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प्रकरण 15: पंद्रहवाँ प्रकरणश्लोक १४/२०70%

अध्याय 15 · मुक्त पुरुष की अवस्था

अष्टावक्र गीता, श्लोक 15.14

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

यत्त्वं पश्यसि तत्रैकस्त्वमेव प्रतिभाससे । किं पृथग्भासते स्वर्णात्कटकाङ्गदनूपुरम् ॥ १४ ॥

IAST लिप्यंतरण

yat tvaṃ paśyasi tatraikas tvam eva pratibhāsase |\nkiṃ pṛthag bhāsate svarṇāt kaṭakāṅgadanūpuram || 14 ||

सरल उच्चारण: yat tvam pashyasi tatraikas tvam eva pratibhaasase \nkim prithag bhaasate svarnaat katakaanggadanoopuram (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

यत्, त्वम्, पश्यसि, तत्र, एकः, त्वम्, एव, प्रतिभाससे, किम्, पृथक्, भासते, स्वर्णात्, कटक-अङ्गद-नूपुरम्

यत् त्वम् पश्यसि
तुम जो कुछ भी संसार में देखते हो
तत्र एकः त्वम् एव प्रतिभाससे
उसमें केवल एक तुम ही भिन्न-भिन्न रूपों में भास रहे हो
किम् स्वर्णात् पृथक्
क्या सोने से अलग होकर
कटक-अङ्गद-नूपुरम् भासते
कंगन, बाजूबंद और नूपुर (पायल) का कोई स्वतंत्र अस्तित्व भासता है?

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

तुम जो कुछ भी देखते हो, उसमें केवल एक तुम ही भास रहे हो; क्या सोने से अलग कंगन, बाजूबंद या नूपुर कभी दिखाई देते हैं?

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह छांदोग्योपनिषद् का अत्यंत प्रसिद्ध स्वर्ण-कटक दृष्टांत है। सुनार सोने से कंगन, कुंडल, हार आदि बनाता है। नाम और रूप अलग-अलग होते हैं, किंतु धातु केवल सोना ही होती है। कंगन को पिघलाओ तो भी सोना, पहनो तो भी सोना। ठीक इसी तरह यह संपूर्ण दृश्य जगत नाम और रूप का खेल है; इसका मूल तत्त्व केवल तुम्हारी अपनी ही चैतन्य आत्मा है। तुम ही सब रूपों में प्रकट हो रहे हो।

सरल हिन्दी में समझें

यह श्लोक अद्वैत दर्शन को सबसे आसान उदाहरण से समझाता है।

सुनार की दुकान पर कंगन, अंगूठी और पायल रखी होती है। कोई कहता है "यह कंगन है", कोई कहता है "यह पायल है।" लेकिन अगर आप वैज्ञानिक या सुनार की नज़र से देखें, तो वहाँ केवल सोना है; कंगन और पायल तो केवल नाम हैं।

वैसे ही इस दुनिया में पहाड़, नदियाँ, पेड़ और लोग अलग-अलग नामों से पुकारे जाते हैं, लेकिन उन सबमें जो एक मूल तत्त्व चमक रहा है, वह वही चेतना है जो आपके भीतर है। सब रूपों में केवल आप ही हैं।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. छांदोग्योपनिषद् (वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्) के दृष्टांत की पुष्टि। 2. नाम और रूप (name and form) केवल व्यावहारिक सत्य हैं; पारमार्थिक सत्य केवल आत्मा है। 3. जगत का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, वह केवल चेतना का आभूषण है। 4. यह दृष्टांत साधक को बाह्य भेदों से हटाकर मूल तत्त्व पर दृष्टि टिकाना सिखाता है। 5. जब सब रूपों में आत्मा ही है, तो भय, ईर्ष्या और परायापन स्वतः समाप्त हो जाते हैं। 6. अनेकता में एकता का यह सबसे सुगम और प्रत्यक्ष दार्शनिक प्रमाण है।

उदाहरण से समझें: जैसे सोने के कंगन और हार केवल नाम का भेद हैं और दोनों में सोना ही एकमात्र सत्य है, वैसे ही विश्व के सभी रूप केवल चेतना के आभूषण हैं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या

संपादकीय सहायक चित्र; यह श्लोक का शाब्दिक अर्थ नहीं है।

महासागर और लहरें

अनुभव बदलते हैं, चेतना का आधार बना रहता है।

चित्र का वर्णन: एक ही समुद्र में छोटी-बड़ी लहरें उठती और गिरती हैं।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जैसे एक ही लकड़ी से कुर्सी, मेज और दरवाजा बनाए जाते हैं और रूप अलग होने पर भी सब लकड़ी ही हैं, वैसे ही इस संसार के सभी रूपों में एक ही आत्मा है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: संसार के बाहरी नामों और रूपों में मत उलझिए; सबमें उस एक ही दिव्य तत्त्व को पहचानिए जो आप स्वयं हैं।

सामान्य गलतफहमी

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। ‘किं पृथग्भासते स्वर्णात्’ का अर्थ यह नहीं है कि व्यावहारिक जीवन में वस्तुओं के उपयोग का विवेक छोड़ दिया जाए, बल्कि आंतरिक अभेद को जानना है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी किसी अलग वस्तु या व्यक्ति को देखें, तो मन में कहें: "रूप अलग है, पर भीतर का तत्त्व वही एक सोना (चेतना) है।" (दिनभर)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं लोगों के बाहरी रूपों, कपड़ों और पदों को देखकर उनके भीतर की एक समान चेतना को भूल जाता हूँ?

छोटा अभ्यास: दो मिनट शांत बैठकर किसी भी वस्तु को देखें और विचार करें: "यह नाम और रूप है, पर जो इसे देख रहा है और जिसमें यह भास रहा है, वह मैं हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: तुम जो कुछ देखते हो उसमें तुम ही भासते हो; जैसे सोने से अलग कंगन और नूपुर नहीं होते।

English

Translation: Whatever you perceive, there you alone shine forth. Do bracelets, armlets, and anklets ever appear separate from gold?

Simple explanation: Invoking the classical Upanishadic analogy of gold and ornaments, Sage Ashtavakra shows that manifold names and forms do not divide the single underlying substance. Wherever you look, you perceive only your own luminous essence.

विषय और संबंधित श्लोक

  • स्वर्ण-आभूषण
  • विवर्त
  • अद्वैत
  • नाम-रूप
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 15.13: चिदाकाशेऽमले त्वयि।
  • श्लोक 15.15: अयं सोऽहमयं नाहं।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 219–220 (PDF पृ. 226–227)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। स्वर्ण-कटक दृष्टांत।