श्लोक 15.1
यथातथोपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान् । आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति ॥ १ ॥
सात्त्विक बुद्धि वाला सहज उपदेश से कृतार्थ हो जाता है, जबकि अशुद्ध मन वाला जीवन भर भ्रमित रहता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअध्याय 15 · पंद्रहवाँ प्रकरण
बीस श्लोकों के इस पंद्रहवें प्रकरण में गुरु अष्टावक्र शिष्य जनक को सर्वोच्च अद्वैत तत्त्वोपदेश देते हुए चिन्मात्र, साक्षी और नित्य-मुक्त आत्मस्वरूप की पहचान कराते हैं।
बारहवें, तेरहवें और चौदहवें प्रकरण में शिष्य राजा जनक द्वारा अपनी आंतरिक अनुभूति और सहज स्थिति का निवेदन सुनने के बाद, पंद्रहवें प्रकरण में सद्गुरु अष्टावक्र पुनः उपदेश का सूत्र संभालते हैं। यह प्रकरण अष्टावक्र गीता के सबसे प्रभावशाली और सारगर्भित अध्यायों में से एक है, जिसमें बीस श्लोकों के माध्यम से अद्वैत वेदांत का निचोड़ प्रस्तुत किया गया है।
गुरु अष्टावक्र पहले ही श्लोक (15.1) में कहते हैं कि शुद्ध बुद्धि वाला सात्त्विक साधक उपदेश मात्र से कृतार्थ हो जाता है, जबकि मंद बुद्धि वाला जीवन भर केवल प्रश्नों में ही उलझा रहता है। दूसरे श्लोक (15.2) में वे मोक्ष की अचूक परिभाषा देते हैं: 'विषयों में रस न रहना ही मोक्ष है, और विषयों में आसक्ति ही बंधन है।' तीसरे से पाँचवें श्लोक में वे समझाते हैं कि यह ज्ञान वाचालता को शांत कर देता है; मनुष्य न शरीर है, न कर्ता, न भोक्ता। राग और द्वेष मन के धर्म हैं, आत्मा तो सदा निर्विकार साक्षी है (15.4-15.5)।
छठे से ग्यारहवें श्लोक में वे विश्व और आत्मा के संबंध को महासागर और लहरों के दृष्टांत से समझाते हैं: जैसे सागर में लहरों के उठने-गिरने से जल की कोई हानि-लाभ नहीं होती, वैसे ही विश्व के आने-जाने से चिन्मात्र आत्मा में कोई विकार नहीं होता। बारहवें से चौदहवें श्लोक में वे सोने और आभूषणों के प्रसिद्ध दृष्टांत द्वारा दिखाते हैं कि दृश्य जगत आत्मा से भिन्न नहीं है। अंत में (15.18-15.20) वे घोषणा करते हैं कि न कोई बंधन था और न मोक्ष; अब ध्यान लगाने का हठ भी छोड़कर अपनी नित्य-मुक्त अवस्था में 'सुखं चर'—आनंदपूर्वक विचरण करो।
सावधानी: 'सुखं चर' और 'यथेच्छसि तथा कुरु' का अर्थ उच्छृंखल या अनैतिक आचरण नहीं है; यह कर्तापन के अहंकार से मुक्त होकर अपने सहज, नैतिक कर्तव्य में जीने का आध्यात्मिक आदेश है।
यदि आत्मा सदा शुद्ध, चैतन्य और नित्य-मुक्त है, तो साधक को अब किस साधना या ध्यान की आवश्यकता शेष है?
