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प्रकरण 17: सत्रहवाँ प्रकरणश्लोक १५/२०75%

अध्याय 17 · मुक्त आचरण

अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.15

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

सुखे दुःखे नरे नार्यां सम्पत्सु च विपत्सु च । विशेषो नैव धीरस्य सर्वत्र समदर्शिनः ॥ १५ ॥

IAST लिप्यंतरण

sukhe duḥkhe nare nāryāṃ sampatsu ca vipatsu ca | viśeṣo naiva dhīrasya sarvatra samadarśinaḥ || 15 ||

सरल उच्चारण: sukhe duhkhe nare naaryaam sampatsu cha vipatsu cha vishesho naiva dheerasya sarvatra samadarshinah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

सुखे, दुःखे, नरे, नार्याम्, सम्पत्सु, च, विपत्सु, च, विशेषः, न, एव, धीरस्य, सर्वत्र, सम-दर्शिनः

सर्वत्र सम-दर्शिनः धीरस्य
सब जगह समान आत्मा को देखने वाले धैर्यवान ज्ञानी के लिए
सुखे दुःखे
सुख में और दुख में
नरे नार्याम्
पुरुष में और स्त्री में
सम्पत्सु च विपत्सु च
तथा संपत्ति (अमीरी) और विपत्ति (गरीबी) में
विशेषः न एव अस्ति
तनिक भी कोई भेद या अंतर नहीं होता

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

सब जगह समभाव से देखने वाले धीर पुरुष के लिए सुख और दुख में, पुरुष और स्त्री में, तथा संपत्ति और विपत्ति में कोई अंतर नहीं होता।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक अद्वैत समदर्शिता की पराकाष्ठा है। अज्ञानी मनुष्य सुख को पकड़ना चाहता है और दुख से भागता है; वह नर और नारी में केवल शारीरिक भेद देखकर वासना या घृणा करता है; वह संपत्ति मिलने पर घमंडी और विपत्ति आने पर दीन हो जाता है। किंतु ज्ञानी ‘समदर्शी’ होता है। वह जानता है कि सुख-दुख आते-जाते रहते हैं, नर और नारी दोनों में एक ही आत्मा है, और संपत्ति-विपत्ति माया के खेल हैं। इसलिए वह हर स्थिति में एक समान अडिग रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

सच्चा समझदार इंसान हर चीज़ में एक ही परमात्मा को देखता है।

उसके लिए सुख और दुख दोनों ऐसे हैं जैसे दिन और रात—वह न सुख में पागल होता है और न दुख में टूटता है। वह किसी इंसान को सिर्फ स्त्री या पुरुष के शरीर के रूप में नहीं देखता, बल्कि दोनों के अंदर एक ही चेतना देखता है।

अमीरी आए तो उसे घमंड नहीं होता और गरीबी आए तो वह रोता नहीं। वह हर परिस्थिति में बिल्कुल एक जैसा शांत और स्थिर रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. समदर्शिता अद्वैत दर्शन का सबसे व्यावहारिक और नैतिक आचरण है। 2. नर और नारी का भेद देह के स्तर पर है, आत्मा में कोई लिंग-भेद (gender bias) नहीं होता। 3. सम्पत्ति और विपत्ति प्रारब्ध की तरंगें हैं, साक्षी की सत्ता इनमें अप्रभावित रहती है। 4. गीता के ५.१८ ‘पण्डिताः समदर्शिनः’ का यह पूर्ण वेदान्ती प्रकटीकरण है। 5. धीर वह है जिसकी प्रज्ञा सुख-दुख के धक्कों से विचलित नहीं होती। 6. यह समाज में समानता, न्याय और आंतरिक शांति की नींव रखने वाला उपदेश है।

उदाहरण से समझें: जैसे सोना चाहे अंगूठी बने या कंगन, जौहरी के लिए दोनों केवल सोना हैं; वैसे ही ज्ञानी के लिए हर रूप और परिस्थिति केवल एक चैतन्य आत्मा है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब कोई अधिकारी या शिक्षक सभी लोगों के साथ बिना किसी लिंग, जाति या अमीरी-गरीबी के भेदभाव के समान न्याय और आदर का व्यवहार करता है, तो यह उसी समदर्शिता का उदाहरण है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: परिस्थितियों और लोगों को भेदभाव के चश्मे से मत देखिए; सबके भीतर एक ही चैतन्य आत्मा को देखकर सम रहिए।

सामान्य गलतफहमी

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘नरे नार्यां विशेषो नैव’ का अर्थ सामाजिक मर्यादा या नैतिकता का उल्लंघन करना नहीं है, बल्कि आंतरिक दृष्टि में निष्कपट समभाव रखना है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज किसी भी व्यक्ति से मिलते समय उसके पद, कपड़ों या रूप के परे जाकर उसके भीतर की शांत चेतना को नमन करें। (दिनभर)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अमीरी-गरीबी या अनुकूलता-प्रतिकूलता के आधार पर लोगों और परिस्थितियों के प्रति अपना व्यवहार बदल देता हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "सुख और दुख आते-जाते हैं, संपत्ति और विपत्ति बदलती हैं; मैं सबमें समान रहने वाला शांत साक्षी हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: सर्वत्र समदर्शी ज्ञानी के लिए सुख-दुख, नर-नारी और संपत्ति-विपत्ति में तनिक भी कोई भेद नहीं होता।

English

Translation: In happiness or sorrow, toward man or woman, in prosperity or adversity, there is no difference whatsoever for the steadfast one who perceives equality everywhere.

Simple explanation: Rooted in non-dual vision, the steadfast sage (dhīra) perceives the same radiant consciousness across all polarities. Neither joy nor grief, male nor female, wealth nor destitution alters his unshakeable equanimity.

विषय और संबंधित श्लोक

  • समदर्शिता
  • धीर-पुरुष
  • सुख-दुख-समता
  • अद्वैत-दृष्टि
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 17.14: अविह्वलमनाः स्वस्थो।
  • श्लोक 17.16: न हिंसा नैव कारुण्यम्।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 252–253 (PDF पृ. 259–260)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का पंद्रहवाँ श्लोक।