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अध्याय 16 · ज्ञान-संग्रह से परे
अष्टावक्र गीता, श्लोक 16.4
सत्यापित
मूल संस्कृत
व्यापारे खिद्यते यस्तु निमेषोन्मेषयोरपि । तस्यालस्यधुरीणस्य सुखं नान्यस्य कस्यचित् ॥ ४ ॥
IAST लिप्यंतरण
vyāpāre khidyate yas tu nimeṣonmeṣayor api | tasyālasyadhurīṇasya sukhaṃ nānyasya kasyacit || 4 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
व्यापारे, खिद्यते, यः, तु, निमेष-उन्मेषयोः, अपि, तस्य, आलस्य-धुरीणस्य, सुखम्, न, अन्यस्य, कस्यचित्
- यः तु
- जो पुरुष
- निमेष-उन्मेषयोः अपि व्यापारे
- पलकों के खोलने-मूँदने मात्र के व्यापार में भी
- खिद्यते
- कर्तापन का क्लेश (श्रम) अनुभव करता है
- तस्य आलस्य-धुरीणस्य सुखम्
- उस अक्रियता में श्रेष्ठ पुरुष को ही सच्चा सुख है
- अन्यस्य कस्यचित् न
- अन्य किसी कर्ता-अभिमानी को वह सुख नहीं मिल सकता
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जो पलकें झपकाने मात्र के व्यापार से भी खेद (श्रम) अनुभव करता है, उस श्रेष्ठ अक्रिय पुरुष को ही सच्चा सुख मिलता है, अन्य किसी को नहीं।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह अष्टावक्र गीता का अत्यंत विलक्षण श्लोक है। यहाँ ‘आलस्यधुरीण’ शब्द का अर्थ सांसारिक सुस्ती या प्रमाद नहीं है, बल्कि अहंकार के कर्तृत्व-भाव की पराकाष्ठा का अभाव है। ज्ञानी पुरुष अपनी साक्षी स्थिति में इतना विश्राम पा चुका है कि उसे आँख की पलकें झपकाने में भी कर्तापन का क्लेश लगता है। वह समझता है कि समस्त क्रियाएं प्रकृति के गुणों द्वारा स्वतः हो रही हैं, आत्मा सर्वथा अक्रिय है। ऐसे परम विश्रांत पुरुष को ही वास्तविक सुख प्राप्त होता है।
सरल हिन्दी में समझें
इस श्लोक में अष्टावक्र एक बहुत अनोखा शब्द इस्तेमाल करते हैं—"आलस्यधुरीण", जिसका अर्थ है पूरी तरह शांत और अक्रिय हो जाना।
इसका मतलब यह नहीं है कि आप आलसी होकर बिस्तर पर पड़े रहें। इसका असली अर्थ यह है कि ज्ञानी व्यक्ति के अंदर से "मैं कुछ कर रहा हूँ" का घमंड इतना खत्म हो जाता है कि वह पलक झपकाने को भी अपना काम नहीं मानता।
वह जानता है कि शरीर और सांसें कुदरत के नियम से चल रही हैं, और वह खुद सिर्फ एक शांत देखने वाला (साक्षी) है। जब इंसान के अंदर से कर्तापन का यह तनाव खत्म हो जाता है, तभी उसे सच्चा सुख मिलता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. आलस्यधुरीण शब्द आध्यात्मिक अक्रियता और नैष्कर्म्य-सिद्धि का लाक्षणिक प्रयोग है। 2. निमेष-उन्मेष का दृष्टांत गीता के 5.9 (निमिषन्निमिषन्नपि) के समान इंद्रिय-धर्म का साक्षी-भाव दर्शाता है। 3. खिद्यते का आशय यह है कि ज्ञानी चेतना में किसी भी कृत्रिम कर्तृत्व का आरोपण सहन नहीं करता। 4. सच्चा सुख क्रिया के आधिक्य में नहीं, क्रिया के पीछे छिपे कर्ता-अहंकार के लोप में है। 5. यह साधक को सहज स्थिति (spontaneous living) में स्थापित करने वाला सर्वोच्च निर्देश है। 6. प्रकृति अपने नियमों से कार्य करती है, आत्मा केवल निर्विकार साक्षी रहता है।
उदाहरण से समझें: जैसे बहती नदी में तैरने का हठ छोड़ देने पर पानी खुद-ब-खुद बहा ले जाता है और कोई थकान नहीं होती, वैसे ही प्रकृति के प्रवाह में कर्तापन छोड़ देने से शांति मिलती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब कोई व्यक्ति दिनभर की भागदौड़ के बाद रात को बिस्तर पर लेटकर सारे तनाव और नियंत्रण की कोशिश को पूरी तरह छोड़ देता है, तो उस क्षण जो राहत मिलती है, वह इसी अक्रियता का एक छोटा-सा रूप है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: हर चीज़ को खुद नियंत्रित करने का तनाव छोड़ दीजिए; शरीर और प्रकृति को अपना काम करने दें और आप साक्षी में विश्राम करें।
सामान्य गलतफहमी
तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। ‘आलस्यधुरीणस्य’ का अर्थ कामचोरी, शारीरिक सुस्ती या अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करना नहीं है; यह कर्तापन के मानसिक अहंकार की निवृत्ति है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज काम करते समय बीच-बीच में याद रखें: "सांसें अपने आप चल रही हैं, हृदय अपने आप धड़क रहा है, मैं सिर्फ इसका साक्षी हूँ।" (दिनभर)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं जीवन की हर छोटी-बड़ी घटना को अपने नियंत्रण में रखने की ज़िद करके खुद को थका रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट आँखें बंद करके अपनी सांसों को आते-जाते देखें, बिना उन्हें बदलने की कोशिश किए। केवल साक्षी रहें।
एक पंक्ति में सार: जो पलक झपकाने में भी कर्तापन का श्रम नहीं मानता, उस परम अक्रिय पुरुष को ही सच्चा सुख मिलता है।
English
Translation: He who feels weary even at the activity of blinking his eyelids—to that prince among the non-active alone belongs true happiness, and to none else.
Simple explanation: Using the radical metaphor of supreme non-action (ālasyadhurīṇa), Ashtavakra points to the absolute cessation of the doer-ego. When even blinking is recognized as nature’s effortless function rather than personal labor, unalloyed peace reigns.
विषय और संबंधित श्लोक
- नैष्कर्म्य
- अक्रियता
- आलस्यधुरीण
- साक्षी-स्थिति
- श्लोक 16.3: आयासात्सकलो दुःखी।
- श्लोक 16.5: इदं कृतमिदं नेति।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सोलहवें प्रकरण का चौथा श्लोक।