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प्रकरण 1: पहला प्रकरणश्लोक १९/२०95%

अध्याय 1 · आत्मज्ञान का आह्वान

अष्टावक्र गीता, श्लोक 1.19

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र

यथैवादर्शमध्यस्थे रूपेऽन्तः परितस्तु सः । तथैवास्मिञ्छरीरेऽन्तः परितः परमेश्वरः ॥ १९ ॥

IAST लिप्यंतरण

yathaivādarśamadhyasthe rūpe 'ntaḥ paritas tu saḥ | tathaivāsmiñ śarīre 'ntaḥ paritaḥ parameśvaraḥ || 19 ||

सरल उच्चारण: यथा एव आदर्श-मध्यस्थे रूपे अन्तः परितः तु सः। तथा एव अस्मिन् शरीरे अन्तः परितः परमेश्वरः॥ (yathaa eva aadarsha-madhyasthe roope antah paritah tu sah; tathaa eva asmin shareere antah paritah parameshvarah)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

यथा, एव, आदर्शमध्यस्थे, रूपे, अन्तः, परितः, तु, सः, तथा, एव, अस्मिन्, शरीरे, अन्तः, परितः, परमेश्वरः

आदर्शमध्यस्थे रूपे
दर्पण के भीतर दिखने वाले प्रतिबिम्ब में
अन्तः परितः
भीतर और चारों ओर
सः
वह (दर्पण)
अस्मिन् शरीरे
इस शरीर में
परमेश्वरः
परमेश्वर, परम चेतना

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

जैसे दर्पण में दिखने वाले प्रतिबिम्ब के भीतर और चारों ओर वह दर्पण ही है, वैसे ही इस शरीर के भीतर और चारों ओर परमेश्वर है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

पुस्तक के अनुसार जैसे दर्पण में दिखने वाले प्रतिबिम्ब के भीतर, मध्य में और बाहर चारों ओर दर्पण ही व्याप्त होकर रहता है और प्रतिबिम्ब केवल देखने-मात्र का है, स्वरूप से सत्य नहीं, वैसे ही आत्मा में अध्यस्त (आरोपित) जो शरीर है, उसके भीतर, बाहर और चारों ओर चेतन आत्मा ही व्याप्त होकर स्थित है। टीका कहती है कि कल्पित पदार्थ की अधिष्ठान से भिन्न अपनी सत्ता कुछ नहीं होती, वह अधिष्ठान की सत्ता से ही सत्य जैसा लगता है, जैसे सीप में चाँदी और दर्पण में प्रतिबिम्ब। इसी तरह शरीर आदि भी आत्मा में उसी की सत्ता से सत्य जैसे लगते हैं, पर वे स्वतंत्र रूप से सत्य नहीं हैं।

टीका आगे कहती है कि दर्पण के उदाहरण से जनक को यह भ्रम हो सकता है कि जैसे दर्पण सीमित है, आत्मा भी सीमित होगी; इस भ्रम को दूर करने के लिए अगले श्लोक में दूसरा दृष्टांत दिया जाएगा।

सरल हिन्दी में समझें

दर्पण में आपकी छवि दिखती है, पर वह छवि दर्पण के बिना नहीं हो सकती, और छवि में दर्पण ही चारों ओर फैला है। ऋषि कहते हैं कि शरीर भी जागरूकता के दर्पण में एक छवि जैसा है। उसके भीतर-बाहर जागरूकता ही है।

यह शरीर को बेकार बताने की बात नहीं है। यह देखने का तरीका है कि हमारी चेतना शरीर से बड़ी और उसे घेरने वाली है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक कहता है कि जैसे प्रतिबिम्ब के भीतर-बाहर दर्पण है, वैसे ही शरीर के भीतर-बाहर परमेश्वर (परम चेतना) है। 2. यह शरीर को ही स्वतंत्र वास्तविकता मानने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह आत्मा को अधिष्ठान और शरीर को आरोपित बताता है। 4. अध्याय में यह सर्वव्यापकता के उदाहरणों की श्रृंखला का पहला उदाहरण है। 5. 1.18 के निराकार-निश्चल की बात का दृष्टांत। 6. यह परम दृष्टि है। 7. गलतफहमी से बचें: आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। साथ ही, दर्पण का दृष्टांत आत्मा को सीमित नहीं ठहराता।

उदाहरण से समझें: जैसे दर्पण में दिखता कमरा, सब कुछ दर्पण की सतह पर ही दिखता है और उसके बिना नहीं, वैसे ही शरीर चेतना पर प्रतीत होता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या

संपादकीय सहायक चित्र; यह श्लोक का शाब्दिक अर्थ नहीं है।

साक्षी

बादल बदलते हैं, आकाश नहीं। विचार बदलते हैं, साक्षी नहीं।

चित्र का वर्णन: स्थिर नीले आकाश में कुछ बादल बाएँ से दाएँ गुज़रते हैं।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति अपनी तस्वीर या प्रोफ़ाइल से जुड़कर उसे ही अपना असली रूप मानने लगता है। जब वह देखता है कि वह तस्वीर एक छवि है और छवि को देखने वाली आँख उससे अलग है, तो छवि के प्रति उसका मोह हल्का होता है, और वह अपनी सेहत का पहले जैसा ध्यान रखता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: छवि को सँवारिए, पर उसे देखने वाली आँख को याद रखिए।

सामान्य गलतफहमी

देह से असंग होने का अर्थ शरीर की उपेक्षा करना नहीं है। आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज दर्पण या कैमरे में अपने को देखते समय एक बार रुककर सोचिए: ‘इस छवि को देखने वाला कौन है?’ फिर अपने रोज़ के कामों में लग जाइए। (1 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: अपनी छवि के पीछे मैं किस देखने वाली दृष्टि को भूल जाता हूँ?

छोटा अभ्यास: एक मिनट के लिए किसी दर्पण या फ़ोटो को देखिए और ध्यान दीजिए कि देखने वाला कहाँ से देख रहा है।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: जैसे प्रतिबिम्ब में दर्पण ही सब ओर है, वैसे शरीर के भीतर-बाहर चेतना ही है।

English

Translation: Just as the mirror is within and all around the image seen in it, so the Supreme is within and all around this body.

Simple explanation: A reflection depends on the mirror, which pervades it. Likewise the body appears on consciousness, which is within and around it. The next verse corrects the thought that consciousness is limited like a mirror. Nothing here advises neglecting the body.

विषय और संबंधित श्लोक

  • अद्वैत
  • चेतना
  • आत्मज्ञान
  • साक्षीभाव
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 1.18: निराकार, निश्चल तत्त्व की बात का दृष्टांत।
  • श्लोक 1.20: दर्पण की सीमा के भ्रम को दूर करने वाला आकाश का दृष्टांत।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 39–40 (PDF पृ. 46–47)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया। मुद्रण में ‘रूपेन्तः’ और ‘शरीरेन्तः’ जैसे रूप दिखते हैं, जिन्हें अवग्रह सहित (रूपेऽन्तः, शरीरेऽन्तः) लिखा गया है।