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प्रकरण 17: सत्रहवाँ प्रकरणश्लोक १६/२०80%

अध्याय 17 · मुक्त आचरण

अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.16

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

न हिंसा नैव कारुण्यं नौद्धत्यं न च दीनता । नाश्चर्यं नैव च क्षोभः क्षीणसंसरणे नरे ॥ १६ ॥

IAST लिप्यंतरण

na hiṃsā naiva kāruṇyaṃ nauddhatyaṃ na ca dīnatā | nāścaryaṃ naiva ca kṣobhaḥ kṣīṇasaṃsaraṇe nare || 16 ||

सरल उच्चारण: na himsaa naiva kaarunyam nauddhatyam na cha deenataa naashcharyam naiva cha kshobhah ksheenasamsarane nare (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

न, हिंसा, न, एव, कारुण्यम्, न, औद्धत्यम्, न, च, दीनता, न, आश्चर्यम्, न, एव, च, क्षोभः, क्षीण-संसरणे, नरे

क्षीण-संसरणे नरे
जिसका संसार-भ्रमण सर्वथा समाप्त हो चुका है, उस ज्ञानी पुरुष में
न हिंसा न एव कारुण्यम्
न तो किसी के प्रति हिंसा का भाव होता है और न अहंकार-युक्त दया
न औद्धत्यम् न च दीनता
न कोई घमंडी उद्धतता होती है और न कायरता भरी दीनता
न आश्चर्यम् न एव च क्षोभः
न किसी घटना पर कोई आश्चर्य होता है और न कोई मानसिक क्षोभ

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

जिसका संसार-चक्र क्षीण हो चुका है, उस पुरुष में न हिंसा होती है न कृत्रिम दया, न घमंड होता है न दीनता, न आश्चर्य होता है न क्षोभ।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक ज्ञानी के विकारों की पूर्ण निवृत्ति को दर्शाता है। संसारी लोग या तो क्रूर होकर हिंसा करते हैं, या खुद को बड़ा मानकर दया का दिखावा करते हैं। वे सफलता में घमंडी (उद्धत) हो जाते हैं और असफलता में दीन-हीन होकर गिड़गिड़ाने लगते हैं। किसी नई चीज़ को देखकर चौंक जाते हैं (आश्चर्य) और संकट में क्षुब्ध हो जाते हैं। किंतु जिस ज्ञानी का संसार-भ्रम समाप्त हो चुका है, उसका मन इन सारे मानसिक उद्वेगों से पार होकर प्रशांत हो जाता है।

सरल हिन्दी में समझें

ज्ञानी व्यक्ति का मन किसी भी प्रकार के ड्रामे से मुक्त होता है।

वह न किसी को सताने की क्रूरता करता है और न खुद को बड़ा मानकर दूसरों पर दया जताने का घमंड करता है। वह न किसी के सामने अकड़ दिखाता है और न किसी के सामने गिड़गिड़ाता है।

दुनिया में चाहे जो घट जाए, वह न तो चौंककर हैरान होता है और न गुस्से में तिलमिलाता है। वह जानता है कि दुनिया माया का एक चलता-फिरता खेल है, इसलिए वह सदा शांत और गंभीर रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. क्षीणसंसरणे नरे पद आवागमन और मानसिक भ्रम के समूल क्षय का परिचायक है। 2. औद्धत्य (arrogance) और दीनता (servility) दोनों देहाभिमान की विकृतियां हैं। 3. आश्चर्य का अभाव इस बोध से आता है कि विश्व में आत्मा के अतिरिक्त कुछ भी नया या भिन्न नहीं है। 4. क्षोभ-मुक्ति गीता के १२.१५ ‘यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः’ की पूर्ण स्थिति है। 5. सच्ची करुणा आत्मा की एकता से निकलती है, किसी श्रेष्ठता के दंभ से नहीं। 6. यह साधक को भावनात्मक अस्थिरता से निकालकर गंभीर आत्म-शांति में प्रतिष्ठित करता है।

उदाहरण से समझें: जैसे गहरा समुद्र लहरों के थपेड़ों से न कभी उछलता है और न सूखता है, वैसे ही ज्ञानी का चित्त संसार की घटनाओं से क्षुब्ध नहीं होता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर किसी सनसनीखेज खबर या अफवाह पर तुरंत भड़कने या चौंकने के बजाय शांत रहकर सत्य को देखता है, तो यह उसी क्षोभ-मुक्ति का आधुनिक रूप है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: न किसी के सामने अकड़िए और न किसी के सामने दीन बनिए; संसार के खेल को शांत भाव से देखकर अविचल रहिए।

सामान्य गलतफहमी

यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘नैव कारुण्यं’ का अर्थ जरूरतमंदों की मदद न करना या क्रूर हो जाना नहीं है; इसका अर्थ दया के पीछे छिपे अहंकार को छोड़ना है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब कोई घटना आपको चौंकाए या परेशान करने की कोशिश करे, तो मन में कहें: "यह संसार का स्वाभाविक स्वभाव है, मुझे क्षुब्ध नहीं होना है।" (घटना के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं सफलता में घमंडी और असफलता में दीन-हीन बनकर अपनी आंतरिक गरिमा खो देता हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मेरे भीतर न कोई उद्धतता है, न कोई दीनता; मैं केवल एक शांत, गंभीर और स्थिर चेतना हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: जिसका संसार क्षीण हो चुका है, उसमें न हिंसा है न कृत्रिम दया, न घमंड है न दीनता, न आश्चर्य है न क्षोभ।

English

Translation: Neither violence nor pity, neither insolence nor servility, neither wonder nor agitation exists in that man whose wandering in worldly life has ended.

Simple explanation: For the one whose cyclic wandering has ceased, emotional reactiveness vanishes. Free from both the cruelty of aggression and the condescension of pity, neither puffed up with pride nor cringing in meekness, he rests in majestic stillness.

विषय और संबंधित श्लोक

  • क्षोभ-मुक्ति
  • औद्धत्य-दीनता-पार
  • क्षीण-संसरण
  • परम-गंभीरता
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 17.15: सर्वत्र समदर्शिनः।
  • श्लोक 17.17: न मुक्तो विषयद्वेष्टा।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 253–254 (PDF पृ. 260–261)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का सोलहवाँ श्लोक।