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प्रकरण 8: आठवाँ प्रकरणश्लोक ३/४75%

अध्याय 8 · बंधन और मुक्ति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 8.3

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल नहीं छपा; भावार्थ के संदर्भ से)

तदा बन्धो यदा चित्तं सक्तं कास्वपि दृष्टिषु । तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु ॥ ३ ॥

IAST लिप्यंतरण

tadā bandho yadā cittaṃ saktaṃ kāsv api dṛṣṭiṣu | tadā mokṣo yadā cittam asaktaṃ sarvadṛṣṭiṣu || 3 ||

सरल उच्चारण: tadaa bandho yadaa chittam saktam kaasv api drishtishu tadaa moksho yadaa chittam asaktam sarvadrishtishu (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

तदा, बन्धः, यदा, चित्तम्, सक्तम्, कासु, अपि, दृष्टिषु, तदा, मोक्षः, यदा, चित्तम्, असक्तम्, सर्वदृष्टिषु

सक्तम् कासु अपि दृष्टिषु
किसी भी दृष्टि (विषय) में लगा हुआ
तदा बन्धः
तब बंध है
असक्तम् सर्वदृष्टिषु
सब विषयों में आसक्ति-रहित
तदा मोक्षः
तब मोक्ष है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

जब मन किसी भी दृष्टि (विषय) में आसक्त है, तब बंध है; और जब मन सब दृष्टियों (विषयों) में अनासक्त है, तब मोक्ष है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

पुस्तक के अनुसार पहले एक वाक्य से बंध का लक्षण कहा गया था और दूसरे से मुक्ति का। अब एक ही वाक्य से बंध और मोक्ष दोनों का कथन किया जाता है। जब चित्त अनात्म पदार्थों में अनात्माकार वृत्ति वाला होता है, तब बंध होता है। जब चित्त विषयाकार नहीं होता, अर्थात् आसक्ति से रहित होकर सर्वत्र आत्मदृष्टि वाला होता है, तभी जीव मुक्त कहा जाता है।

टीका शंका उठाती है कि यदि एक ही चित्त में काल-भेद से बंध और मोक्ष माने जाएँगे, तो मुक्ति अनित्य हो जाएगी। उत्तर में कहा गया है कि इस वाक्य का तात्पर्य यह है कि आत्म-ज्ञान की प्राप्ति से पूर्व जितने काल तक पुरुष का चित्त विचार से शून्य होकर विषयों में आसक्त रहता है, उतने काल तक जीव बंध में ही पड़ा रहता है। पश्चात् जब विचार करके युक्त हुआ, रचित दोष-दृष्टि करके विषयों में आसक्ति से रहित हो जाता है और विषय-वासना का बीज भी चित्त में नहीं रहता, तब वह मुक्त होकर कदापि बंध को नहीं प्राप्त होता। जैसे भूँजे हुए बीज में अंकुर उत्पन्न करने की शक्ति नहीं रहती, वैसे ही निर्वासनिक चित्त वाला पुरुष जन्म को नहीं प्राप्त होता।

सरल हिन्दी में समझें

अब बंध और मुक्ति एक ही वाक्य में कही गई हैं: चित्त जिस भी चीज़ में चिपक जाए, वहीं बंधन है; जब वह किसी में भी जकड़ता नहीं, तब मुक्ति है।

पुस्तक इसे कोई ऐसी चीज़ नहीं बताती जो आकर फिर चली जाए। जब समझ गहरी हो जाए और चिपकने का बीज ही नहीं रहे, तब वह स्थिति स्थायी हो जाती है, जैसे भुना हुआ बीज फिर अंकुर नहीं देता। यह जीवन के रिश्तों और कामों को छोड़ना नहीं है; यहाँ चिपकन की बात है।

यह भी ध्यान रहे कि यह खुद को या दूसरे को ‘बँधा’ या ‘मुक्त’ घोषित करने का पैमाना नहीं है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक कहता है कि किसी भी विषय में आसक्त चित्त बंध है और सब विषयों में अनासक्त चित्त मोक्ष है। 2. यह बंध-मोक्ष को बाहरी स्थिति मानने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह आसक्ति और आत्मदृष्टि का भेद प्रकट करता है। 4. अध्याय में यह पहले दो श्लोकों के लक्षणों का संक्षिप्त सार है। 5. 8.1–8.2 के विस्तृत लक्षणों को एक ही वाक्य में समेटता है। 6. यह परम दृष्टि है। 7. इसे अपने या किसी और के ‘बँधे’ या ‘मुक्त’ होने की घोषणा का पैमाना न बनाएँ।

उदाहरण से समझें: जैसे गोंद लगी चीज़ हर चीज़ से चिपकती है और सूखी चीज़ किसी से नहीं, वैसे आसक्त चित्त और अनासक्त चित्त का अंतर है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या

संपादकीय सहायक चित्र; यह श्लोक का शाब्दिक अर्थ नहीं है।

वैराग्य

वस्तु का उपयोग, पर उस पर मानसिक निर्भरता नहीं।

चित्र का वर्णन: एक खुली हथेली पर रखी गोल वस्तु, उँगलियाँ उसे जकड़ती नहीं।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति देखता है कि उसका मन एक ही चीज़ (फ़ोन, राय, उपलब्धि) से बार-बार चिपकता है। जब वह उस चिपकन को पहचानकर धीरे-धीरे ढीला करता है, तो वह उन चीज़ों का उपयोग करता है पर उनसे बँधा नहीं रहता। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: बंध और मुक्ति का फ़र्क चीज़ों में नहीं, मन के चिपकने या न चिपकने में है।

सामान्य गलतफहमी

वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। मोक्ष का अर्थ यहाँ अपने स्वरूप की पहचान से उपजी भीतरी स्वतंत्रता है; यह किसी जगह जाना या जीवन के कर्तव्यों से छूटना नहीं है। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। साक्षीभाव का अर्थ भावनाओं को दबाना नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज एक चीज़ चुनिए जिससे आपका मन बार-बार चिपकता है, और उसका उपयोग करते हुए बीच-बीच में देखिए कि चिपकन कब होती है। (लगभग 5 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: मेरा मन किस चीज़ से सबसे ज़्यादा चिपकता है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट के लिए एक चीज़ को हाथ में लीजिए और हल्के से पकड़िए, फिर कसकर, फिर ढीला छोड़िए। देखिए कि मन भी कब कसता है।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: चिपकन बंध है, अनासक्ति मुक्ति; चीज़ें नहीं, मन की पकड़ असली बात है।

English

Translation: There is bondage when the mind clings to any view or object; there is liberation when the mind clings to none.

Simple explanation: This verse compresses the first two into one: bondage and liberation differ in whether the mind clings, not in the things themselves. It is not a scale for declaring anyone bound or free.

विषय और संबंधित श्लोक

  • बंधन
  • मुक्ति
  • वैराग्य
  • चित्त
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 8.1: बंध का लक्षण।
  • श्लोक 8.2: मुक्ति का लक्षण।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 125–126 (PDF पृ. 132–133)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया।