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प्रकरण 17: सत्रहवाँ प्रकरणश्लोक १४/२०70%

अध्याय 17 · मुक्त आचरण

अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.14

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

सानुरागां स्त्रियं दृष्ट्वा मृत्युं वा समुपस्थितम् । अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एव महाशयः ॥ १४ ॥

IAST लिप्यंतरण

sānurāgāṃ striyaṃ dṛṣṭvā mṛtyuṃ vā samupasthitam | avihvalamanāḥ svastho mukta eva mahāśayaḥ || 14 ||

सरल उच्चारण: saanuraagaam striyam drishtvaa mrityum vaa samupasthitam avihvalamanaah svastho mukta eva mahaashayah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

सानुरागाम्, स्त्रियम्, दृष्ट्वा, मृत्युम्, वा, समुपस्थितम्, अविह्वल-मनाः, स्वस्थः, मुक्तः, एव, महाशयः

सानुरागाम् स्त्रियम् दृष्ट्वा
प्रेम और कामुक आकर्षण से भरी स्त्री को सामने देखकर
वा मृत्युम् समुपस्थितम् दृष्ट्वा
अथवा सामने साक्षात मृत्यु को उपस्थित देखकर भी
अविह्वल-मनाः
जिसका मन तनिक भी विचलित, व्याकुल या भयभीत नहीं होता
स्वस्थः महाशयः
वह अपने स्वरूप में स्थित महान पुरुष
मुक्तः एव
निश्चय ही सर्वथा मुक्त ही है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

कामुक अनुराग से भरी स्त्री को देखकर अथवा सामने मृत्यु को उपस्थित पाकर भी जिसका मन विचलित नहीं होता, वह स्वरूप-स्थित महापुरुष निश्चय ही मुक्त है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक जीवनमुक्ति की सबसे कठोर परीक्षा प्रस्तुत करता है। संसार में दो शक्तियाँ सबसे प्रबल हैं—एक कामवासना का आकर्षण जो बड़े-बड़े तपस्वियों को डिगा देता है, और दूसरा मृत्यु का भीषण भय जो शूरवीरों को भी कँपा देता है। अष्टावक्र कहते हैं कि जो पुरुष कामुकता के प्रबल आकर्षण में भी काम-वासना से विचलित नहीं होता, और साक्षात मृत्यु को सामने देखकर भी भयभीत नहीं होता, वही सच्चा ‘स्वस्थ’ और ‘महाशय’ है। वह वास्तव में मुक्त है।

सरल हिन्दी में समझें

इंसान की ज़िंदगी में दो सबसे बड़ी कमजोरियाँ होती हैं—एक कामवासना का नशा और दूसरा मौत का डर।

जब कोई बहुत आकर्षक व्यक्ति सामने आता है, तो अच्छे-अच्छे लोगों की नीयत डोल जाती है; और जब मौत सामने आती है, तो बड़े-बड़े ज्ञानी भी कांपने लगते हैं।

लेकिन अष्टावक्र कहते हैं कि असली ज्ञानी वही है जिसका मन इन दोनों चरम स्थितियों में भी बिल्कुल शांत और अडिग रहता है। वह न तो कामुकता के जाल में फंसता है और न मौत से डरकर रोता है। वह हर हाल में अपनी आत्मा में टिका रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. काम (attraction) और मृत्यु (fear) माया के दो सबसे शक्तिशाली अस्त्र हैं। 2. अविह्वल-मनाः पद उस पूर्ण मानसिक संतुलन का द्योतक है जो किसी भी प्रलोभन या त्रास से नहीं टूटता। 3. स्वस्थः का अर्थ है कि साधक का केंद्र देह में नहीं, बल्कि नित्य-शुद्ध आत्मा में स्थित है। 4. कठोपनिषद् में नचिकेता का यमराज के सामने अडिग रहना इसी महाशय स्थिति का प्रमाण है। 5. जो काम और मृत्यु पर विजय पा लेता है, उसके लिए संसार का कोई अन्य बंधन शेष नहीं रहता। 6. यह साधक को आंतरिक शुचिता और निर्भयता की पराकाष्ठा तक पहुँचने की प्रेरणा देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे गहरा समुद्र सतह पर उठने वाले भीषण तूफानों से भी नीचे शांत बना रहता है, वैसे ही ज्ञानी काम और मृत्यु के झंझावातों में भी अंदर से अचल रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब कोई व्यक्ति भारी आकर्षण या भ्रष्टाचार के प्रलोभन में भी अपनी नैतिकता नहीं खोता, और किसी गंभीर बीमारी की खबर सुनकर भी शांत रहता है; तो यह उसी अविह्वलता का आधुनिक उदाहरण है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: न प्रलोभनों से विचलित होइए और न मृत्यु से डरिए; अपने अचल आत्मस्वरूप में स्थित होकर पूर्ण निर्भय बनिए।

सामान्य गलतफहमी

यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। ‘मृत्युं समुपस्थितम् अविह्वलमनाः’ का अर्थ जानबूझकर जोखिम उठाना या स्वास्थ्य की उपेक्षा करना नहीं है; यह मृत्यु के भय से आंतरिक मुक्ति है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी किसी आकर्षण से मन डगमगाए या किसी नुकसान का डर सताए, तो रुककर गहरी सांस लें और कहें: "मैं शरीर नहीं, अचल आत्मा हूँ।" (प्रलोभन या भय के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरा मन तीव्र आकर्षण या बड़े संकट के सामने भी शांत और संतुलित रह पाता है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मृत्यु केवल शरीर का अंत है, मेरा नहीं; मैं अमर, शुद्ध और अछूता तत्त्व हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: कामुक स्त्री को देखकर या सामने मृत्यु को पाकर भी जिसका मन विचलित नहीं होता, वह स्वरूप-स्थित महापुरुष निश्चय ही मुक्त है।

English

Translation: Seeing a woman impassioned with desire, or death itself arrived face to face, he whose mind remains unperturbed and centered in the Self is truly liberated, a magnanimous one.

Simple explanation: Sensual seduction and the dread of death represent the zenith of human vulnerability. The sage whose inner poise remains unshaken by either passionate allure or mortal terror stands firmly established as a genuinely liberated being.

विषय और संबंधित श्लोक

  • अविह्वल-मन
  • काम-मृत्यु-जय
  • महाशय
  • चरम-निर्भयता
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 17.13: मुक्तः सर्वत्र नीरसः।
  • श्लोक 17.15: सुखे दुःखे नरे नार्याम्।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 251–252 (PDF पृ. 258–259)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का चौदहवाँ श्लोक।