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प्रकरण 17: सत्रहवाँ प्रकरणश्लोक १२/२०60%

अध्याय 17 · मुक्त आचरण

अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.12

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

पश्यञ्छृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गृह्णन्वदन्व्रजन् । ईहितानीहितैर्मुक्तो मुक्त एव महाशयः ॥ १२ ॥

IAST लिप्यंतरण

paśyañ śṛṇvan spṛśañ jighrann aśnan gṛhṇan vadan vrajan | īhitānīhitair mukto mukta eva mahāśayaḥ || 12 ||

सरल उच्चारण: pashyany shrinvan sprishany jighrann ashnan grihnan vadan vrajan eehitaaneehitair mukto mukta eva mahaashayah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

पश्यन्, शृण्वन्, स्पृशन्, जिघ्रन्, अश्नन्, गृह्णन्, वदन्, व्रजन्, ईहित-अनीहितैः, मुक्तः, मुक्तः, एव, महाशयः

पश्यन् शृण्वन् स्पृशन्
देखते, सुनते, स्पर्श करते
जिघ्रन् अश्नन् गृह्णन्
सूँघते, खाते, हाथ से ग्रहण करते
वदन् व्रजन्
बोलते और पैरों से चलते हुए भी
ईहित-अनीहितैः मुक्तः
जो पसंद (इच्छा) और नापसंद (अनिच्छा) के बंधनों से सर्वथा मुक्त है
सः महाशयः मुक्तः एव
वह विशाल-हृदय पुरुष वास्तव में सदा मुक्त ही है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते, लेते, बोलते और चलते हुए भी जो पसंद और नापसंद (ईहित-अनीहित) से मुक्त है, वह महाशय वास्तव में मुक्त ही है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: साधारण मनुष्य जब कोई भी काम करता है, तो उसके पीछे उसकी व्यक्तिगत पसंद (ईहित) या नफ़रत (अनीहित) का आग्रह होता है। जब काम मनमुताबिक होता है तो वह खुश होता है, और विपरीत होने पर दुखी होता है। किंतु ज्ञानी पुरुष चलना, बोलना, खाना, लेना आदि समस्त शारीरिक क्रियाएं करते हुए भी इस पसंद-नापसंद के तनाव से मुक्त रहता है। वह जीवन को बिना किसी शिकायत या पूर्वग्रह के सहज रूप से बहने देता है। ऐसा महापुरुष ही वास्तविक मुक्त है।

सरल हिन्दी में समझें

हमारा पूरा जीवन दो चीज़ों के बीच पिसता रहता है—"मुझे यह चाहिए" और "मुझे यह नहीं चाहिए।"

जब हमें अपनी पसंद की चीज़ मिलती है तो हम खुश होते हैं, और जब नापसंद चीज़ मिलती है तो हम चिढ़ जाते हैं।

लेकिन ज्ञानी व्यक्ति अपने सारे काम—चलना, बोलना, खाना, देखना—करते हुए भी इस पसंद-नापसंद के चक्कर में नहीं पड़ता। जो सामने आ गया, उसे बिना किसी नखरे के स्वीकार करता है। वह किसी बात को पकड़कर नहीं बैठता, इसलिए वह हर समय आज़ाद रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. ईहित (desired) और अनीहित (undesired) चित्त के वे द्वंद्व हैं जो राग-द्वेष को जन्म देते हैं। 2. महाशयः पद चित्त की उस अगाध गहराई का सूचक है जहाँ व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के बुलबुले विलीन हो जाते हैं। 3. कर्मों का संपादन बंधन नहीं है; कर्मों के साथ जुड़ा हुआ मानसिक हठ ही बंधन है। 4. गीता के ५.८-९ के ‘प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्’ का यह पूर्ण जीवनमुक्त स्वरूप है। 5. ज्ञानी प्रकृति के प्रवाह में एक साक्षी की तरह भाग लेता है, किसी अड़ियल कर्ता की तरह नहीं। 6. यह साधक को रोज़मर्रा के जीवन में अद्वैत दृष्टि लागू करने की व्यावहारिक विधि बताता है।

उदाहरण से समझें: जैसे हवा सुगंधित फूलों से भी गुज़रती है और कचरे से भी, लेकिन वह किसी से चिपकती नहीं; वैसे ही ज्ञानी अनुकूल और प्रतिकूल दोनों परिस्थितियों में अप्रभावित रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी यात्रा में हों और रास्ते में कभी अच्छा होटल मिले और कभी साधारण ढाबा, और आप दोनों में बिना चिढ़े आनंद लें; तो यह उसी सहजता का आधुनिक उदाहरण है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: हर चीज़ को अपनी पसंद-नापसंद के चश्मे से देखना बंद कीजिए; जो सामने आए उसे सहजता से स्वीकार करके शांत रहिए।

सामान्य गलतफहमी

ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ‘ईहितानीहितैर्मुक्तः’ का अर्थ समाज में अनुचित या गैर-कानूनी आचरण करना नहीं है, बल्कि मानसिक आग्रहों से मुक्त होकर धर्मपूर्वक जीना है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब कोई ऐसी घटना घटे जो आपकी योजना के मुताबिक न हो, तो तुरंत गुस्सा करने के बजाय कहें: "कोई बात नहीं, इसे भी सहजता से स्वीकार करते हैं।" (दिनभर)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरी शांति छोटी-छोटी पसंद-नापसंद की बातों पर निर्भर है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर मन में दोहराएँ: "मुझे न किसी से राग है, न किसी से द्वेष; मैं हर परिस्थिति में सम और शांत हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: देखते, सुनते, खाते और चलते हुए भी जो पसंद-नापसंद से मुक्त है, वह विशाल-हृदय पुरुष निश्चय ही सदा मुक्त है।

English

Translation: Seeing, hearing, touching, smelling, eating, taking, speaking, and walking—he who is free from preferences and aversions is truly liberated, a magnanimous soul.

Simple explanation: Engaged naturally in all bodily activities, the sage remains totally free from the tyranny of likes (īhita) and dislikes (anīhita). Living without rigid demands upon reality, he embodies pure freedom in action.

विषय और संबंधित श्लोक

  • ईहित-अनीहित-मुक्ति
  • दैनिक-व्यवहार
  • महाशय
  • सहज-कर्म
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 17.11: विमलाशयः।
  • श्लोक 17.13: न निन्दति न च स्तौति।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 249–250 (PDF पृ. 256–257)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का बारहवाँ श्लोक।