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प्रकरण 14: चौदहवाँ प्रकरणश्लोक ३/४75%

अध्याय 14 · संस्कारों से स्वतंत्रता

अष्टावक्र गीता, श्लोक 14.3

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: जनक (पुस्तक में वक्ता-लेबल: जनक उवाच)

विज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे । नैराश्ये बन्धमोक्षे च न चिन्ता मुक्तये मम ॥ ३ ॥

IAST लिप्यंतरण

vijñāte sākṣipuruṣe paramātmani ceśvare | nairāśye bandhamokṣe ca na cintā muktaye mama || 3 ||

सरल उच्चारण: vijnyaate saakshipurushe paramaatmani cheshvare nairaashye bandhamokshe cha na chintaa muktaye mama (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

विज्ञाते, साक्षि-पुरुषे, परमात्मनि, च, ईश्वरे, नैराश्ये, बन्ध-मोक्षे, च, न, चिन्ता, मुक्तये, मम

साक्षिपुरुषे परमात्मनि च ईश्वरे विज्ञाते
साक्षी स्वरूप, परमात्मा और परमेश्वर का प्रत्यक्ष बोध हो जाने पर
बन्धमोक्षे च नैराश्ये
तथा बंधन और मोक्ष दोनों की कल्पनाओं से पूर्णतः उदासीन (निराश) हो जाने पर
मम मुक्तये चिन्ता न
मुझे अब मुक्ति के लिए भी कोई चिंता या व्याकुलता नहीं रही

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

साक्षी पुरुष, परमात्मा और ईश्वर को जान लेने पर, और बंधन तथा मोक्ष दोनों के प्रति उदासीन हो जाने पर, अब मुझे मुक्ति की भी कोई चिंता नहीं रही।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: साधक जब तक अज्ञान में होता है, तब तक वह समझता है कि ‘मैं बँधा हुआ जीव हूँ’ और ‘मुझे कठिन साधना करके मोक्ष पाना है’। वह मोक्ष की प्राप्ति के लिए भी निरंतर चिंताग्रस्त रहता है। किंतु जब गुरु-कृपा से यह साक्षात्कार हो जाता है कि आत्मा तो सदा से ही साक्षी, परमात्मा और नित्य-मुक्त है, तब न कोई बंधन सिद्ध होता है और न अलग से मोक्ष पाना शेष रहता है। राजा जनक कहते हैं कि अब मुक्ति की चिंता भी समाप्त हो गई।

सरल हिन्दी में समझें

यह श्लोक अद्वैत दर्शन के सबसे गहरे सत्य को सामने लाता है।

बहुत से साधक मोक्ष या ईश्वर-प्राप्ति को भी एक नया तनाव बना लेते हैं। वे दिन-रात इसी चिंता में घुलते हैं कि "मुझे मोक्ष कब मिलेगा, क्या मैं इस जन्म में मुक्त हो पाऊँगा?"

राजा जनक कहते हैं कि जब उन्हें अपनी असली पहचान—साक्षी आत्मा—का पता चला, तो वे समझ गए कि वे कभी बँधे ही नहीं थे। जब बंधन ही झूठा था, तो छूटने की क्या चिंता? इसलिए अब उनके मन से मुक्ति पाने का तनाव भी पूरी तरह मिट चुका है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. बंधन और मोक्ष दोनों ही सापेक्ष (relative) मानसिक धारणाएं हैं; शुद्ध आत्मा दोनों से परे है। 2. साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे विज्ञाते जीव-ब्रह्म की अखंड एकता का साक्षात अनुभव है। 3. नैराश्ये शब्द यहाँ निराशा (depression) नहीं, बल्कि वासना और अपेक्षाओं की पूर्ण समाप्ति (freedom from expectations) दर्शाता है। 4. मुक्ति की चिंता भी एक सूक्ष्म बंधन है; जब वह भी छूटती है तभी सच्ची मुक्ति सिद्ध होती है। 5. आत्मा नित्य-मुक्त है, इसलिए मोक्ष कोई नई घटना नहीं बल्कि केवल अज्ञान की निवृत्ति है। 6. यह साधक को भविष्य की आध्यात्मिक आशाओं से निकालकर वर्तमान की पूर्णता में प्रतिष्ठित करता है।

उदाहरण से समझें: जैसे सपने में हथकड़ी में जकड़े व्यक्ति को नींद से जागने पर किसी चाबी की जरूरत नहीं होती क्योंकि बंधन था ही नहीं, वैसे ही आत्मबोध होने पर मोक्ष का तनाव समाप्त हो जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

आधुनिक जीवन में जब कोई व्यक्ति किसी काल्पनिक बीमारी की चिंता में महीनों व्यतीत करता है और डॉक्टर की सही रिपोर्ट देखकर यह जान लेता है कि वह पूरी तरह स्वस्थ था, तो उसकी चिंता तुरंत गायब हो जाती है; यही बोध आत्मा के नित्य-मुक्त होने का है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मोक्ष को कोई दूर का भविष्य का लक्ष्य मत बनाइए; आप इस क्षण भी नित्य-मुक्त साक्षी आत्मा हैं।

सामान्य गलतफहमी

सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘न चिन्ता मुक्तये मम’ का अर्थ नैतिक या आध्यात्मिक अनुशासन को त्याग देना नहीं है, बल्कि मुक्ति के तनाव से मुक्त होकर शुद्ध साक्षी में जीना है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी मन में किसी आध्यात्मिक प्रगति या कमी को लेकर बेचैनी हो, तो याद रखें: "मेरी चेतना सदा शुद्ध और अप्रभावित है।" (लगभग 2 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैंने अपनी आध्यात्मिक खोज को भी एक नए प्रकार का तनाव या उपलब्धि की दौड़ बना लिया है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट रीढ़ सीधी करके बैठें और स्वयं को याद दिलाएं: "मैं न बद्ध हूँ, न साधक; मैं केवल नित्य साक्षी हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: साक्षी परमात्मा का बोध होने पर और बंधन-मोक्ष की भ्रांति मिटने पर मुझे मुक्ति की भी कोई चिंता नहीं रही।

English

Translation: Knowing the Witness, the Supreme Self and Lord, indifferent to bondage and liberation, I have no anxiety for release.

Simple explanation: King Janaka touches the core of Advaita: realizing the ever-present Witness dissolves the very concepts of bondage and liberation. When one recognizes one was never bound, even the anxious craving for salvation ends.

विषय और संबंधित श्लोक

  • नित्यमुक्त
  • साक्षी-बोध
  • बंधन-मोक्ष-मुक्ति
  • परम शांति
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 1.15: निःसङ्गो निष्क्रियोऽसि त्वम्।
  • श्लोक 14.4: अन्तर्विकल्पशून्यस्य।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 201–203 (PDF पृ. 208–210)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। नित्य-मुक्ति का प्रत्यक्ष बोध।