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प्रकरण 16: सोलहवाँ प्रकरणश्लोक ९/११82%

अध्याय 16 · ज्ञान-संग्रह से परे

अष्टावक्र गीता, श्लोक 16.9

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

हातुमिच्छति संसारं रागी दुःखजिहासया । वीतरागो हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति ॥ ९ ॥

IAST लिप्यंतरण

hātum icchati saṃsāraṃ rāgī duḥkhajihāsayā | vītarāgo hi nirduḥkhas tasminn api na khidyate || 9 ||

सरल उच्चारण: haatum ichchhati samsaaram raagee duhkhajihaasayaa veetaraago hi nirduhkhas tasminn api na khidyate (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

हातुम्, इच्छति, संसारम्, रागी, दुःख-जिहासया, वीतरागः, हि, निर्दुःखः, तस्मिन्, अपि, न, खिद्यते

रागी दुःख-जिहासया
संसारी आसक्त मनुष्य दुखों से बचने और भागने की इच्छा से
संसारम् हातुम् इच्छति
संसार को छोड़ना और त्यागना चाहता है
वीतरागः हि निर्दुःखः
किंतु राग-रहित पुरुष तो स्वभाव से ही निर्दुःख है
तस्मिन् अपि न खिद्यते
वह संसार में रहते हुए भी तनिक भी दुखी या क्लेशित नहीं होता

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

रागी पुरुष दुखों से बचने की इच्छा से संसार को छोड़ना चाहता है; किंतु वीतराग पुरुष स्वभाव से ही दुखरहित है, वह संसार में रहते हुए भी दुखी नहीं होता।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक वैराग्य के ढोंग और सच्चे वैराग्य का अंतर खोलकर रख देता है। जब कोई व्यक्ति संसार के कष्टों, अपमान या असफलता से घबराकर कहता है कि "मुझे सब कुछ छोड़ देना है", तो वह वास्तव में वैरागी नहीं बल्कि रागी ही है। वह अभी भी दुख से भागकर सुख की खोज कर रहा है। इसके विपरीत, सच्चा वीतराग वह है जिसकी तृष्णा मिट चुकी है। वह जहाँ है, जिस परिस्थिति में है, वहीं शांत है। उसे न संसार छोड़ने की जल्दी है और न पकड़ने की; वह संसार के बीच रहकर भी अखंड शांति में रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

बहुत से लोग तब संन्यास या वैराग्य की बात करने लगते हैं जब उनके जीवन में कोई बड़ा नुकसान या दुख आ जाता है।

अष्टावक्र कहते हैं कि दुखों से डरकर भागना कोई वैराग्य नहीं है। ऐसा व्यक्ति अभी भी सुख की तलाश में भाग रहा है, इसलिए वह वास्तव में आसक्त (रागी) ही है।

सच्चा वीतराग वह है जो दुखों से डरता नहीं है। वह जानता है कि सुख-दुख आते-जाते रहते हैं लेकिन उसकी अपनी आत्मा सदा शांत और अछूती है। इसलिए वह संसार में अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भी अंदर से पूरी तरह हल्का और खुश रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. पलायनवाद (escapism) और सच्चा वैराग्य परस्पर विरोधी स्थितियाँ हैं। 2. दुःखजिहासा (दुख से छूटने की चाह) भी एक प्रकार की कामना है जो राग पर आधारित है। 3. वीतराग की निर्दुःखता बाह्य परिस्थितियों पर निर्भर नहीं, अपितु आत्म-स्वरूप की अपरोक्ष निष्ठा पर आधारित है। 4. संसार कोई भौगोलिक स्थान नहीं है जिसे छोड़ा जाए; यह मन की आसक्ति का नाम है। 5. गीता के ‘पद्मपत्रमिवाम्भसा’ (कमल के पत्ते पर जल) की तरह ज्ञानी संसार में निर्लेप रहता है। 6. यह श्लोक साधक को जीवन की चुनौतियों से भागने के बजाय उनके प्रति आंतरिक अनासक्ति विकसित करने की प्रेरणा देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे नाव पानी में रहे तो कोई समस्या नहीं है, समस्या तब होती है जब पानी नाव के अंदर आ जाए; वैसे ही ज्ञानी संसार में रहे तो कोई दुख नहीं, जब तक संसार उसके मन में न घुसे। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

आधुनिक समय में जब कोई व्यक्ति ऑफिस या रिश्ते की कड़वाहट से घबराकर सब कुछ छोड़कर किसी दूर पहाड़ पर भागना चाहता है, तो वह उसी पलायनवादी राग में होता है; असली समाधान मन की शांति में है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: समस्याओं से डरकर भागना वैराग्य नहीं है; संसार के बीच रहकर भी अंदर से अछूते और शांत रहना ही सच्ची मुक्ति है।

सामान्य गलतफहमी

यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। ‘हातुमिच्छति संसारं’ का अर्थ यह नहीं है कि कठिन परिस्थितियों में मदद न माँगी जाए; यदि जीवन से हताशा महसूस हो तो किसी विशेषज्ञ या सहायता-सेवा से संपर्क अवश्य करें।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी किसी कठिन परिस्थिति का सामना हो, तो उससे भागने की सोचने के बजाय कहें: "यह परिस्थिति बाहर है, मेरी आत्मा अंदर शांत है।" (कठिन समय में)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं जीवन की ज़िम्मेदारियों से थककर वैराग्य का बहाना बना रहा हूँ, या सचमुच मेरे अंदर से तृष्णा मिट चुकी है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें कि आप एक शांत कमल के फूल की तरह हैं जिस पर संसार के पानी की कोई बूँद नहीं ठहरती।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: दुख से घबराकर संसार छोड़ना चाहने वाला रागी है; सच्चा वीतराग संसार में रहकर भी कभी दुखी नहीं होता।

English

Translation: The attached man wishes to renounce the world in order to escape sorrow, but the unattached one is inherently free of sorrow and does not suffer even while remaining in the world.

Simple explanation: Fleeing the world out of aversion to pain is merely attachment in reverse. The truly dispassionate sage (vītarāga) is fundamentally immune to sorrow, living in the midst of daily existence without the slightest inward distress.

विषय और संबंधित श्लोक

  • सच्चा-वैराग्य
  • पलायन-मुक्ति
  • निर्दुःख
  • वीतरागता
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 16.8: बालवद्धीमान्।
  • श्लोक 16.10: यस्याभिमानो मोक्षेऽपि।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 234–235 (PDF पृ. 241–242)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सोलहवें प्रकरण का नवाँ श्लोक।