दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
अध्याय 15 · मुक्त पुरुष की अवस्था
अष्टावक्र गीता, श्लोक 15.17
सत्यापित
मूल संस्कृत
भ्रान्तिमात्रमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी । निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति ॥ १७ ॥
IAST लिप्यंतरण
bhrāntimātram idaṃ viśvaṃ na kiñcid iti niścayī |\nnirvāsanaḥ sphūrtimātro na kiñcid iva śāmyati || 17 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
भ्रान्ति-मात्रम्, इदम्, विश्वम्, न, किञ्चित्, इति, निश्चयी, निर्वासनः, स्फूर्ति-मात्रः, न, किञ्चित्, इव, शाम्यति
- इदम् विश्वम् भ्रान्ति-मात्रम्
- यह दृश्य जगत केवल एक भ्रम (भ्रांति) मात्र है
- न किञ्चित् इति निश्चयी
- वास्तव में इसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है—ऐसा दृढ़ निश्चय रखने वाला
- निर्वासनः
- समस्त वासनाओं और कामनाओं से रहित होकर
- स्फूर्ति-मात्रः
- केवल शुद्ध चेतना के स्फुरण (प्रकाश) रूप में स्थित होकर
- न किञ्चित् इव शाम्यति
- परम मौन और शांति में विलीन हो जाता है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
यह विश्व केवल भ्रांति मात्र है और कुछ भी नहीं—ऐसा दृढ़ निश्चयी पुरुष वासना-रहित और शुद्ध स्फुरण-मात्र होकर शांत हो जाता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: जब साधक यह भली-भाँति जान लेता है कि संसार में सत्य जैसी कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं है, यह केवल मृगतृष्णा के जल की तरह प्रतीति मात्र है, तो उसकी सारी वासनाएं स्वतः सूख जाती हैं। जब चाह ही नहीं बची, तो मन का सारा शोर थम जाता है। वह केवल शुद्ध चेतना का प्रकाश (स्फूर्तिमात्र) बनकर परम शांति में टिक जाता है जहाँ कुछ भी हलचल शेष नहीं रहती।
सरल हिन्दी में समझें
इस श्लोक में मन की शांति का सबसे सीधा सूत्र दिया गया है।
जब तक हम यह मानते हैं कि रेगिस्तान में दिख रही चमक सचमुच पानी है, तब तक हम प्यास बुझाने के लिए दौड़ते रहते हैं और थक जाते हैं। जिस पल पता चलता है कि वह केवल मृगतृष्णा (धूप की चमक) है, उसी पल दौड़ अपने आप रुक जाती है।
वैसे ही जब समझ आता है कि संसार के सुख केवल एक भ्रम हैं, तो मन की सारी इच्छाएं शांत हो जाती हैं। व्यक्ति अंदर से हल्का और पूरी तरह शांत हो जाता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. मृगतृष्णा और रज्जु-सर्प के अद्वैत दृष्टांत का दार्शनिक निष्कर्ष। 2. निश्चयी शब्द दिखाता है कि ज्ञान केवल अनुमान नहीं, दृढ़ निश्चय होना चाहिए। 3. निर्वासनः का अर्थ है चित्त से समस्त सूक्ष्म संस्कारों और तृष्णाओं का विलीन हो जाना। 4. स्फूर्तिमात्रः आत्मा के स्वयं-प्रकाश स्वरूप को इंगित करता है। 5. न किञ्चिदिव शाम्यति परम मौन और निर्वाण की अनिर्वचनीय शांति का वर्णन है। 6. यह मानसिक शांति का कोई अभ्यास नहीं, सत्य के दर्शन का स्वाभाविक फल है।
उदाहरण से समझें: जैसे सिनेमा समाप्त होने पर प्रोजेक्टर बंद होते ही पर्दा खाली और शांत हो जाता है, वैसे ही भ्रांति मिटने पर चित्त परम शांति में स्थित हो जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप किसी डरावने सपने में शेर से डरकर भाग रहे होते हैं और अचानक नींद खुल जाती है, तो भागने की सारी थकान और डर एक सेकंड में गायब हो जाता है; यही भ्रांति मिटने की शांति है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: संसार के भ्रम के पीछे भागना बंद कीजिए; सत्य को पहचानकर अपनी स्वाभाविक, शांत चेतना में विश्राम पाइए।
सामान्य गलतफहमी
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ‘न किञ्चिदिति’ का अर्थ संसार की व्यावहारिक व्यवस्था को नष्ट करना नहीं है, बल्कि उसके प्रति मानसिक आसक्ति को समाप्त करना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब भी किसी सांसारिक असफलता या चिंता से मन दुखी हो, तो कहें: "यह केवल एक दृश्य है जो बीत जाएगा, मैं अचल सत्य हूँ।" (लगभग 2 मिनट)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अभी भी किसी ऐसी सांसारिक मृगतृष्णा के पीछे दौड़ रहा हूँ जिसके सच न होने का मुझे पहले से पता है?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट अपनी आँखें बंद करके मन के समस्त विचारों को शांत होने दें और अनुभव करें कि आप केवल एक शुद्ध, अचल प्रकाश हैं।
एक पंक्ति में सार: विश्व को भ्रांति मात्र जानकर, वासना-रहित और शुद्ध चैतन्य रूप ज्ञानी परम शांति पा लेता है।
English
Translation: Ascertaining that this universe is mere illusion and nothing in reality, free from latent desires and existing as pure radiance, one dissolves into stillness.
Simple explanation: Seeing through the mirage of the phenomenal world, all subconscious cravings naturally wither away. Established as self-effulgent awareness, the sage merges effortlessly into profound peace.
विषय और संबंधित श्लोक
- भ्रांति-मुक्ति
- निर्वासन
- स्फूर्तिमात्र
- परम शांति
- श्लोक 15.16: त्वमेकः परमार्थतः।
- श्लोक 15.18: एक एव भवाम्भोधावा।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। भ्रांति-मुक्ति और शांति।