग्यारह श्लोकों के इस सोलहवें प्रकरण में गुरु अष्टावक्र कोरे शास्त्र-संग्रह और अभ्यास के हठ की सीमा दिखाते हुए सर्व-विस्मरण और सहज विश्रांति का मार्ग उद्घाटित करते हैं।
पंद्रहवें प्रकरण में सर्वोच्च अद्वैत तत्त्व का उपदेश देने के बाद, सोलहवें प्रकरण में सद्गुरु अष्टावक्र उन गंभीर सूक्ष्म बाधाओं को दूर करते हैं जो साधक को आत्म-साक्षात्कार के बाद भी उलझाए रखती हैं। यह प्रकरण ग्यारह श्लोकों का एक अत्यंत तीखा और क्रांतिकारी उपदेश है।
गुरु अष्टावक्र पहले ही श्लोक (16.1) में कहते हैं कि तुम चाहे हज़ारों शास्त्रों का अध्ययन कर लो या दूसरों से सुनो, जब तक मन में जमा सारा ज्ञान-प्रपंच और स्मृतियाँ विस्मृत (सर्व-विस्मरण) नहीं हो जातीं, तब तक स्वरूप में विश्रांति (स्वास्थ्य) नहीं मिल सकती। दूसरे और तीसरे श्लोक में वे समझाते हैं कि भोग, कर्म या समाधि—कुछ भी करो, जब तक मन आशाओं से खाली नहीं होता, तब तक शांति नहीं मिलती; सारा संसार व्यर्थ के आयास (प्रयत्न) के कारण दुखी है।
चौथे श्लोक में वे 'आलस्य-धुरीण' की रहस्यमयी चर्चा करते हैं—यह वह अवस्था है जहाँ कर्तापन का अहंकार इतना विगलित हो चुका है कि पलक झपकाने का भी बोझ नहीं रहता। पाँचवें से आठवें श्लोक में वे 'यह किया, यह नहीं किया' के द्वंद्व, राग और वैराग्य की ज़िद, और हेय-उपादेय की बुद्धि को मिटाकर बालक की तरह सहज जीवन जीने का उपदेश देते हैं। नवें और दसवें श्लोक में वे स्पष्ट करते हैं कि मोक्ष का घमंड भी एक बंधन है, और सच्चा वीतराग संसार से भागता नहीं बल्कि संसार में रहते हुए भी निर्दुःख रहता है। अंत में (16.11) वे घोषणा करते हैं कि स्वयं शिव, विष्णु या ब्रह्मा भी उपदेश दें, तो भी जब तक तुम सब कुछ भूलकर अपने शुद्ध साक्षी में नहीं टिकते, तब तक मुक्ति संभव नहीं है।
सावधानी: सर्व-विस्मरण और आयास-मुक्ति का अर्थ सांसारिक उत्तरदायित्वों, स्वास्थ्य, नैतिकता या कानूनी ज़िम्मेदारियों की उपेक्षा करना नहीं है; यह मानसिक तनाव और कर्तापन के सूक्ष्म अहंकार को शांत करने की आंतरिक साधना है।
क्या शास्त्रों के ज्ञान का विस्तार करने या समाधि का हठ करने से परम शांति मिल सकती है, या इसके लिए सब कुछ भुलाकर सहज होना होगा?
आत्मज्ञान कोई नई जानकारी जोड़ना नहीं, बल्कि मन पर चढ़ी धारणाओं, वासनाओं और पांडित्य के अहंकार को उतार फेंकना है। जब तक 'सर्व-विस्मरण'—समस्त मानसिक प्रपंचों का शांत होना—नहीं होता, तब तक आत्मा में सच्चा विश्राम नहीं मिलता। सच्चा मुक्त पुरुष बालक की तरह निष्कपट और सहज होकर द्वंद्वों से पार रहता है।
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आचक्ष्व शृणु वा तात नानाशास्त्राण्यनेकशः । तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणादृते ॥ १ ॥
अनेक शास्त्र पढ़ने या सुनने से शांति नहीं मिलती; समस्त मानसिक प्रपंचों को भुलाकर ही आत्म-स्वास्थ्य संभव है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंभोगं कर्म समाधिं वा कुरु विज्ञ तथापि ते । चित्तं निरस्तसर्वाशमत्यर्थं रोचयिष्यति ॥ २ ॥
भोग, कर्म या समाधि—कुछ भी करो; केवल आशाओं से रहित चित्त ही तुम्हें परम संतोष दे सकता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंआयासात्सकलो दुःखी नैनं जानाति कश्चन । अनेनैवोपदेशेन धन्यः प्राप्नोति निर्वृतिम् ॥ ३ ॥
प्रयत्न और तनाव के कारण ही सारा संसार दुखी है; इस रहस्य को जानकर धन्य पुरुष परम विश्रांति पाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंव्यापारे खिद्यते यस्तु निमेषोन्मेषयोरपि । तस्यालस्यधुरीणस्य सुखं नान्यस्य कस्यचित् ॥ ४ ॥
जो पलक झपकाने में भी कर्तापन का श्रम नहीं मानता, उस परम अक्रिय पुरुष को ही सच्चा सुख मिलता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंइदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तं यदा मनः । धर्मार्थकाममोक्षेषु निरपेक्षं तदा भवेत् ॥ ५ ॥
