दृश्य, गति और थीम की सेटिंग(इस डिवाइस पर सहेजी जाती हैं)
दृश्य मोड
गति
थीम

आपके डिवाइस की “कम गति” सेटिंग हमेशा मानी जाती है। “केवल पाठ” मोड में कोई सजावटी चित्र या गति नहीं रहती।

प्रकरण 15: पंद्रहवाँ प्रकरणश्लोक ५/२०25%

अध्याय 15 · मुक्त पुरुष की अवस्था

अष्टावक्र गीता, श्लोक 15.5

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन । निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर ॥ ५ ॥

IAST लिप्यंतरण

rāgadveṣau manodharmau na manas te kadācana |\nnirvikalpo'si bodhātmā nirvikāraḥ sukhaṃ cara || 5 ||

सरल उच्चारण: raagadveshau manodharmau na manas te kadaachana \nnirvikalposi bodhaatmaa nirvikaarah sukham chara (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

राग-द्वेषौ, मनोधर्मौ, न, मनः, ते, कदाचन, निर्विकल्पः, असि, बोधात्मा, निर्विकारः, सुखम्, चर

राग-द्वेषौ
पसंद और नापसंद (आसक्ति और घृणा)
मनोधर्मौ
मन के धर्म और वृत्तियाँ हैं
मनः ते कदाचन न
और मन कभी भी तुम्हारा स्वरूप नहीं है
त्वम् निर्विकल्पः
तुम संकल्प-विकल्पों से रहित
बोधात्मा निर्विकारः असि
ज्ञानस्वरूप और विकार-रहित आत्मा हो
सुखम् चर
अतः सुखपूर्वक विचरण करो

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

राग और द्वेष मन के धर्म हैं, और मन कभी तुम्हारा स्वरूप नहीं है; तुम विकल्प-रहित, ज्ञान-स्वरूप और निर्विकार हो, अतः सुखपूर्वक विचरण करो।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: साधक अक्सर मन में उठने वाले काम, क्रोध, लोभ या राग-द्वेष को देखकर उदास हो जाता है कि "मेरा मन कितना बुरा है।" अष्टावक्र मुनि स्पष्ट करते हैं कि राग और द्वेष मन की लहरें हैं, आत्मा की नहीं। जैसे आकाश में धुंआ या बादल उठने से आकाश मैला नहीं होता, वैसे ही मन के विकारों से साक्षी आत्मा कभी दूषित नहीं होती। तुम निर्विकार ज्ञान हो, इसलिए मन के द्वंद्वों से अप्रभावित रहकर सुखी रहो।

सरल हिन्दी में समझें

इस श्लोक में मन की उलझनों से बचने का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक रहस्य बताया गया है।

जब भी हमारे मन में गुस्सा, ईर्ष्या या किसी चीज़ के प्रति आसक्ति उठती है, तो हम सोचते हैं कि "मैं बहुत बुरा इंसान हूँ।" हम मन के विकारों को अपनी पहचान बना लेते हैं।

अष्टावक्र कहते हैं कि राग और द्वेष मन के स्वभाव हैं, आपके नहीं। और आप मन भी नहीं हैं; आप उस मन को देखने वाले शुद्ध प्रकाश हैं। जैसे टीवी पर आग लगने से स्क्रीन नहीं जलती, वैसे ही मन की भावनाओं से आप अछूते हैं। इसलिए शांत होकर जिएँ।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. मन और आत्मा के तादात्म्य का निर्णायक विच्छेद। 2. राग और द्वेष को मनोधर्म बताकर साधक को अपराध-बोध से मुक्त करना। 3. बोधात्मा का अर्थ है कि आत्मा केवल शुद्ध ज्ञान है, कोई विचार या भावना नहीं। 4. निर्विकल्प और निर्विकार स्वरूप कभी किसी मानसिक उतार-चढ़ाव से नहीं बदलता। 5. यह आंतरिक तटस्थता और समता का व्यावहारिक आधार प्रस्तुत करता है। 6. सुखं चर का पुनः निर्देश दिखाता है कि ज्ञान कोई बोझ नहीं, परम आनंदमय जीवन है।

उदाहरण से समझें: जैसे शीशे के सामने लाल या काला कपड़ा रखने से शीशा रंगीन दिखाई देता है किंतु कपड़ा हटाते ही वह ज्यों का त्यों स्वच्छ रहता है, वैसे ही आत्मा मनोधर्मों से निर्लेप है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आपके स्मार्टफोन पर कोई नकारात्मक नोटिफिकेशन या विज्ञापन आता है, तो वह फोन का हार्डवेयर नहीं बनता; वैसे ही मन के विचारों को आते-जाते नोटिफिकेशन की तरह देखें और खुद को स्थिर रखें। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मन के राग-द्वेष को अपनी पहचान मत बनाइए; आप निर्विकार ज्ञान-स्वरूप हैं, साक्षी बनकर शांत रहिए।

सामान्य गलतफहमी

वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ‘न मनस्ते कदाचन’ का अर्थ मन की अनियंत्रित बुराइयों को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि साक्षी बनकर मानसिक वृत्तियों को शांत होने देना है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी किसी पर क्रोध या किसी चीज़ के प्रति तीव्र लालच जागे, तो तुरंत कहें: "यह मन की लहर है, मैं इसका साक्षी हूँ।" (लगभग 2 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने मन की नकारात्मक भावनाओं से खुद को एक मानकर आत्मग्लानि में घुट रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर मन के विचारों को बिना लड़े केवल बहती हुई नदी की तरह देखें और अनुभव करें कि आप किनारे पर बैठे साक्षी हैं।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: राग और द्वेष मन के धर्म हैं, तुम्हारा स्वरूप नहीं; तुम निर्विकार ज्ञान-स्वरूप हो, सुखपूर्वक विचरण करो।

English

Translation: Attachment and aversion are attributes of the mind; the mind is never yours. You are free from constructs, pure awareness, changeless—move happily.

Simple explanation: Sage Ashtavakra dissolves moral anguish: cravings and resentments belong to the mental instrument, not the witnessing consciousness. You remain the spotless, unchanging awareness—live with freedom.

विषय और संबंधित श्लोक

  • मनोधर्म
  • निर्विकार
  • बोधात्मा
  • साक्षी-भाव
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 15.4: चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी।
  • श्लोक 15.6: सर्वभूतेषु चात्मानं।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 210–211 (PDF पृ. 217–218)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। मन और आत्मा का पृथक्करण।