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अध्याय 16 · ज्ञान-संग्रह से परे
अष्टावक्र गीता, श्लोक 16.6
सत्यापित
मूल संस्कृत
विरक्तो विषयद्वेष्टा रागी विषयलोलुपः । ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान् ॥ ६ ॥
IAST लिप्यंतरण
virakto viṣayadveṣṭā rāgī viṣayalolupaḥ | grahamokṣavihīnas tu na virakto na rāgavān || 6 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
विरक्तः, विषय-द्वेष्टा, रागी, विषय-लोलुपः, ग्रह-मोक्ष-विहीनः, तु, न, विरक्तः, न, रागवान्
- विषय-द्वेष्टा विरक्तः
- सांसारिक विषयों से घृणा या द्वेष करने वाला विरक्त कहलाता है
- विषय-लोलुपः रागी
- और विषयों में लिप्त रहने वाला रागी कहलाता है
- ग्रह-मोक्ष-विहीनः तु
- किंतु जो पकड़ने और छोड़ने दोनों की ज़िद से रहित है
- न विरक्तः न रागवान्
- वह पुरुष न विरक्त है और न रागी (वह इन दोनों से परे है)
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
विषयों से द्वेष करने वाला विरक्त है और विषयों का लोलुप रागी है; किंतु जो पकड़ने और छोड़ने दोनों से रहित है, वह न विरक्त है और न रागी।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: साधारण लोग समझते हैं कि संसार से भागना और वस्तुओं से नफरत करना ही वैराग्य है। किंतु अष्टावक्र कहते हैं कि राग और द्वेष एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। संसारी विषयों से प्रेम करता है और त्यागी विषयों से नफरत करता है—दोनों का ध्यान विषयों पर ही अटका हुआ है। सच्चा ज्ञानी वह है जिसके अंदर न किसी वस्तु को पकड़ने का हठ (ग्रह) है और न किसी से भागने का द्वेष (मोक्ष)। वह इन दोनों के पार समता में स्थित रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
इस श्लोक में अष्टावक्र वैराग्य की एक बहुत परिपक्व और गहरी समझ देते हैं।
संसारी आदमी चीजों के पीछे भागता है क्योंकि उसे लगता है कि उनसे सुख मिलेगा। दूसरी तरफ, कुछ साधु-संन्यासी चीजों से नफरत करने लगते हैं और उनसे दूर भागते हैं।
अष्टावक्र कहते हैं कि ये दोनों ही चीज़ों में उलझे हुए हैं—एक प्यार से, दूसरा नफरत से। सच्चा समझदार वह है जो न तो किसी चीज़ को जबरदस्ती पकड़ता है और न किसी चीज़ से नफरत करके भागता है। जो सामने आ गया उसे सहज भाव से स्वीकार करता है और अंदर से पूरी तरह शांत रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. द्वेष भी राग का ही नकारात्मक रूप है (विपर्यय-राग)। 2. ग्रह (पकड़ना) और मोक्ष (छोड़ना) दोनों में मन का एक संकल्प और हठ विद्यमान रहता है। 3. सच्चा संन्यास बाह्य त्याग में नहीं, बल्कि आंतरिक उपेक्षा और समता में है। 4. गीता के 5.3 ‘यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति’ का यह सटीक दार्शनिक विश्लेषण है। 5. ज्ञानी विषयों को न शत्रु मानता है न मित्र; वह उन्हें चेतना के स्वाभाविक स्फुरण के रूप में देखता है। 6. यह साधक को कृत्रिम वैराग्य के दंभ से बचाकर सहज वीतरागता की ओर ले जाता है।
उदाहरण से समझें: जैसे दर्पण के सामने सुंदर फूल आए या कचरा, दर्पण न फूल को पकड़ता है और न कचरे से मुंह फेरता है; वैसे ही ज्ञानी न विषयों से चिपकता है न उनसे भागता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
आधुनिक जीवन में जब कोई व्यक्ति सोशल मीडिया के नशे में दिनभर डूबा रहता है (रागी) और दूसरा व्यक्ति गुस्से में फोन फेंककर जंगल भागना चाहता है (द्वेष्टा), तो दोनों ही अशांत हैं; संतुलित रूप से उसका सही उपयोग करना ही समता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: न चीज़ों के पीछे भागिए और न उनसे नफरत कीजिए; पकड़ने और छोड़ने दोनों की ज़िद से मुक्त होकर सहज रहिए।
सामान्य गलतफहमी
वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। ‘ग्रहमोक्षविहीनः’ का अर्थ अनैतिक या हानिकारक आदतों को अपना लेना नहीं है, बल्कि मानसिक द्वेष और हठ से मुक्त होना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब कोई अप्रिय परिस्थिति या व्यक्ति सामने आए, तो न उससे चिढ़ें और न भागें; शांत रहकर अपना कर्तव्य निभाएं। (दिनभर)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं किसी चीज़ या व्यक्ति से नफरत करके खुद को वैरागी मानने का भ्रम तो नहीं पाल रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "संसार में न कोई मेरा शत्रु है, न कोई मेरा बांधने वाला; मैं केवल शुद्ध साक्षी हूँ।"
एक पंक्ति में सार: विषयों से द्वेष करने वाला विरक्त है और लिप्त होने वाला रागी; जो पकड़ने-छोड़ने से रहित है वही सच्चा ज्ञानी है।
English
Translation: One who hates objects of sense is detached, and one who covets them is attached. But he who is free from both grasping and rejecting is neither attached nor detached.
Simple explanation: Aversion is merely desire turned inside out; both the hedonist and the ascetic remain obsessed with sense objects. The genuinely enlightened sage neither grabs nor pushes away, abiding effortlessly beyond the twin traps of craving and repulsion.
विषय और संबंधित श्लोक
- समता
- राग-द्वेष-पार
- ग्रहमोक्षविहीन
- सच्चा-वैराग्य
- श्लोक 16.5: द्वन्द्वैर्मुक्तं यदा मनः।
- श्लोक 16.7: हेयोपादेयता तावत्।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सोलहवें प्रकरण का छठा श्लोक।