किए और न किए के द्वंद्वों से मुक्त मन धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की चिंता से भी छूट जाता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंविरक्तो विषयद्वेष्टा रागी विषयलोलुपः । ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान् ॥ ६ ॥
विषयों से द्वेष करने वाला विरक्त है और लिप्त होने वाला रागी; जो पकड़ने-छोड़ने से रहित है वही सच्चा ज्ञानी है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंहेयोपादेयता तावत्संसारविटपाङ्कुरः । स्पृहा जीवति यावद्वै निर्विचारदशास्पदम् ॥ ७ ॥
जब तक चाह जीवित है, तब तक पकड़ने-छोड़ने का भेद संसार को बढ़ाता है; चाह मिटने पर ही निर्विचार शांति मिलती है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंप्रवृत्तौ जायते रागो निर्वृत्तौ द्वेष एव हि । निर्द्वन्द्वो बालवद्धीमानेवमेव व्यवस्थितः ॥ ८ ॥
प्रवृत्ति में राग और निवृत्ति में द्वेष होता है; बुद्धिमान पुरुष बालक की तरह निर्द्वन्द्व होकर सहज रहता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंहातुमिच्छति संसारं रागी दुःखजिहासया । वीतरागो हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति ॥ ९ ॥
दुख से घबराकर संसार छोड़ना चाहने वाला रागी है; सच्चा वीतराग संसार में रहकर भी कभी दुखी नहीं होता।
पूरी व्याख्या पढ़ेंयस्याभिमानो मोक्षेऽपि देहेऽपि ममता तथा । न च ज्ञानी न वा योगी केवलं दुःखभागसौ ॥ १० ॥
जिसके मन में मोक्ष का अभिमान और देह में ममता है, वह न ज्ञानी है न योगी; वह केवल दुख का भागीदार है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंहरो यद्युपदेष्टा ते हरिः कमलजोऽपि वा । तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणादृते ॥ ११ ॥
चाहे शिव, विष्णु या ब्रह्मा भी उपदेशक हों; सब कुछ विस्मृत किए बिना आत्म-स्वास्थ्य कभी नहीं मिल सकता।
पूरी व्याख्या पढ़ेंसोलहवें प्रकरण में अष्टावक्र ज्ञान के बोझ से मुक्ति का रहस्य समझाते हैं। वे बताते हैं कि इंसान सिर्फ इसलिए अशांत है क्योंकि वह लगातार कुछ न कुछ पाने की होड़ में लगा है—यहाँ तक कि ज्ञान और मोक्ष को भी उसने एक उपलब्धि बना लिया है। जब तक मन में आशाएं, अपेक्षाएं और 'मैंने यह किया' का घमंड है, तब तक शांति नहीं मिल सकती। सच्चा ज्ञानी वह है जो किसी बात को पकड़कर नहीं बैठता, बालक की तरह सहज रहता है, और अपनी शांत आत्मा में बिना किसी तनाव के विश्राम करता है।
दिन के किसी शांत समय 5 मिनट के लिए अपनी आँखें बंद करें। मन में कहें: 'इस समय मुझे न कुछ जानना है, न कुछ पाना है, न कुछ छोड़ना है।' अपने सारे ज्ञान, योजनाओं और विचारों को धीरे से विदा कर दें। जो मौन और शांति शेष बचे, उसी में विश्राम करें।
'सर्वविस्मरण' का अर्थ पागल होना या दैनिक स्मृति खोना नहीं है। इसका अर्थ है कि ज्ञान, अतीत की स्मृतियों और भविष्य की योजनाओं का जो मानसिक बोझ हमने सिर पर उठा रखा है, उसे शांत कर देना ताकि शुद्ध आत्मा का अनुभव हो सके।
नहीं। शास्त्र मार्गदर्शक का काम करते हैं। किंतु जब कोई शास्त्रों को केवल तर्क-वितर्क और पांडित्य का साधन बना लेता है और स्वयं को जानने का प्रयास नहीं करता, तब अष्टावक्र उस कोरे ज्ञान की सीमा दिखाते हैं।
यह शब्द व्यंग्यात्मक और प्रतीकात्मक है। इसका अर्थ साधारण आलस्य नहीं, बल्कि अहंकार की पूर्ण शांति है। जो व्यक्ति इतना शांत हो गया है कि वह खुद को किसी क्रिया का कर्ता नहीं मानता, उसे परम विश्रांति मिलती है।
रागी व्यक्ति दुखों से घबराकर संसार से भागना चाहता है (क्योंकि वह अभी भी सुख की तलाश में है)। सच्चा वीतराग अपने स्वरूप में इतना तृप्त होता है कि वह संसार में रहकर भी दुखी नहीं होता।
यह स्पष्ट करने के लिए कि मुक्ति का अंतिम कदम साधक को स्वयं उठाना होता है। चाहे साक्षात ईश्वर भी गुरु बनकर आ जाएँ, जब तक आप अपने मन के प्रपंचों को नहीं छोड़ेंगे, तब तक शांति नहीं मिलेगी।