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अध्याय 17 · मुक्त आचरण
अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.5
सत्यापित
मूल संस्कृत
बुभुक्षुरिह संसारे मुमुक्षुरपि दृश्यते । भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी विरलो हि महाशयः ॥ ५ ॥
IAST लिप्यंतरण
bubhukṣur iha saṃsāre mumukṣur api dṛśyate | bhogamokṣanirākāṅkṣī viralo hi mahāśayaḥ || 5 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
बुभुक्षुः, इह, संसारे, मुमुक्षुः, अपि, दृश्यते, भोग-मोक्ष-निराकाङ्क्षी, विरलः, हि, महाशयः
- इह संसारे
- इस संसार में
- बुभुक्षुः दृश्यते
- सांसारिक सुखों को भोगने की इच्छा रखने वाले (बुभुक्षु) दिखाई देते हैं
- मुमुक्षुः अपि दृश्यते
- और मोक्ष की चाह रखने वाले (मुमुक्षु) भी मिल जाते हैं
- भोग-मोक्ष-निराकाङ्क्षी
- किंतु भोग और मोक्ष दोनों की आकांक्षा से रहित
- महाशयः हि विरलः
- विशाल-हृदय महापुरुष वास्तव में कोई विरला ही होता है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
इस संसार में भोग चाहने वाले मिलते हैं और मोक्ष चाहने वाले भी; किंतु भोग और मोक्ष दोनों की आकांक्षा से रहित महापुरुष कोई विरला ही होता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह अष्टावक्र गीता का अत्यंत क्रांतिकारी श्लोक है। संसार में अधिकांश लोग ‘बुभुक्षु’ हैं, जो धन, मान और विषय-भोगों के पीछे भागते हैं। कुछ लोग संसार के दुखों से घबराकर ‘मुमुक्षु’ बन जाते हैं, जो मोक्ष पाने के लिए जप-तप करते हैं। किंतु अष्टावक्र कहते हैं कि मुमुक्षु भी अभी तक चाहत के दायरे में है; वह खुद को बंधा हुआ मानकर मुक्ति की भीख माँग रहा है। सच्चा ज्ञानी वह ‘महाशय’ है जो जानता है कि वह पहले से ही नित्य-मुक्त है; इसलिए उसे न भोग की लालसा है और न मोक्ष की चिंता। ऐसा महापुरुष अत्यंत दुर्लभ है।
सरल हिन्दी में समझें
दुनिया में ज्यादातर लोग किसी न किसी चीज़ की चाहत में जी रहे हैं।
कोई गाड़ी, बंगला और शोहरत पाना चाहता है (भोगी), तो कोई सब कुछ छोड़कर मोक्ष और स्वर्ग पाना चाहता है (मोक्षार्थी)। दोनों ही कुछ न कुछ पाने की दौड़ में लगे हैं।
लेकिन अष्टावक्र कहते हैं कि असली स्वतंत्र व्यक्ति वह है जिसे न तो दुनिया के भोगों का लालच है और न मोक्ष पाने की हड़बड़ी। वह जानता है कि वह पहले से ही पूरी तरह आज़ाद और शांत है। जिसे कुछ भी नहीं पाना, वही सबसे बड़ा सम्राट है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. भोग और मोक्ष दोनों की इच्छा अंततः मन के संकल्प और अभाव-बोध पर आधारित है। 2. मुमुक्षुत्व साधना की आरंभिक अवस्था है, किंतु ज्ञानी की अवस्था साध्य-सिद्धि की है। 3. महाशयः पद चित्त की उस असीम विशालता को दर्शाता है जहाँ कोई परिमित लक्ष्य नहीं रहता। 4. माण्डूक्य कारिका के २.३२ ‘न मुमुक्षुर्न वै मुक्तः’ का यह सीधा दार्शनिक भाव है। 5. जब तक मोक्ष एक उपलब्धि है, तब तक साधक कर्ता बना रहता है। 6. यह साधक को आध्यात्मिक दौड़ से भी मुक्त करके सहज विश्रांति प्रदान करता है।
उदाहरण से समझें: जैसे नींद में कोई कंगाल होने का सपना देखकर अमीर बनने की कोशिश करे, लेकिन जागने पर उसे न गरीबी बचती है न अमीरी की चाह; वैसे ही जागने पर मोक्ष की भी चाह मिट जाती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
आधुनिक समाज में लोग कभी करियर के लक्ष्यों के पीछे भागते हैं और कभी मेडिटेशन के लक्ष्यों के पीछे; इन दोनों प्रकार के मानसिक तनावों से मुक्त होकर वर्तमान में जीना ही विरलता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मोक्ष को भी कोई नई मंजिल मत बनाइए; आप पहले से ही मुक्त हैं, इस सच्चाई को पहचानकर शांत हो जाइए।
सामान्य गलतफहमी
तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। ‘भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी’ का अर्थ आध्यात्मिक साधना का उपहास उड़ाना नहीं है, बल्कि अहंकार-शून्य होकर अपनी स्वाभाविक मुक्ति में टिकना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब भी मन में यह चिंता आए कि "मुझे आत्मज्ञान कब मिलेगा?", तो मुस्कुराकर कहें: "मेरी आत्मा अभी इसी क्षण मुक्त है।" (दिनभर)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैंने मोक्ष को भी सांसारिक उपलब्धियों की तरह एक नया तनाव और लक्ष्य बना लिया है?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मुझे कुछ नहीं पाना है, मैं न बंधा हूँ न मुक्त होने की आवश्यकता है; मैं केवल शुद्ध चैतन्य हूँ।"
एक पंक्ति में सार: संसार में भोगी और मुमुक्षु दोनों मिलते हैं; किंतु भोग और मोक्ष दोनों की चाहत से रहित महापुरुष कोई विरला ही होता है।
English
Translation: In this world one finds those who crave pleasure, and also those who yearn for liberation. But the truly magnanimous soul who desires neither pleasure nor liberation is exceedingly rare.
Simple explanation: Both the worldly seeker of pleasure and the earnest seeker of liberation remain driven by lack. The rare magnanimous sage (mahāśaya) realizes that the Self is ever-free and complete, transcending the very desire for enlightenment.
विषय और संबंधित श्लोक
- बुभुक्षु-मुमुक्षु-पार
- महाशय
- भोगमोक्षनिराकांक्षी
- नित्य-मुक्ति
- श्लोक 17.4: तादृशो भवदुर्लभः।
- श्लोक 17.6: धर्मार्थकाममोक्षेषु।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का पाँचवाँ श्लोक।