दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
क
- कः असौ कालः वयः किं वा
- ऐसा कौन-सा समय या अवस्था है
- कः मानवः न शाम्यति
- कौन मनुष्य शांत नहीं होता?
- कटक-अङ्गद-नूपुरम् भासते
- कंगन, बाजूबंद और नूपुर (पायल) का कोई स्वतंत्र अस्तित्व भासता है?
- कति जन्मानि
- कितने जन्मों तक
- कथम्
- कैसे
- कथम् कुत्र
- कैसे और किसमें
- कदा शान्तानि कस्य वा
- किसके, कब शांत हुए हैं?
- कदाचित् न खिद्यति हन्त
- कभी भी दुखी या उदास नहीं होता, यह परम हर्ष की बात है
- कनके कटकम्
- सोने में कंगन
- करवाणि
- करूँ
- कर्तव्य-दुःख-मार्तण्ड-ज्वाला-दग्ध-अन्तरात्मनः
- कर्तव्य के बोझ रूपी सूर्य की प्रचंड लपटों से जिसका अंतःकरण झुलस रहा है
- कर्तव्यता एव संसारः
- ‘मुझे यह करना है’ का यह कर्तव्य-भाव ही वास्तव में संसार (बंधन) है
- कर्ता
- करने वाला
- कर्तुम् अवसरम् न आप्नोति
- कुछ करने का अवसर (अहंकार) नहीं पाता
- कर्म-नैष्कर्म्य-निर्बन्ध-भावाः
- कर्म करने अथवा कर्म छोड़ने के हठ और नियमों में बँधे रहते हैं
- कर्मणि क्रियमाणे अपि
- कर्म किए जाने पर भी
- कल्पनामात्रम्
- केवल कल्पना
- कल्पितः
- कल्पित
- कल्पितम्
- कल्पित, आरोपित
- कल्पितम् पश्यन् निश्चित्य
- संसार को केवल कल्पित निश्चयपूर्वक देखता हुआ
- कश्चित् उभय-अभावकः
- किंतु कोई विरला ज्ञानी इन दोनों (भाव और अभाव) की कल्पना से परे है
- कश्चित् जानाति
- कोई एक जानता है
- कश्चित् भावस्य भावकः
- कोई साधक भाव (संसार या ईश्वर के सगुण रूप) का ध्यान करता है
- कस्य अपि उदार-चित्तस्य
- किसी विरले विशाल-हृदय ज्ञानी महापुरुष के लिए
- कस्य कथम् कुत्र
- किसका, कैसे और कहाँ
- का अपि वासना न
- तनिक भी कोई वासना या कामना उत्पन्न नहीं होती
- का बुभुत्सा तथापि ते
- तब भी तुझे जानने की इच्छा कैसी?
- काम-चारः
- अपनी इच्छा और सहज प्रेरणा से विचरण करने वाला
- कामम् आकाङ्क्षेत्
- कामना की इच्छा करे
- कामवशगः
- काम (कामना) के वश में
- काम् अपि दशाम् सम्प्राप्तः भवेत्
- किसी अनिर्वचनीय, अलौकिक परम दशा को प्राप्त हो जाता है
- कायकृत्यासहः
- मैं शारीरिक कर्मों की व्यर्थ भागदौड़ को सहने में असमर्थ (उदासीन) हुआ
- कायेन मनसा गिरा
- शरीर, मन और वाणी से
- कालम् अन्तम् अनुश्रितः
- मृत्यु के निकट पहुँचा हुआ
- काले
- समय आने पर
- किञ्चन न
- कुछ भी नहीं है
- किञ्चित् कृतम् अकृतम् न
- कर्म किए जाने पर भी वास्तव में कुछ भी नहीं किया गया होता
- किञ्चित् कृत्यम् न पश्यति
- वह अपने लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं देखता
- किञ्चित् न अस्ति इति निश्चयी
- वास्तव में कुछ भी नहीं है—इस प्रकार का दृढ़ निश्चय रखने वाला
- किन्तु इदम् निर्निमित्तम्
- किंतु उसका चित्त बिना किसी निमित्त (कामना) के
- किम् अपि कृतम् न एव स्यात्
- शुद्ध आत्मा द्वारा कुछ भी किया नहीं जाता (आत्मा अकर्ता है)
- किम् कृत्यम् अवशिष्यते
- करने योग्य कौन सा कर्तव्य शेष रह जाता है?
- किम् त्यक्तुम् इच्छसि
- किसको छोड़ना चाहता है
- किम् ब्रूते
- क्या बोले?
- किम् मे कार्यम्
- मेरा क्या कार्य है
- किम् स्वर्णात् पृथक्
- क्या सोने से अलग होकर
- कुतः अहङ्कारः एव च
- और अहंकार भी कहाँ से हो सकता है?
- कुतः कर्म
- कहाँ का कर्म?
- कुतः जन्म
- कहाँ का जन्म?
- कुतः सुखम्
- सुख कहाँ से मिल सकता है?
