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अध्याय 8 · बंधन और मुक्ति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 8.2
सत्यापित
मूल संस्कृत
तदा मुक्तिर्यदा चित्तं न वाञ्छति न शोचति । न मुञ्चति न गृह्णाति न हृष्यति न कुप्यति ॥ २ ॥
IAST लिप्यंतरण
tadā muktir yadā cittaṃ na vāñchati na śocati | na muñcati na gṛhṇāti na hṛṣyati na kupyati || 2 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
तदा, मुक्तिः, यदा, चित्तम्, न, वाञ्छति, न, शोचति, न, मुञ्चति, न, गृह्णाति, न, हृष्यति, न, कुप्यति
- यदा चित्तम् न वाञ्छति
- जब मन नहीं चाहता
- न शोचति
- शोक नहीं करता
- न मुञ्चति न गृह्णाति
- न छोड़ता है न पकड़ता है
- न हृष्यति न कुप्यति
- न हर्षित होता है न कुपित
- तदा मुक्तिः
- तब मुक्ति है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जब मन न चाहता है, न शोक करता है, न छोड़ता है, न ग्रहण करता है, न हर्षित होता है और न कुपित होता है, तब मुक्ति है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
पुस्तक के अनुसार जिस काल में चित्त न भोगों की प्राप्ति की इच्छा करता है, और न शोकों के त्याग की इच्छा करता है, अर्थात् पदार्थ के पाने पर न उसको हर्ष होता है, और न प्यारे सम्बन्धियों के नष्ट या वियोग हो जाने पर शोक होता है, किन्तु एकरस सदा ज्यों का त्यों बना रहता है, उसी काल में वह पुरुष मोक्ष को प्राप्त हो जाता है।
सरल हिन्दी में समझें
यह पिछले श्लोक का दर्पण-प्रतिबिंब है। जब मन चाह, शोक, पकड़, छोड़, हर्ष और क्रोध की उसी डोर से नहीं खिंचता, तब वही मुक्ति है।
पुस्तक की इस बात को ‘न हर्ष, न शोक’ के शब्दों में अक्षरशः पढ़ने पर यह गलत लग सकता है कि कोई इंसान कुछ महसूस ही न करे। इसे इस तरह समझिए कि भीतर एक स्थिर, एकरस जगह बन जाती है और भावनाएँ उसे पूरी तरह नहीं बहा ले जातीं। जीवन में स्नेह, देखभाल, करुणा और प्रयास बने रहते हैं। किसी प्रियजन के वियोग पर दुख होना मानवीय है, और यह श्लोक उसे गलत नहीं ठहराता।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. श्लोक कहता है कि चित्त के चाह, शोक, पकड़-छोड़, हर्ष-क्रोध से न खिंचने की स्थिति मुक्ति है। 2. यह मुक्ति को किसी बाहरी प्राप्ति या स्थान से जोड़ने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह साक्षी की एकरसता और अचलता को प्रकट करता है। 4. अध्याय में यह बंध और मुक्ति के लक्षणों का दूसरा पक्ष है। 5. 8.1 का सीधा विपरीत रूप। 6. यह परम दृष्टि है। 7. इसे भावशून्यता, दुख की निंदा या स्नेह के अभाव के अर्थ में न पढ़ें।
वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है।
उदाहरण से समझें: जैसे शांत झील में मौसम बदलने पर भी गहराई एकरस रहती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या
साक्षी
बादल बदलते हैं, आकाश नहीं। विचार बदलते हैं, साक्षी नहीं।
आज की जिंदगी से उदाहरण
कोई व्यक्ति किसी प्रियजन के जाने के बाद गहरे शोक में है। वह शोक को दबाता नहीं, रोता है और सहारा लेता है, और साथ ही देखता है कि भीतर कुछ है जो इस सबको सहारा देता है और जिसे यह शोक पूरी तरह बहा नहीं पाया। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: भावनाओं को महसूस कीजिए; और खोजिए कि उनके नीचे एक स्थिर जगह भी है।
सामान्य गलतफहमी
तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। साक्षीभाव का अर्थ भावनाओं को दबाना नहीं है। समत्व का अर्थ संवेदनहीनता नहीं है। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। मोक्ष का अर्थ यहाँ अपने स्वरूप की पहचान से उपजी भीतरी स्वतंत्रता है; यह किसी जगह जाना या जीवन के कर्तव्यों से छूटना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज अपनी एक भावना को पूरी तरह महसूस कीजिए, बिना उसे दबाए, और फिर देखिए कि उसे महसूस करने वाली जगह कैसी है। (लगभग 5 मिनट)
आत्मचिंतन प्रश्न: मेरी किस भावना के नीचे मैं एक स्थिर जगह महसूस कर पाता हूँ?
छोटा अभ्यास: चार मिनट बैठकर एक हाल की भावना को याद कीजिए और शरीर में उसकी जगह देखिए। फिर पूछिए: ‘इसे जानने वाला कैसा है?’ दर्द बढ़े तो रुकिए और किसी से बात कीजिए।
एक पंक्ति में सार: मुक्ति भावनाओं का अभाव नहीं, भावनाओं की डोर में न खिंचना है।
English
Translation: There is liberation when the mind neither desires, nor grieves, nor rejects, nor accepts, nor rejoices, nor is angered.
Simple explanation: Liberation is described as the mind no longer being pulled by wanting, grieving, grasping, rejecting, delight and anger. It is not emotional numbness and not disregard for loss; feeling grief remains human.
विषय और संबंधित श्लोक
- मुक्ति
- समत्व
- साक्षीभाव
- शांति
- श्लोक 8.1: बंध का लक्षण।
- श्लोक 3.14: सहज आए अनुभव में समता।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया (मूल में ‘तदामुक्तिर्यदा’ जुड़ा हुआ और पदच्छेद में अलग)।