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प्रकरण 17: सत्रहवाँ प्रकरणश्लोक ८/२०40%

अध्याय 17 · मुक्त आचरण

अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.8

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

कृतार्थोऽनेन ज्ञानेनेत्येवं गलितधीः कृती । पश्यञ्छृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम् ॥ ८ ॥

IAST लिप्यंतरण

kṛtārtho'nena jñānenety evaṃ galitadhīḥ kṛtī | paśyañ śṛṇvan spṛśañ jighrann aśnann āste yathāsukham || 8 ||

सरल उच्चारण: kritaarthonena jnyaanenety evam galitadheeh kritee pashyany shrinvan sprishany jighrann ashnann aaste yathaasukham (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

कृतार्थः, अनेन, ज्ञानेन, इति, एवम्, गलित-धीः, कृती, पश्यन्, शृण्वन्, स्पृशन्, जिघ्रन्, अश्नन्, आस्ते, यथा-सुखम्

अनेन ज्ञानेन कृतार्थः
इस आत्मज्ञान से वह पूर्ण कृतकृत्य हो चुका है
इति एवम् गलित-धीः कृती
इस प्रकार जिसकी संशयग्रस्त बुद्धि विगलित (शांत) हो चुकी है, वह सिद्ध पुरुष
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन्
देखते, सुनते, स्पर्श करते
जिघ्रन् अश्नन्
सूँघते और खाते हुए भी
यथा-सुखम् आस्ते
सदा आनंदपूर्वक सहज स्थिति में रहता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

‘मैं इस ज्ञान से कृतार्थ हो गया हूँ’—इस प्रकार जिसकी बुद्धि विगलित हो गई है, वह ज्ञानी देखते, सुनते, छूते, सूँघते और खाते हुए भी सुखपूर्वक रहता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: जब साधक को यह पक्का विश्वास हो जाता है कि आत्मा अकर्ता और नित्य-मुक्त है, तब उसकी तर्क-वितर्क और संशय करने वाली बुद्धि शांत (गलितधीः) हो जाती है। इसके बाद वह आँख से सुंदर दृश्य देखता है, कान से शब्द सुनता है, भोजन का स्वाद लेता है, किंतु उसका मन इनमें से किसी में भी नहीं अटकता। वह समझता है कि इंद्रियाँ अपने विषयों में बरत रही हैं, मैं तो केवल साक्षी हूँ। इसलिए वह सांसारिक व्यवहार के बीच भी अखंड सुखी रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

जब किसी को यह समझ आ जाता है कि उसकी आत्मा पहले से ही बिल्कुल आजाद और शांत है, तो उसके दिमाग के सारे सवाल और संशय खत्म हो जाते हैं।

इसके बाद वह एक सामान्य इंसान की तरह ही जीता है—वह खाना खाता है, लोगों से मिलता है, बातें सुनता है और देखता है। लेकिन फर्क यह होता है कि उसके अंदर कोई तनाव या चिंता नहीं होती।

वह किसी चीज़ को पकड़कर नहीं बैठता। इंद्रियाँ अपना काम करती रहती हैं और वह अंदर से बिल्कुल हल्का और खुश रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. गलितधीः पद बुद्धि के अहंकारी विमर्श और संशय के पूर्ण उपशम का द्योतक है। 2. कृती वह है जिसने जीवन का परम कर्तव्य पूरा कर लिया है (कृतकृत्य)। 3. इंद्रिय-व्यापार (देखना, सुनना आदि) आत्मज्ञान के विरोधी नहीं हैं यदि उनके प्रति साक्षी-भाव हो। 4. गीता के ५.८-९ ‘पश्यञ्शृण्वन्स्पृशन्... इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्’ का यह पूर्ण वेदान्ती स्वरूप है। 5. सच्चा ज्ञानी जड़ पत्थर नहीं बनता, वह चैतन्य होकर जीवन के समस्त अनुभवों को समभाव से ग्रहण करता है। 6. यह अद्वैत साधना के सहज और स्वाभाविक परिणाम को सिद्ध करता है।

उदाहरण से समझें: जैसे बिजली का पंखा स्विच ऑफ होने के बाद भी पुराने वेग से कुछ देर घूमता है लेकिन उसमें कोई नई बिजली नहीं होती, वैसे ही ज्ञानी का शरीर प्रारब्ध से व्यवहार करता है पर उसमें कर्तापन नहीं होता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप कोई कठिन परीक्षा पास कर लेते हैं और उसका रिजल्ट आ जाता है, तो उसके बाद आप बिना किसी तनाव के आराम से खाते-पीते और घूमते हैं; ज्ञानी की स्थिति भी इसी कृतार्थ भाव की होती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपने स्वरूप को पहचानकर मन के सारे संशय शांत कर दीजिए; फिर जीवन के सारे काम करते हुए भी आप सदा सुखी रहेंगे।

सामान्य गलतफहमी

सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘पश्यन् शृण्वन् आस्ते यथासुखं’ का अर्थ अनैतिक कार्यों में लिप्त होना नहीं है, बल्कि इंद्रिय-संयम के साथ सहज भाव से जीना है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज चाय या पानी पीते समय पूरा ध्यान स्वाद पर रखें और महसूस करें: "जीभ स्वाद ले रही है, मैं इसे जानने वाली साक्षी आत्मा हूँ।" (चाय के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं रोजमर्रा के कामों को करते हुए भी अपनी आंतरिक शांति को बनाए रख पाता हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अपनी पाँचों इंद्रियों के अनुभवों को देखें, बिना किसी विचार को पकड़े। केवल साक्षी रहें।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: आत्मज्ञान से जिसकी बुद्धि शांत हो चुकी है, वह देखते, सुनते, छूते और खाते हुए भी सदा सुखपूर्वक रहता है।

English

Translation: Realizing "I am fulfilled through this knowledge," with his intellect dissolved, the accomplished sage abides happily, seeing, hearing, touching, smelling, and eating.

Simple explanation: When all conceptual wrestling ceases in direct realization, the sage lives effortlessly. Sensory perceptions continue unimpeded, yet because the doer-ego is dissolved, not a single trace of binding karma is incurred.

विषय और संबंधित श्लोक

  • गलितधी
  • कृतार्थता
  • इंद्रिय-साक्षी
  • सहज-सुख
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 17.7: धन्य आस्ते यथासुखम्।
  • श्लोक 17.9: शून्या दृष्टिर्वृथा चेष्टा।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 245–246 (PDF पृ. 252–253)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का आठवाँ श्लोक।