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प्रकरण 17: सत्रहवाँ प्रकरणश्लोक ७/२०35%

अध्याय 17 · मुक्त आचरण

अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.7

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

वाञ्छा न विश्वविलये न द्वेषस्तस्य च स्थितौ । यथाजीविकया तस्माद् धन्य आस्ते यथासुखम् ॥ ७ ॥

IAST लिप्यंतरण

vāñchā na viśvavilaye na dveṣas tasya ca sthitau | yathājīvikayā tasmād dhanya āste yathāsukham || 7 ||

सरल उच्चारण: vaanychhaa na vishvavilaye na dveshas tasya cha sthitau yathaajeevikayaa tasmaad dhanya aaste yathaasukham (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

वाञ्छा, न, विश्व-विलये, न, द्वेषः, तस्य, च, स्थितौ, यथा-जीविकया, तस्मात्, धन्यः, आस्ते, यथा-सुखम्

तस्य
उस ज्ञानी महापुरुष को
विश्व-विलये वाञ्छा न
न तो इस संसार के नष्ट (प्रलय) होने की कोई चाह होती है
च स्थितौ द्वेषः न
और न संसार के बने रहने से कोई चिढ़ या द्वेष होता है
तस्मात्
इसलिए वह
यथा-जीविकया
प्रारब्धानुसार जो भी आजीविका सहज मिल जाए उससे
धन्यः यथा-सुखम् आस्ते
वह धन्य पुरुष परम आनंद और सुख से रहता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

उसकी न तो संसार के प्रलय की कोई इच्छा होती है और न उसके बने रहने से द्वेष; इसलिए जो आजीविका सहज मिल जाए, उससे वह धन्य पुरुष सुखपूर्वक रहता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: संसारी लोग दुनिया की स्थिति से परेशान होकर कभी-कभी कहने लगते हैं कि "काश यह दुनिया ही मिट जाए!" और कभी उसमें आसक्त होकर चाहते हैं कि यह हमेशा बनी रहे। किंतु ज्ञानी पुरुष को संसार के होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। वह जानता है कि जगत एक स्वप्न के समान है। इसलिए वह दुनिया को बदलने या मिटाने का कोई हठ नहीं पालता। प्रारब्ध से जो भोजन, वस्त्र या साधन सहजता से मिल जाए, उसी में वह परम संतुष्ट रहकर आनंद से जीता है।

सरल हिन्दी में समझें

ज्ञानी व्यक्ति दुनिया से कोई शिकायत नहीं करता।

वह न तो यह प्रार्थना करता है कि "हे भगवान, यह दुनिया नष्ट हो जाए ताकि सारे दुख खत्म हों", और न वह यह चाहता है कि दुनिया हमेशा ऐसे ही चलती रहे। वह समझता है कि दुनिया जैसे चल रही है, चलने दो।

उसे अपनी रोज़ी-रोटी के लिए जो भी सादा भोजन या साधन मिल जाता है, वह उसी में खुश रहता है। वह किसी से कोई बड़ी उम्मीद नहीं रखता, इसलिए वह हर समय सुकून से रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. विश्व-विलय की वांछा निराशावाद (pessimism) का लक्षण है, जबकि ज्ञानी पूर्णतः शांत है। 2. यथाजीविकया पद प्रारब्ध-समर्पण और न्यूनतम आवश्यकताओं में संतोष का प्रतीक है। 3. जगत की स्थिति या लय आत्मा की शांति में कोई वृद्धि या कमी नहीं करती। 4. धन्यः आस्ते यथासुखम् स्पष्ट करता है कि सुख किसी विशेष बाहरी व्यवस्था पर निर्भर नहीं है। 5. यह साधक को संसार से लड़ने या भागने के बजाय उसके प्रति समभाव रखने का मार्ग दिखाता है। 6. सहज जीवन ही अद्वैत ज्ञान की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है।

उदाहरण से समझें: जैसे सिनेमा हॉल में फिल्म चल रही हो तो भी दर्शक शांत रहता है और फिल्म बंद हो जाए तो भी कोई नुकसान नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी संसार के रहने या मिटने में सम रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

आधुनिक समय में जब कोई व्यक्ति देश-दुनिया की नकारात्मक खबरों से दिनभर परेशान होने के बजाय अपने काम पर ध्यान देता है और जो उपलब्ध है उसमें खुश रहता है, तो यह उसी समभाव का उदाहरण है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दुनिया को बदलने या कोसने में अपनी ऊर्जा मत गंवाइए; जो सहज उपलब्ध है उसमें संतुष्ट रहकर आनंद से जिएँ।

सामान्य गलतफहमी

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ‘यथाजीविकया’ का अर्थ आलसी बनकर दूसरों पर बोझ बन जाना नहीं है, बल्कि ईमानदारी से जो आजीविका मिले उसमें संतोष रखना है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज दोपहर के भोजन में जो भी रूखा-सूखा या सामान्य भोजन मिले, उसे बिना किसी शिकायत के धन्यवाद भाव से ग्रहण करें। (भोजन के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं दुनिया की परिस्थितियों को दोष देकर अपनी आंतरिक अशांति का बहाना बना रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर कहें: "दुनिया जैसी है वैसी रहने दो, मेरी आत्मा का आनंद इस पर निर्भर नहीं है।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: न संसार के मिटने की चाह और न रहने से द्वेष; जो आजीविका सहज मिल जाए उसमें धन्य पुरुष सुख से रहता है।

English

Translation: He desires neither the dissolution of the universe nor feels aversion toward its continuance. Hence, content with whatever livelihood comes unsought, that blessed one abides happily.

Simple explanation: Free from metaphysical anxiety, the sage neither wishes for the apocalypse to end pain nor clings possessively to worldly existence. Flowing smoothly with whatever life naturally provides, he rests in unassailable peace.

विषय और संबंधित श्लोक

  • संसार-समता
  • यथाजीविका
  • धन्य-पुरुष
  • सहज-संतोष
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 17.6: हेयोपादेयता न हि।
  • श्लोक 17.8: कृतार्थोऽनेन ज्ञानेन।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 244–245 (PDF पृ. 251–252)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का सातवाँ श्लोक।