गुरु अष्टावक्र स्पष्ट करते हैं कि आत्मा किसी साधना का फल नहीं बल्कि सबका अधिष्ठान है। जैसे सोने के गहने सोने से अलग नहीं हैं और समुद्र की लहरें जल से भिन्न नहीं हैं, वैसे ही संपूर्ण जगत चिदाकाश स्वरूप आत्मा ही है। इसलिए समस्त संशय, राग-द्वेष और ध्यान के हठ को छोड़कर अपनी नित्य-मुक्त स्थिति में 'सुखं चर'—आनंदपूर्वक जियो।
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यथातथोपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान् । आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति ॥ १ ॥
सात्त्विक बुद्धि वाला सहज उपदेश से कृतार्थ हो जाता है, जबकि अशुद्ध मन वाला जीवन भर भ्रमित रहता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंमोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः । एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ २ ॥
विषयों से विरक्ति ही मोक्ष है और विषयों में रस ही बंधन है; यही सारा ज्ञान है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंवाग्मिप्राज्ञामहोद्योगं जनं मूकजडालसम् । करोति तत्त्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षुभिः ॥ ३ ॥
आत्मज्ञान वाचाल और चंचल मनुष्य को भी शांत कर देता है; इसीलिए संसारी भोगी इससे कतराते हैं।
पूरी व्याख्या पढ़ेंन त्वं देहो न ते देहो भोक्ता कर्ता न वा भवान् । चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर ॥ ४ ॥
तुम न शरीर हो, न कर्ता, न भोक्ता; तुम चैतन्य साक्षी और निरपेक्ष हो, सुखपूर्वक विचरण करो।
पूरी व्याख्या पढ़ेंरागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन । निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर ॥ ५ ॥
राग और द्वेष मन के धर्म हैं, तुम्हारा स्वरूप नहीं; तुम निर्विकार ज्ञान-स्वरूप हो, सुखपूर्वक विचरण करो।
पूरी व्याख्या पढ़ेंसर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । विज्ञाय निरहङ्कारो निर्ममस्त्वं सुखी भव ॥ ६ ॥
सब प्राणियों में आत्मा को और आत्मा में सबको जानकर, अहंकार और ममत्व त्यागकर सुखी हो जाओ।
पूरी व्याख्या पढ़ेंविश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे । तत्त्वमेव न सन्देहश्चिन्मूर्ते विज्वरो भव ॥ ७ ॥
जिसमें यह विश्व सागर की तरंगों की तरह स्फुरित होता है, वह तत्त्व तुम ही हो; संताप-मुक्त हो जाओ।
पूरी व्याख्या पढ़ेंश्रद्धस्व तात श्रद्धस्व नात्र मोहं कुरुष्व भोः । ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः ॥ ८ ॥
श्रद्धा करो, तनिक भी संशय मत करो; तुम ज्ञान-स्वरूप, भगवान और प्रकृति से परे आत्मा हो।
पूरी व्याख्या पढ़ेंगुणैः संवेष्टितो देहस्तिष्ठत्यायाति याति च । आत्मा न गन्ता नागन्ता किमेनमनुशोचसि ॥ ९ ॥
गुणों से घिरा शरीर आता और जाता है, आत्मा न आती है न जाती; फिर इसके लिए शोक क्यों?
पूरी व्याख्या पढ़ेंदेहस्तिष्ठतु कल्पान्तं गच्छत्वद्यैव वा पुनः । क्व वृद्धिः क्व च वा हानिस्तव चिन्मात्ररूपिणः ॥ १० ॥
शरीर कल्पान्त तक रहे या आज ही जाए; चिन्मात्र स्वरूप तुम्हारी क्या वृद्धि और क्या हानि?
पूरी व्याख्या पढ़ेंत्वय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्ववीचिः स्वभावतः । उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिर्न वा क्षतिः ॥ ११ ॥
तुम अनंत महासागर में यह विश्व-लहर उठे या अस्त हो; तुम्हारी न कोई वृद्धि है और न कोई हानि।
पूरी व्याख्या पढ़ेंतात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत् । अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना ॥ १२ ॥
तुम चिन्मात्र हो और जगत तुमसे भिन्न नहीं; फिर कहाँ और किसका त्याग या ग्रहण?
पूरी व्याख्या पढ़ेंएकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि । कुतो जन्म कुतो कर्म कुतोऽहङ्कार एव च ॥ १३ ॥
एक, अविनाशी, शांत और निर्मल चिदाकाश तुममें कहाँ जन्म, कहाँ कर्म और कहाँ अहंकार?
