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प्रकरण 17: सत्रहवाँ प्रकरणश्लोक ६/२०30%

अध्याय 17 · मुक्त आचरण

अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.6

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

धर्मार्थकाममोक्षेषु जीविते मरणे तथा । कस्याप्युदारचित्तस्य हेयोपादेयता न हि ॥ ६ ॥

IAST लिप्यंतरण

dharmārthakāmamokṣeṣu jīvite maraṇe tathā | kasyāpy udāracittasya heyopādeyatā na hi || 6 ||

सरल उच्चारण: dharmaarthakaamamoksheshu jeevite marane tathaa kasyaapy udaarachittasya heyopaadeyataa na hi (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

धर्म-अर्थ-काम-मोक्षेषु, जीविते, मरणे, तथा, कस्य, अपि, उदार-चित्तस्य, हेय-उपादेयता, न, हि

कस्य अपि उदार-चित्तस्य
किसी विरले विशाल-हृदय ज्ञानी महापुरुष के लिए
धर्म-अर्थ-काम-मोक्षेषु
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों में
तथा जीविते मरणे
और जीने अथवा मरने में भी
हेय-उपादेयता न हि
त्यागने (हेय) या पकड़ने (उपादेय) की कोई भावना नहीं होती

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

किसी विरले उदारचित्त ज्ञानी के लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में, तथा जीने और मरने में भी त्यागने या ग्रहण करने की कोई बुद्धि नहीं होती।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: उदारचित्त ज्ञानी का दृष्टिकोण इतना व्यापक हो जाता है कि उसके लिए चारों पुरुषार्थ और जीवन-मृत्यु सब एक समान हो जाते हैं। जो देह को अपना आपा मानता है, वह जीने से प्यार करता है और मरने से कांपता है। किंतु ज्ञानी जानता है कि आत्मा का न जन्म होता है और न मृत्यु; इसलिए न उसे जीने का कोई लोभ है और न मरने का कोई भय। वह समस्त हेय-उपादेय के विकल्पों से छूटकर सहज भाव में रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

हमारा मन हमेशा इस बात से डरता है कि कहीं मौत न आ जाए, और हमेशा इस कोशिश में रहता है कि ज़िंदगी लंबी चले।

लेकिन जो व्यक्ति अपनी अमर आत्मा को जान लेता है, उसके लिए जीना और मरना सिर्फ कपड़े बदलने जैसा हो जाता है। वह जीने के लिए कोई बेचैनी नहीं दिखाता और मौत आने पर घबराता नहीं है।

यहाँ तक कि धर्म, पैसा, सुख और मोक्ष—इन चारों चीज़ों को भी वह किसी लालच या डर से नहीं देखता। वह इतना शांत और विशाल हो जाता है कि हर परिस्थिति को बिना किसी शिकायत के स्वीकार करता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. उदारचित्तस्य पद संकीर्ण अहं-सीमाओं के पूर्ण विलय का सूचक है। 2. जीवन और मरण का समत्व ही अमरत्व की सच्ची अपरोक्ष अनुभूति है। 3. हेयोपादेयता का अभाव साधक को समस्त मानसिक निर्णयों के द्वंद्व से मुक्त करता है। 4. गीता के २.११ ‘गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः’ का यह वेदान्ती उत्कर्ष है। 5. मृत्यु का भय देहाध्यास से उत्पन्न होता है; आत्म-निष्ठा में भय का कोई स्थान नहीं। 6. यह साधक को भय-मुक्त और स्वतंत्र जीवन जीने का अंतिम संबल प्रदान करता है।

उदाहरण से समझें: जैसे आकाश में दिन का उजाला आए या रात का अंधेरा, आकाश न दिन को पकड़ता है न रात से डरता है; वैसे ही ज्ञानी जीवन और मृत्यु दोनों में अप्रभावित रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब कोई व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी या वृद्धावस्था के सामने भी बिना घबराए शांत और गरिमापूर्ण रहता है, तो यह उसी समभाव का उदाहरण है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: जीने का लोभ और मरने का भय दोनों को छोड़ दीजिए; आप वह अमर चेतना हैं जो इन दोनों से परे है।

सामान्य गलतफहमी

ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘जीविते मरणे हेयोपादेयता न’ का अर्थ आत्महत्या करना या जीवन की सुरक्षा की उपेक्षा करना नहीं है; यदि निराशा के विचार आएँ तो सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी भविष्य या मृत्यु को लेकर कोई अनजाना डर मन में आए, तो कहें: "मेरा शरीर नश्वर है, किंतु मेरी आत्मा अजर-अमर है।" (लगभग 2 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं मौत के डर से इतना घिरा हूँ कि आज खुलकर और शांति से जी भी नहीं पा रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट आँखें मूँदकर विचार करें: "मैं जन्म से पहले भी था, शरीर छूटने के बाद भी रहूँगा; मैं नित्य अमर आत्मा हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: उदारचित्त ज्ञानी के लिए धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और जीवन-मरण में त्यागने या पकड़ने का कोई भेद नहीं होता।

English

Translation: For that rare magnanimous one, there is neither acceptance nor rejection toward righteousness, wealth, pleasure, or liberation, nor toward life or death.

Simple explanation: Having realized that consciousness transcends mortality, the magnanimous sage rises above the instinctual terror of death and the desperate clinging to life, remaining utterly untouched by the four classic aims of human endeavor.

विषय और संबंधित श्लोक

  • उदारचित्त
  • जीवन-मरण-समता
  • हेयोपादेयता-पार
  • अमरत्व
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 17.5: भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी।
  • श्लोक 17.7: वाञ्छा न विश्वविलये।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 243–244 (PDF पृ. 250–251)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का छठा श्लोक।