- कुत्रचित् नाशः वा अपि न
- और न किसी वस्तु के नष्ट होने पर कोई हानि या अभाव प्रतीत होता है
- कुत्रापि कायस्य खेदः
- कहीं हठ-तपस्या से शरीर को कष्ट होता है
- कुत्रापि जिहासा न अस्ति
- कहीं भी किसी वस्तु को छोड़ने (त्यागने) की इच्छा नहीं होती
- कुत्रापि जिह्वा खिद्यते
- कहीं लगातार जप और पाठ से वाणी थकती है
- कुत्रापि मनः (खिद्यते)
- कहीं बलपूर्वक एकाग्रता साधने से मन थकता है
- कुबुद्धयः भावयन्ति
- अल्पबुद्धि लोग मन में केवल कल्पना (चिंतन) करते रहते हैं
- कुर्वन् अपि
- कर्तव्य कर्म करता हुआ भी
- कुर्वन् अपि न करोति
- वह कर्म करता हुआ भी वास्तव में कुछ नहीं करता
- वह बाहर से सब काम करते हुए भी वास्तव में कुछ नहीं करता
- कूटस्थम्
- कूटस्थ, अचल और निर्विकार
- कृत-कर्तव्य-निर्वृतः
- समस्त कर्तव्य पूरे हो जाने के कारण पूर्णतः शांत और निवृत्त है
- कृत-चाटवः सेवन्ते
- चापलूसी करते हुए सेवक की तरह उसकी सेवा करने लगते हैं
- कृतकृत्यः
- कृतार्थ और परिपूर्ण होकर
- कृतम् अकृतम् न स्मरति
- और ‘मैंने क्या किया’ और ‘क्या नहीं किया’—इसकी कोई चिंता या स्मृति नहीं रखता
- कृताकृते
- किया हुआ और न किया हुआ (कर्तव्य-अकर्तव्य का आग्रह)
- कृतार्थः
- कृतकृत्य और मुक्त हो जाता है
- कृत्रिमा शान्तिः न
- बनावटी (दिखावटी) शांति कभी शोभा नहीं पाती
- कृत्वा
- करके, पाकर
- केलिशिक्षया
- क्रीड़ा के अभ्यास से
- केवलम् आत्मानम् पश्यन्
- केवल आत्मा को देखता हुआ
- केवलम् दुःख-भाक्
- वह तो केवल दुख और भ्रम का ही भागीदार है
- कैवल्यम् इव संस्थितः
- कैवल्य (अद्वितीय आत्म-स्वरूप) में भली-भाँति प्रतिष्ठित होकर
- कैवल्यम् इव सम्प्राप्तः
- वह मानो मोक्ष (कैवल्य) को प्राप्त होकर
- कोऽपि अमूढः मूढवत्
- जबकि कोई विरला तत्त्वज्ञानी बाह्य रूप से बालवत् या मूढ़ के समान शांत रहता है
- कौपीनत्वे अपि
- केवल लंगोटी मात्र धारण करने वाले विरक्त में भी
- क्लृप्ता
- रची हुई, आरोपित
- क्व च वा हानिः
- और कहाँ कोई हानि या नुकसान है?
- क्व च विज्ञानम्
- और कहाँ विशेष बौद्धिक ज्ञान
- क्व देहः
- और यह देह कहाँ?
- क्व धनानि
- तब मेरे लिए कहाँ धन-दौलत
- क्व मित्राणि
- कहाँ मित्र और सांसारिक सम्बन्धी
- क्व मे विषय-दस्यवः
- कहाँ मुझे लूटने वाले विषय-भोग रूपी डाकू
- क्व रागः क्व विरागता
- उसके लिए कहाँ राग और कहाँ वैराग्य? दोनों समाप्त हो जाते हैं
- क्व विधीयते
- विधि-नियम (क्या करना चाहिए) कहाँ है?
- क्व वृद्धिः
- कहाँ कोई वृद्धि या लाभ है
- क्व शास्त्रम्
- कहाँ शास्त्रों के विधि-विधान
- क्वापि न सज्जते
- कहीं भी आसक्त या उलझा हुआ नहीं होता
- क्वापि न हर्षः
- कहीं भी (अनुकूलता में) न हर्ष होता है
- क्वापि पर-दशा वर्तते
- कोई एक अनिर्वचनीय, अलौकिक परम दशा होती है!
- क्षमा
- क्षमा, सहनशीलता
- क्षमेत् कः
- कौन समर्थ है
- क्षीण-संसरणे नरे
- जिसका संसार-भ्रमण सर्वथा समाप्त हो चुका है, उस ज्ञानी पुरुष में
- क्षीण-संसार-सागरे
- जिसके लिए संसार रूपी सागर सर्वथा सूख चुका है, उस ज्ञानी की
- क्षीण-संस्मरणः (भवति)
- वैसे ही उस विचार के संस्कार को संजोए बिना तुरंत विस्मृत करने वाला होता है
- क्षीणाः भवन्ति एव
- स्वतः पूरी तरह नष्ट और शांत हो जाती हैं
- क्षुद्रचित्तताम्
- क्षुद्रता, संकीर्ण चित्त की स्थिति
- क्षुभ्येत्
- क्षुब्ध हो