पूरी व्याख्या पढ़ेंयत्त्वं पश्यसि तत्रैकस्त्वमेव प्रतिभाससे । किं पृथग्भासते स्वर्णात्कटकाङ्गदनूपुरम् ॥ १४ ॥
तुम जो कुछ देखते हो उसमें तुम ही भासते हो; जैसे सोने से अलग कंगन और नूपुर नहीं होते।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअयं सोऽहमयं नाहं विभागमिति सन्त्यज । सर्वमात्मेति निश्चित्य निःसङ्कल्पः सुखी भव ॥ १५ ॥
‘यह मैं हूँ, यह मैं नहीं’ का भेद छोड़ो; सब कुछ आत्मा जानकर संकल्प-रहित होकर सुखी हो जाओ।
पूरी व्याख्या पढ़ेंतवैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः । त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन ॥ १६ ॥
तुम्हारे अज्ञान से ही विश्व भासता है, परमार्थ में तुम एक हो; तुमसे अलग न कोई संसारी है न असंसारी।
पूरी व्याख्या पढ़ेंभ्रान्तिमात्रमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी । निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति ॥ १७ ॥
विश्व को भ्रांति मात्र जानकर, वासना-रहित और शुद्ध चैतन्य रूप ज्ञानी परम शांति पा लेता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंएक एव भवाम्भोधावासीदस्ति भविष्यति । न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृतकृत्यः सुखं चर ॥ १८ ॥
संसार में केवल एक ही सत्य था, है और रहेगा; तुममें न बंधन है न मोक्ष, कृतार्थ होकर सुखी रहो।
पूरी व्याख्या पढ़ेंमा सङ्कल्पविकल्पाभ्यां चित्तं क्षोभय चिन्मय । उपशाम्य सुखं तिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे ॥ १९ ॥
हे चिन्मय! संकल्प-विकल्पों से चित्त को अशांत मत करो; शांत होकर आनंदमयी आत्मा में सुख से स्थित रहो।
पूरी व्याख्या पढ़ेंत्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किञ्चिद्धृदि धारय । आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि ॥ २० ॥
सब प्रकार के ध्यान का हठ छोड़ो, मन में कुछ मत धरो; तुम नित्य-मुक्त आत्मा हो, विचार करके क्या करोगे?
पूरी व्याख्या पढ़ेंपंद्रहवाँ प्रकरण गुरु अष्टावक्र का अत्यंत तेजस्वी तत्त्वोपदेश है जहाँ वे अधिकारी-भेद से आरंभ कर आत्मा के चिन्मात्र, साक्षी और सर्वव्यापी स्वरूप का साक्षात कराते हैं। समुद्र में उठती लहरों और सोने से बने आभूषणों के दृष्टांतों से वे सिद्ध करते हैं कि जगत आत्मा से भिन्न नहीं है। न कोई बंधन है, न मोक्ष; राग-द्वेष मन के धर्म हैं। इसलिए वे जनक को ध्यान का हठ भी छोड़कर अपनी नित्य-मुक्त, आनंदमयी सत्ता में सहज सुखपूर्वक जीने का निर्देश देते हैं।
पाँच मिनट शांत बैठें। शरीर को स्थिर करें। मन में उठने वाले विचारों को समुद्र की लहरों की तरह केवल आते-जाते देखें। याद रखें: 'मैं लहर नहीं, अगाध महासागर हूँ; मैं साक्षी हूँ।' बिना किसी संकल्प के सहज शांति में विश्राम करें। यदि कोई असुविधा हो तो सामान्य स्थिति में आ जाएँ।
पंद्रहवें प्रकरण में गुरु अष्टावक्र शिष्य जनक को सर्वोच्च अद्वैत तत्त्वोपदेश देते हुए चिन्मात्र, साक्षी और नित्य-मुक्त आत्मा का साक्षात कराते हैं।
श्लोक 15.2 के अनुसार, सांसारिक विषयों से विरक्ति (विषय-वैरस्य) ही मोक्ष है और विषयों में रस लेना (आसक्ति) ही बंधन है।
जैसे कंगन और कुंडल सोने से अलग नहीं हैं, वैसे ही संपूर्ण दृश्य जगत चैतन्य आत्मा से भिन्न नहीं है; सब कुछ एक ही चेतना का विस्तार है।