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अध्याय 16 · ज्ञान-संग्रह से परे
अष्टावक्र गीता, श्लोक 16.2
सत्यापित
मूल संस्कृत
भोगं कर्म समाधिं वा कुरु विज्ञ तथापि ते । चित्तं निरस्तसर्वाशमत्यर्थं रोचयिष्यति ॥ २ ॥
IAST लिप्यंतरण
bhogaṃ karma samādhiṃ vā kuru vijña tathāpi te | cittaṃ nirastasarvāśam atyarthaṃ rocayiṣyati || 2 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
भोगम्, कर्म, समाधिम्, वा, कुरु, विज्ञ, तथापि, ते, चित्तम्, निरस्त-सर्व-आशम्, अत्यर्थम्, रोचयिष्यति
- विज्ञ
- हे बुद्धिमान् पुरुष!
- भोगम् कर्म समाधिम् वा कुरु
- तुम चाहे भोग भोगो, कर्म करो या समाधि लगाओ
- तथापि
- फिर भी
- निरस्त-सर्व-आशम् चित्तम्
- समस्त आशाओं और कामनाओं से रहित हुआ चित्त ही
- ते अत्यर्थम् रोचयिष्यति
- तुम्हें परम आनंद और संतोष प्रदान करेगा
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
हे विद्वान्! तुम भोग करो, कर्म करो अथवा समाधि लगाओ; फिर भी समस्त आशाओं से रहित तुम्हारा चित्त ही तुम्हें परम संतोष प्रदान करेगा।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: मनुष्य अपनी बेचैनी मिटाने के लिए तरह-तरह के रास्ते अपनाता है। कोई संसार के भोगों में सुख खोजता है, कोई बड़े-बड़े कर्मकांड और परोपकार में लगता है, और कोई गुफा में बैठकर हठपूर्वक समाधि लगाता है। किंतु अष्टावक्र कहते हैं कि क्रिया कोई भी हो, जब तक मन के अंदर ‘कुछ पाने’ या ‘कुछ बनने’ की आशा और तृष्णा जीवित है, तब तक परम शांति नहीं मिल सकती। जब चित्त समस्त आशाओं से शून्य (निरस्तसर्वाश) हो जाता है, तभी उसे असीम आनंद का अनुभव होता है।
सरल हिन्दी में समझें
इस श्लोक में अष्टावक्र बताते हैं कि शांति बाहरी क्रियाओं से नहीं, मन की चाहत मिटने से मिलती है।
आप चाहे दुनिया की सुख-सुविधाएं भोगें, दिन-रात मेहनत करें, या आँख मूँदकर घंटों ध्यान में बैठें—इनमें से कोई भी चीज़ आपको तब तक सुखी नहीं कर सकती जब तक आपके अंदर यह उम्मीद बनी हुई है कि "मुझे आगे चलकर कुछ मिलेगा।"
जब आपका मन भविष्य की सारी उम्मीदों, शर्तों और चाहतों को छोड़ देता है, तभी आपको इस पल में गहरा सुकून मिलता है। सच्चा सुख किसी साधना में नहीं, बल्कि चाहतों के खत्म होने में है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. क्रियात्मक विधियाँ (भोग, कर्म, समाधि) साध्य नहीं हैं, चित्त की आशा-मुक्ति ही साध्य है। 2. समाधि का अभ्यास भी यदि किसी फल की आशा से किया जाए तो वह मानसिक तनाव बन जाता है। 3. निरस्तसर्वाशम् चित्त की उस परम निष्कामता का द्योतक है जहाँ कोई भविष्योन्मुखी तृष्णा नहीं बचती। 4. आनंद आत्मा का स्वभाव है; आशाएं उस पर पर्दा डालती हैं। 5. यह श्लोक कर्मकांडी और हठयोगी दोनों के भ्रम को एक साथ दूर करता है। 6. सच्चा ज्ञानी किसी विशेष अवस्था का मोह नहीं रखता, बल्कि समस्त अवस्थाओं में आशारहित रहता है।
उदाहरण से समझें: जैसे प्यासे व्यक्ति को सोने का कटोरा दिया जाए या मिट्टी का, जब तक उसमें पानी न हो तब तक प्यास नहीं बुझती; वैसे ही भोग हो या समाधि, जब तक आशा नहीं मिटती तब तक शांति नहीं मिलती। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
आधुनिक जीवन में लोग कभी काम में, कभी पार्टियों में और कभी मेडिटेशन रिट्रीट में शांति ढूँढते हैं, लेकिन जब तक मन में लगातार ‘कुछ पाने’ की होड़ लगी रहती है, तब तक हर जगह अशांति ही रहती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: बाहरी काम या ध्यान बदलने से शांति नहीं मिलेगी; मन से सारी आशाएं और शर्तें हटाकर इसी पल में संतुष्ट रहिए।
सामान्य गलतफहमी
तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘निरस्तसर्वाशं’ का अर्थ जीवन से निराश हो जाना या अवसाद में चले जाना नहीं है, बल्कि व्यर्थ की तृष्णाओं से मुक्त होकर सहज आनंद में रहना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज किसी भी काम को करते समय यह उम्मीद मत रखिए कि लोग तारीफ करेंगे या कोई बड़ा फल मिलेगा; बस उस काम को सहजता से पूरा कीजिए। (दिनभर)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं ध्यान या साधना को भी किसी नई सांसारिक उपलब्धि की तरह पाने की कोशिश कर रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर मन से कहें: "मुझे भविष्य से कुछ नहीं चाहिए, मैं इसी क्षण पूर्ण हूँ।"
एक पंक्ति में सार: भोग, कर्म या समाधि—कुछ भी करो; केवल आशाओं से रहित चित्त ही तुम्हें परम संतोष दे सकता है।
English
Translation: Engage in pleasures, perform actions, or enter meditative trance, O wise one; nevertheless, your mind will truly delight only when drained of all expectations.
Simple explanation: Whether pursuing worldly pleasures, ritualistic work, or deep yogic absorption, genuine fulfillment remains elusive as long as expectation lingers. True bliss emerges spontaneously when the mind is stripped of all future-oriented craving.
विषय और संबंधित श्लोक
- निरस्तसर्वाश
- आशा-मुक्ति
- कर्म-समाधि-पार
- परम-संतोष
- श्लोक 15.2: मोक्षो विषयवैरस्यं।
- श्लोक 16.3: आयासात्सकलो दुःखी।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सोलहवें प्रकरण का दूसरा श्लोक।