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प्रकरण 16: सोलहवाँ प्रकरणश्लोक ५/११45%

अध्याय 16 · ज्ञान-संग्रह से परे

अष्टावक्र गीता, श्लोक 16.5

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तं यदा मनः । धर्मार्थकाममोक्षेषु निरपेक्षं तदा भवेत् ॥ ५ ॥

IAST लिप्यंतरण

idaṃ kṛtam idaṃ neti dvandvair muktaṃ yadā manaḥ | dharmārthakāmamokṣeṣu nirapekṣaṃ tadā bhavet || 5 ||

सरल उच्चारण: idam kritam idam neti dvandvair muktam yadaa manah dharmaarthakaamamoksheshu nirapeksham tadaa bhavet (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

इदम्, कृतम्, इदम्, न, इति, द्वन्द्वैः, मुक्तम्, यदा, मनः, धर्म-अर्थ-काम-मोक्षेषु, निरपेक्षम्, तदा, भवेत्

यदा मनः
जब साधक का मन
इदम् कृतम् इदम् न इति द्वन्द्वैः
'यह मैंने कर लिया और यह अभी बाकी है' के द्वंद्वों से
मुक्तम् भवति
सर्वथा मुक्त हो जाता है
तदा
तब वह मन
धर्म-अर्थ-काम-मोक्षेषु
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों के प्रति
निरपेक्षम् भवेत्
अपेक्षा-रहित और निष्काम हो जाता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

जब मन ‘यह किया और यह नहीं किया’ के द्वंद्वों से मुक्त हो जाता है, तब वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के प्रति भी निरपेक्ष (अपेक्षा-रहित) हो जाता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: मन का सबसे बड़ा स्वभाव है तुलना और पश्चाताप करना। वह हमेशा इसी हिसाब-किताब में उलझा रहता है कि "मैंने इतना काम कर लिया, लेकिन यह छूट गया; मैंने इतना पुण्य किया, लेकिन मोक्ष नहीं मिला।" जब तक मन इस कृत-अकृत के द्वंद्व में फंसा है, तब तक वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की भी चिंता करता रहता है। किंतु जब यह द्वंद्व शांत हो जाता है, तब मन मोक्ष की चाह से भी छूटकर अपने नित्य-मुक्त स्वरूप में सहज हो जाता है।

सरल हिन्दी में समझें

हमारा दिमाग दिन-रात एक ही हिसाब-किताब में लगा रहता है—"मैंने आज क्या-क्या किया और क्या-क्या छूट गया।"

यहाँ तक कि पूजा-पाठ या साधना में भी इंसान यही सोचता रहता है कि "मैंने इतना ध्यान लगा लिया, अब मुझे मुक्ति कब मिलेगी?"

अष्टावक्र कहते हैं कि जब तक आप इस हिसाब-किताब में उलझे हैं, तब तक आप अशांत रहेंगे। जिस दिन आपका मन ‘किए और न किए’ के इस तनाव से बाहर आ जाता है, उस दिन आप धर्म, धन, सुख और यहाँ तक कि मोक्ष की चिंता से भी आज़ाद हो जाते हैं। और यही सच्ची स्वतंत्रता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. कृत-अकृत (doing and not-doing) का द्वंद्व चित्त-विक्षेप का मूल स्रोत है। 2. धर्मार्थकाममोक्ष की निरपेक्षता चारों पुरुषार्थों के अतिक्रमण और तुरीयावस्था का सूचक है। 3. मोक्ष की इच्छा भी जब तक एक साध्य रहती है, तब तक वह मन का एक संकल्प मात्र होती है। 4. गीता के ‘निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन निर्द्वन्द्वो’ का यह पूर्ण वेदान्ती प्रकटीकरण है। 5. मन की शांति किसी कार्य की पूर्णता में नहीं, कार्य के प्रति मानसिक आसक्ति के अभाव में है। 6. ज्ञानी पुरुष किसी लक्ष्य को पाने के लिए नहीं जीता, वह स्वयं में पूर्ण होकर जीता है।

उदाहरण से समझें: जैसे यात्रा पूरी होने पर टिकट और नक्शे की कोई ज़रूरत नहीं रह जाती, वैसे ही स्वरूप में स्थित होने पर चारों पुरुषार्थों की चिंता भी छूट जाती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

आधुनिक जीवन में जब हम टू-डू लिस्ट (to-do list) के न पूरे होने पर खुद को कोसते रहते हैं और तनाव में आ जाते हैं, तो यह उसी मानसिक द्वंद्व का उदाहरण है; इस हिसाब-किताब से बाहर आना ही शांति है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दिनभर के हिसाब-किताब और ‘यह बाकी रह गया’ के तनाव से बाहर निकलिए; मन को द्वंद्वों से मुक्त करके शांत रहिए।

सामान्य गलतफहमी

ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ‘धर्मार्थकाममोक्षेषु निरपेक्षं’ का अर्थ अनैतिक या गैर-कानूनी आचरण करना नहीं है, बल्कि धर्म और कर्तव्य को अहंकार-रहित सहज स्वभाव बनाना है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज रात सोने से पहले जो काम अधूरे रह गए हों, उनके लिए खुद को दोष दिए बिना मन से कहें: "आज का दिन समाप्त हुआ, अब मुझे कोई हिसाब नहीं रखना।" (रात को)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपनी टू-डू लिस्ट और उपलब्धियों के आधार पर अपनी आंतरिक शांति को तौल रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट आँखें मूँदकर विचार करें: "मैंने जो किया वह हो गया, जो नहीं हुआ वह प्रकृति पर छोड़ता हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: किए और न किए के द्वंद्वों से मुक्त मन धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की चिंता से भी छूट जाता है।

English

Translation: When the mind is liberated from the dualities of "this has been done and this not done," it becomes totally unconcerned even towards virtue, wealth, desire, and liberation.

Simple explanation: Mental turmoil thrives on the relentless bookkeeping of achievements and omissions. When the mind transcends the duality of "done" versus "undone," it steps beyond even the four traditional pursuits of life, resting in unconditioned serenity.

विषय और संबंधित श्लोक

  • द्वंद्व-मुक्ति
  • कृत-अकृत
  • निरपेक्षता
  • पुरुषार्थ-पार
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 16.4: तस्यालस्यधुरीणस्य सुखम्।
  • श्लोक 16.6: विरक्तो विषयद्वेष्टा।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 230–231 (PDF पृ. 237–238)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सोलहवें प्रकरण का पाँचवाँ श्लोक।