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प्रकरण 15: पंद्रहवाँ प्रकरणश्लोक १९/२०95%

अध्याय 15 · मुक्त पुरुष की अवस्था

अष्टावक्र गीता, श्लोक 15.19

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

मा सङ्कल्पविकल्पाभ्यां चित्तं क्षोभय चिन्मय । उपशाम्य सुखं तिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे ॥ १९ ॥

IAST लिप्यंतरण

mā saṅkalpavikalpābhyāṃ cittaṃ kṣobhaya cinmaya |\nupaśāmya sukhaṃ tiṣṭha svātmany ānandavigrahe || 19 ||

सरल उच्चारण: maa sangkalpavikalpaabhyaam chittam kshobhaya chinmaya \nupashaamya sukham tishtha svaatmany aanandavigrahe (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

मा, सङ्कल्प-विकल्पाभ्याम्, चित्तम्, क्षोभय, चिन्मय, उपशाम्य, सुखम्, तिष्ठ, स्वात्मनि, आनन्द-विग्रहे

चिन्मय
हे ज्ञानस्वरूप चेतन आत्मन्!
सङ्कल्प-विकल्पाभ्याम्
‘यह करूँ, वह सोचूँ’ के संकल्पों और विकल्पों से
चित्तम् मा क्षोभय
अपने चित्त को विचलित या अशांत मत करो
उपशाम्य
पूरी तरह शांत होकर
आनन्द-विग्रहे स्वात्मनि
आनंदस्वरूप अपनी ही आत्मा में
सुखम् तिष्ठ
सुखपूर्वक स्थित रहो

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

हे चिन्मय! संकल्प और विकल्पों से चित्त को विचलित मत करो; शांत होकर आनंद-स्वरूप अपनी ही आत्मा में सुखपूर्वक स्थित रहो।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: गुरु अष्टावक्र अत्यंत सरल और व्यावहारिक साधना बताते हैं। मनुष्य की सारी अशांति का कारण उसका अपना संकल्प-विकल्प है—"ऐसा होना चाहिए, वैसा नहीं होना चाहिए।" अष्टावक्र कहते हैं: हे चिन्मय! अपने मन को इन व्यर्थ विचारों से मथना बंद करो। चित्त की इस तरंग को शांत होने दो। तुम्हारा अपना स्वरूप ही परम आनंद का विग्रह (मूर्ति) है; अपने उस आनंद में चुपचाप टिक जाओ।

सरल हिन्दी में समझें

यह श्लोक मन को शांत करने की सबसे कोमल और प्यारी सलाह है।

हमारा दिमाग दिन-रात भविष्य की योजनाएं बनाने और पुरानी बातों को सुलझाने में लगा रहता है। हम खुद ही अपने मन में तूफान खड़ा करते हैं और फिर कहते हैं कि हम परेशान हैं।

अष्टावक्र कहते हैं कि हे प्यारे, सोचना बंद करो। अपने दिमाग को इन ख्यालों से परेशान मत करो। थोड़ा शांत हो जाओ। तुम्हारा अपना असली स्वरूप ही खुशी और शांति का खजाना है; बस चुपचाप अपने भीतर बैठ जाओ और आराम करो।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. संकल्प-विकल्प ही चित्त के क्षोभ (mental agitation) का एकमात्र कारण हैं। 2. चिन्मय संबोधन याद दिलाता है कि तुम ज्ञान हो, विचारों के गुलाम नहीं। 3. आनन्दविग्रहे स्वात्मनि: आनंद बाहर से मिलने वाली वस्तु नहीं, आत्मा का अपना स्वभाव है। 4. उपशाम्य सुखं तिष्ठ: समस्त प्रयत्नों के शांत होने पर सहज स्थिति का उद्घाटन। 5. यह मानसिक विश्रांति की सबसे सहज और व्यावहारिक पद्धति है। 6. विचारों से लड़ने के बजाय उन्हें केवल शांत होने देने की प्रेरणा देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे गंदले पानी को हिलाने से वह और गंदा होता है और उसे बिना छुए छोड़ देने पर मिट्टी नीचे बैठ जाती है और पानी निर्मल हो जाता है, वैसे ही संकल्प छोड़ते ही चित्त शांत हो जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप अपने कंप्यूटर के सारे भारी ब्राउज़र टैब और बैकग्राउंड ऐप्स बंद कर देते हैं, तो कंप्यूटर का पंखा शांत हो जाता है और वह सुचारू रूप से चलने लगता है; वैसे ही मन के फालतू विचार बंद करते ही गहरी शांति मिलती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपने मन को व्यर्थ के संकल्पों से परेशान मत कीजिए; शांत होकर अपने भीतर के सहज आनंद में टिक जाइए।

सामान्य गलतफहमी

यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। ‘मा सङ्कल्पविकल्पाभ्यां’ का अर्थ सोचना-समझना बिल्कुल बंद करके मूर्ख बन जाना नहीं है, बल्कि व्यर्थ की मानसिक उधेड़बुन से मुक्त होना है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी दिमाग में विचारों की भीड़ और बेचैनी बढ़े, तो रुककर कहें: "हे चिन्मय! ठहर जाओ।" और तीन गहरी सांसें लेकर मौन हो जाएँ। (लगभग 2 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं खुद ही अपने मन में व्यर्थ के ‘अगर-मगर’ के विचार पैदा करके अपनी शांति को भंग कर रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट रीढ़ सीधी करके बैठें, किसी भी विचार को आगे न बढ़ाएं और अनुभव करें कि आप आनंद के सागर में विश्राम कर रहे हैं।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: हे चिन्मय! संकल्प-विकल्पों से चित्त को अशांत मत करो; शांत होकर आनंदमयी आत्मा में सुख से स्थित रहो।

English

Translation: Do not agitate the mind with intentions and doubts, O conscious one! Stilling yourself, abide happily in your own Self, the very embodiment of bliss.

Simple explanation: A profoundly gentle counsel: cease whipping the mind into a frenzy with ceaseless conceptualizing. Relaxing all mental agitation, settle into the quiet, uncaused bliss of your own nature.

विषय और संबंधित श्लोक

  • चित्त-प्रसाद
  • चिन्मय
  • आनंदविग्रह
  • उपशम
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 15.18: कृतकृत्यः सुखं चर।
  • श्लोक 15.20: त्यजैव ध्यानं सर्वत्र।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 224–225 (PDF पृ. 231–232)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। मानसिक शांति का सरल सूत्र।