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अध्याय 17 · मुक्त आचरण
अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.13
सत्यापित
मूल संस्कृत
न निन्दति न च स्तौति न हृष्यति न कुप्यति । न ददाति न गृह्णाति मुक्तः सर्वत्र नीरसः ॥ १३ ॥
IAST लिप्यंतरण
na nindati na ca stauti na hṛṣyati na kupyati | na dadāti na gṛhṇāti muktaḥ sarvatra nīrasaḥ || 13 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
न, निन्दति, न, च, स्तौति, न, हृष्यति, न, कुप्यति, न, ददाति, न, गृह्णाति, मुक्तः, सर्वत्र, नीरसः
- मुक्तः सर्वत्र नीरसः
- मुक्त पुरुष सांसारिक प्रपंचों में सर्वथा अनासक्त (नीरस) रहता है
- न निन्दति
- वह न तो किसी की बुराई या निंदा करता है
- न च स्तौति
- और न किसी की चापलूसी या स्तुति करता है
- न हृष्यति न कुप्यति
- न प्रशंसा पाकर खुश होता है और न अपमान पर क्रोधित होता है
- न ददाति न गृह्णाति
- न अहंकार से कुछ देता है और न लोभ से कुछ लेता है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
वह न किसी की निंदा करता है न स्तुति; न हर्षित होता है न कुपित; न देता है न लेता है—वह मुक्त पुरुष सर्वत्र अनासक्त (नीरस) रहता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक ज्ञानी की परम समता का वर्णन करता है। संसारी मनुष्य किसी की निंदा करने में रस लेता है और अपनी स्तुति सुनकर फूला नहीं समाता। अनुकूल बात पर खुश होता है और प्रतिकूल पर आगबबूला हो जाता है। किंतु ज्ञानी के लिए ये सब मन के खेल हैं। वह न किसी की चुगली करता है, न किसी की झूठी प्रशंसा। यहाँ ‘नीरस’ का अर्थ कठोर या पत्थर दिल होना नहीं है, बल्कि संसार के विकारों और प्रपंचों में रस न लेना है।
सरल हिन्दी में समझें
हमारा ज्यादातर समय दूसरों की बुराई करने या अपनी तारीफ सुनने में बीतता है। अगर कोई हमारी थोड़ी-सी तारीफ कर दे तो हम फूल जाते हैं, और कोई बुराई कर दे तो हम रातभर सो नहीं पाते।
लेकिन ज्ञानी व्यक्ति इन बचकानी बातों से बहुत ऊपर उठ चुका होता है। वह न किसी की बुराई करता है और न चापलूसी। कोई उसकी तारीफ करे या गाली दे, वह दोनों में एक जैसा शांत रहता है।
वह दुनिया के इन फालतू ड्रामों में कोई रस नहीं लेता, इसलिए उसका मन हमेशा शांत और स्थिर रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. निंदा और स्तुति के प्रति उदासीनता मान-अपमान के द्वंद्व से मुक्ति की पहली कसौटी है। 2. हर्ष और क्रोध चित्त के वे वेग हैं जो आत्म-विस्मृति से उत्पन्न होते हैं; ज्ञानी में इनका अभाव होता है। 3. न ददाति न गृह्णाति का अर्थ कर्तृत्व और भोक्तृत्व के सूक्ष्म अहंकार का त्याग है। 4. नीरसः शब्द विषयों के प्रति आसक्ति-शून्यता (vairāgya) का द्योतक है, संवेदनहीनता का नहीं। 5. गीता के १२.१९ ‘तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी’ का यह सीधा दार्शनिक प्रकटीकरण है। 6. यह साधक को सामाजिक दबावों और दूसरों की राय के भय से मुक्त करने वाला उपदेश है।
उदाहरण से समझें: जैसे हिमालय पर्वत पर चाहे बर्फ गिरे या धूप खिले, वह अपनी जगह अचल खड़ा रहता है; वैसे ही ज्ञानी निंदा और प्रशंसा में अचल रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
आधुनिक सोशल मीडिया पर जब लोग लाइक्स और कमेंट्स के आधार पर अपनी खुशियाँ तय करते हैं, तो ज्ञानी की यह समता हमें डिजिटल दुनिया के मानसिक तनाव से बचाती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दूसरों की राय, तारीफ या बुराई के गुलाम मत बनिए; अपने भीतर की स्थिरता में टिककर हर परिस्थिति में सम रहिए।
सामान्य गलतफहमी
ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘न ददाति न गृह्णाति’ का अर्थ दान, परोपकार या सहायता करने से मुँह मोड़ना नहीं है, बल्कि देने में अहंकार और लेने में लोभ न रखना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब कोई आपकी आलोचना या तारीफ करे, तो दोनों में केवल एक गहरी सांस लें और मुस्कुराकर शांत रहें। (प्रतिक्रिया के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरी मानसिक शांति दूसरों की तारीफ या बुराई पर निर्भर करती है?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "निंदा और स्तुति केवल हवा के शब्द हैं, मेरी आत्मा इन सबसे सर्वथा अछूती है।"
एक पंक्ति में सार: वह न निंदा करता है न स्तुति, न हर्षित होता है न कुपित; वह मुक्त पुरुष सब जगह अनासक्त रहता है।
English
Translation: He neither blames nor praises, feels neither joy nor wrath, neither gives nor takes. The liberated one is utterly dispassionate everywhere.
Simple explanation: Completely unhooked from the social machinery of validation and censure, the sage neither slanders nor flatters. Standing rooted in his own reality, he neither inflates with praise nor deflates with criticism.
विषय और संबंधित श्लोक
- निंदा-स्तुति-समता
- हर्ष-क्रोध-मुक्ति
- नीरसता
- अनासक्ति
- श्लोक 17.12: ईहितानीहितैर्मुक्तो।
- श्लोक 17.14: सानुरागां स्त्रियं दृष्ट्वा।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का तेरहवाँ श्लोक।