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अध्याय 15 · मुक्त पुरुष की अवस्था
अष्टावक्र गीता, श्लोक 15.11
सत्यापित
मूल संस्कृत
त्वय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्ववीचिः स्वभावतः । उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिर्न वा क्षतिः ॥ ११ ॥
IAST लिप्यंतरण
tvayy anantamahāmbhodhau viśvavīciḥ svabhāvataḥ |\nudetu vāstam āyātu na te vṛddhir na vā kṣatiḥ || 11 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
त्वयि, अनन्त-महाम्भोधौ, विश्व-वीचिः, स्वभावतः, उदेतु, वा, अस्तम्, आयातु, न, ते, वृद्धिः, न, वा, क्षतिः
- त्वयि अनन्त-महाम्भोधौ
- तुम अनंत चेतना रूपी महासागर में
- विश्व-वीचिः
- यह संपूर्ण विश्व रूपी लहर
- स्वभावतः
- प्रकृति के अपने स्वभाव से
- उदेतु वा अस्तम् आयातु
- चाहे उत्पन्न हो अथवा विलीन हो जाए
- ते वृद्धिः न
- न तुम्हारी कोई वृद्धि होती है
- न वा क्षतिः
- और न कोई हानि ही होती है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
तुम अनंत महासागर में यह विश्व रूपी लहर स्वभाव से ही उठे या अस्त हो जाए; न तुम्हारी कोई वृद्धि होती है और न कोई हानि।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: गुरु अष्टावक्र शिष्य को स्मरण कराते हैं कि तुम कोई सीमित व्यक्ति नहीं, बल्कि चेतना के अनंत महासागर हो। यह सृष्टि, उसके अरबों तारे, ग्रह और जीव केवल एक लहर की तरह तुम्हारे भीतर उठते हैं और स्वभाववश शांत हो जाते हैं। जब सृष्टि बनती है तो तुममें कुछ नया नहीं बढ़ता, और जब प्रलय होती है तो तुम्हारा कुछ नहीं घटता। तुम सदा अखंड और परिपूर्ण हो।
सरल हिन्दी में समझें
यह श्लोक सृष्टि और प्रलय का सबसे सरल और भव्य रहस्य बताता है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि ब्रह्मांड फैलता है और सिकुड़ता है। हम सोचते हैं कि अगर दुनिया नष्ट हो गई तो हमारा क्या होगा?
अष्टावक्र कहते हैं कि आप वह अनंत चेतना हैं जिसके अंदर यह पूरा ब्रह्मांड एक छोटी-सी लहर की तरह आता है और चला जाता है। समुद्र में लहर उठे तो समुद्र बड़ा नहीं हो जाता, और लहर बैठ जाए तो समुद्र खाली नहीं होता। आप वही अनंत समुद्र हैं; इसलिए दुनिया के बनने या बिगड़ने से अप्रभावित रहिए।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. विश्ववीचिः पद जगत को चेतना की क्षणिक और स्वाभाविक तरंग सिद्ध करता है। 2. स्वभावतः शब्द स्पष्ट करता है कि सृष्टि का होना और मिटना प्रकृति का सहज नियम है। 3. अनंत-महाम्भोधि आत्मा की असीम, अखण्ड और सर्वग्रासी सत्ता का प्रतीक है। 4. सृष्टि-स्थिति-प्रलय से आत्मा की निर्लेपता का तार्किक निरूपण। 5. यह साधक को विश्व-चिंताओं से ऊपर उठाकर विराट आत्म-विश्रांति में स्थापित करता है। 6. अष्टावक्र के दर्शन का यह सबसे भव्य और काव्यात्मक शिखर है।
उदाहरण से समझें: जैसे समुद्र में उठने वाली लाखों लहरों को देखकर भी बुद्धिमान व्यक्ति जानता है कि सब केवल जल ही है, वैसे ही ज्ञानी जगत को चेतना का विस्तार जानता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जैसे आपके कंप्यूटर की स्क्रीन पर सैकड़ों खिड़कियां खुलें और बंद हों पर स्क्रीन का शीशा न बढ़ता है न घटता है, वैसे ही विश्व के आने-जाने से आपकी आत्मा सदा एकरस रहती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: आप सीमित शरीर नहीं, अनंत चेतना के महासागर हैं; इस दुनिया के उतार-चढ़ाव को अपनी ही लहरों की तरह देखिए।
सामान्य गलतफहमी
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। ‘न ते वृद्धिर्न वा क्षतिः’ का अर्थ पर्यावरण या संसार के प्रति लापरवाह होना नहीं है, बल्कि आंतरिक रूप से भयमुक्त होना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब भी दुनिया की किसी बड़ी खबर या घटना से बेचैनी हो, तो कहें: "यह चेतना के सागर में उठती एक लहर है, मूल सत्य शांत है।" (लगभग 2 मिनट)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं विश्व की घटनाओं में इतना खो गया हूँ कि अपनी अनंत महासागर रूपी आत्मा को भूल चुका हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर स्वयं को एक अनंत महासागर के रूप में अनुभव करें और सांसों के आने-जाने को लहरों की तरह महसूस करें।
एक पंक्ति में सार: तुम अनंत महासागर में यह विश्व-लहर उठे या अस्त हो; तुम्हारी न कोई वृद्धि है और न कोई हानि।
English
Translation: In you, the infinite ocean, let the wave of the universe arise or set according to its nature; there is neither increase nor decrease for you.
Simple explanation: In the shoreless ocean of your true being, cosmic cycles of creation and dissolution are merely spontaneous ripples. The ocean remains untouched—neither swollen by rising waves nor depleted by their subsidence.
विषय और संबंधित श्लोक
- विश्ववीचि
- अनंत-महाम्भोधि
- अविकारी
- विराट-चेतना
- श्लोक 7.1: मय्यनन्तमहाम्भोधौ।
- श्लोक 15.12: तात चिन्मात्ररूपोऽसि।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। विश्ववीचि दृष्टांत।