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प्रकरण 15: पंद्रहवाँ प्रकरणश्लोक १८/२०90%

अध्याय 15 · मुक्त पुरुष की अवस्था

अष्टावक्र गीता, श्लोक 15.18

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

एक एव भवाम्भोधावासीदस्ति भविष्यति । न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृतकृत्यः सुखं चर ॥ १८ ॥

IAST लिप्यंतरण

eka eva bhavāmbhodhāv āsīd asti bhaviṣyati |\nna te bandho'sti mokṣo vā kṛtakṛtyaḥ sukhaṃ cara || 18 ||

सरल उच्चारण: eka eva bhavaambhodhaav aaseed asti bhavishyati \nna te bandhosti moksho vaa kritakrityah sukham chara (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

एकः, एव, भव-अम्भोधौ, आसीत्, अस्ति, भविष्यति, न, ते, बन्धः, अस्ति, मोक्षः, वा, कृतकृत्यः, सुखम्, चर

भव-अम्भोधौ
इस संसार रूपी सागर में
एकः एव आसीत् अस्ति भविष्यति
केवल एक परमात्मा ही भूत, वर्तमान और भविष्य में था, है और रहेगा
ते बन्धः न अस्ति
तुममें न कोई बंधन कभी था
मोक्षः वा न
और न कोई मोक्ष की आवश्यकता है
कृतकृत्यः
कृतार्थ और परिपूर्ण होकर
सुखम् चर
आनंदपूर्वक विचरण करो

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

इस संसार-सागर में केवल एक ही (आत्मा) था, है और रहेगा; तुममें न बंधन है और न मोक्ष, कृतार्थ होकर सुखपूर्वक विचरण करो।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: काल के तीनों खंडों—भूत, वर्तमान और भविष्य—में केवल एक ही अखंड आत्मतत्त्व सत्य है। जब आत्मा के अतिरिक्त दूसरा कुछ है ही नहीं, तो तुम्हें किसने बांधा और कौन छुड़ाएगा? बंधन भी अज्ञान की कल्पना थी और मोक्ष भी उसी की निवृत्ति का नाम था। तुम सदा से ही सिद्ध, पूर्ण और मुक्त हो। इसलिए अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त मानकर (कृतकृत्य होकर) आनंदपूर्वक विचरण करो।

सरल हिन्दी में समझें

यह श्लोक अष्टावक्र गीता के सबसे सुंदर और राहत देने वाले श्लोकों में से एक है।

हम जन्मों-जन्मों के पाप, कर्म और बंधनों की कहानियों से इतने डरे रहते हैं कि हमें लगता है हम कभी मुक्त नहीं हो पाएंगे।

अष्टावक्र कहते हैं कि पूरे अस्तित्व में हमेशा से केवल एक ही सत्य रहा है, और वह आप हैं। आपको कभी किसी ने नहीं बांधा; बंधन केवल एक बुरा सपना था। जब बंधन ही नहीं था, तो मोक्ष की भी कोई फिक्र मत करो। आप पहले से ही पूरे हैं। अब बिना किसी बोझ के मुस्कुराते हुए जीवन जिएँ।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. त्रैकालिक सत्यता: आत्मा काल के तीनों आयामों में नित्य और एकरस है। 2. न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा अद्वैत का सर्वोच्च घोषणा-पत्र है। 3. कृतकृत्यः पद दिखाता है कि आत्मज्ञान के बाद कोई कर्तव्य या अपूर्णता शेष नहीं रहती। 4. सुखं चर का पुनः उद्घोष जीवनमुक्ति के स्वाभाविक आनंद को दर्शाता है। 5. यह धार्मिक भय, पाप-पुण्य की चिंता और मोक्ष की व्याकुलता को समाप्त करता है। 6. साधक को वर्तमान क्षण की पूर्णता में प्रतिष्ठित करने वाला अंतिम सत्य।

उदाहरण से समझें: जैसे रस्सी में दिखे सांप से डरने वाले व्यक्ति को जब रोशनी में पता चलता है कि केवल रस्सी है, तो उसे सांप को मारने या उससे भागने की जरूरत नहीं होती, वैसे ही बंधन और मोक्ष दोनों शांत हो जाते हैं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी वर्चुअल रियलिटी गेम का चश्मा उतार देते हैं, तो खेल के अंदर के सारे खतरे और जीत-हार एक पल में निरर्थक हो जाते हैं; यही बोध नित्य-मुक्ति का है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: आप कभी बँधे ही नहीं थे; बंधन और मोक्ष की सारी चिंताएं छोड़कर कृतार्थ भाव से आनंदपूर्वक जिएँ।

सामान्य गलतफहमी

सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘न ते बन्धोऽस्ति’ का अर्थ जिम्मेदारियों से भागना या मनमाना अनुचित आचरण करना नहीं है, बल्कि अपने अमर, मुक्त स्वरूप को पहचानना है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी मन में यह विचार आए कि "मैं अभी अधूरा हूँ, मुझे बहुत कुछ पाना है", तो कहें: "मैं कृतकृत्य हूँ, मेरी आत्मा सदा पूर्ण है।" (लगभग 2 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अभी भी किसी काल्पनिक बंधन से छूटने के लिए खुद पर तनाव और दबाव बना रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: दो मिनट शांत बैठकर मुस्कुराएं और अनुभव करें कि जीवन का अंतिम लक्ष्य पहले से ही प्राप्त है।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: संसार में केवल एक ही सत्य था, है और रहेगा; तुममें न बंधन है न मोक्ष, कृतार्थ होकर सुखी रहो।

English

Translation: In this ocean of existence, the One alone was, is, and will ever be. You have neither bondage nor liberation; fulfilled, move happily.

Simple explanation: Throughout past, present, and future, the indivisible reality alone endures. Because you were never truly bound, even liberation is an unnecessary concept. Fulfilled and sovereign, live in joy.

विषय और संबंधित श्लोक

  • त्रैकालिक सत्य
  • कृतकृत्य
  • बंधन-मोक्ष-मुक्ति
  • सुखं चर
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 15.17: निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो।
  • श्लोक 15.19: मा सङ्कल्पविकल्पाभ्यां।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 223–224 (PDF पृ. 230–231)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। कृतकृत्यता का उद्घोष।