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अध्याय 17 · मुक्त आचरण
अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.4
सत्यापित
मूल संस्कृत
यस्तु भोगेषु भुक्तेषु न भवत्यधिवासितः । अभुक्तेषु निराकाङ्क्षी तादृशो भवदुर्लभः ॥ ४ ॥
IAST लिप्यंतरण
yas tu bhogeṣu bhukteṣu na bhavaty adhivāsitaḥ | abhukteṣu nirākāṅkṣī tādṛśo bhavadurlabhaḥ || 4 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
यः, तु, भोगेषु, भुक्तेषु, न, भवति, अधिवासितः, अभुक्तेषु, निराकाङ्क्षी, तादृशः, भव-दुर्लभः
- यः तु
- जो पुरुष
- भोगेषु भुक्तेषु
- प्रारब्धवश सामने आए भोगों को भोग लेने पर भी
- अधिवासितः न भवति
- उनसे संस्कारित (आसक्त या लिप्त) नहीं होता
- अभुक्तेषु निराकाङ्क्षी
- और जो भोग न मिले हों उनके प्रति पूर्ण आकांक्षारहित रहता है
- तादृशः भव-दुर्लभः
- वैसा महात्मा इस संसार में अत्यंत दुर्लभ है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जो सामने आए भोगों को भोगते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता, और जो न मिले हों उनकी चाह नहीं रखता, वैसा पुरुष इस संसार में अत्यंत दुर्लभ है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक जीवनमुक्ति के अत्यंत व्यावहारिक संतुलन को दर्शाता है। साधारण मनुष्य की यह दशा होती है कि जब वह किसी सुख को भोगता है, तो मन में उसकी वासना (संस्कार) छप जाती है और वह उसे दोबारा पाना चाहता है; और जो नहीं मिलता, उसके लिए रात-दिन तड़पता है। किंतु ज्ञानी की स्थिति यह है कि प्रारब्ध से जो भोजन, वस्त्र या परिस्थिति सामने आ गई, उसे उसने बिना आसक्ति के स्वीकार कर लिया, और जो नहीं मिली उसकी कोई याद नहीं रखी। ऐसा निष्काम पुरुष संसार में दुर्लभ है।
सरल हिन्दी में समझें
संसार में दो तरह के लोग होते हैं—एक वे जो किसी अच्छी चीज़ को पाते ही उसके आदी हो जाते हैं, और दूसरे वे जो न मिलने पर उदास रहते हैं।
लेकिन सच्चा ज्ञानी इन दोनों से अलग होता है। अगर उसके सामने कोई अच्छी सुविधा या भोजन आ जाए, तो वह उसे सहजता से स्वीकार कर लेता है लेकिन उसका गुलाम नहीं बनता। और अगर कुछ न मिले, तो उसे कोई मलाल नहीं होता।
वह हर हाल में मस्त रहता है। ऐसा व्यक्ति जो सुख पाकर घमंड में न आए और सुख छिनने पर रोए नहीं, इस दुनिया में सचमुच बहुत दुर्लभ होता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. अधिवासितः न भवति का अर्थ है कि अनुभव चित्त पर कोई नया वासना-बीज नहीं छोड़ता। 2. प्रारब्ध-भोग केवल देह और इंद्रियों के स्तर पर होता है, साक्षी अप्रभावित रहता है। 3. अप्राप्त के प्रति निराकांक्षा ही तृष्णा-मुक्ति का सच्चा प्रमाण है। 4. गीता के २.७० ‘आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं’ के समान ज्ञानी समुद्र की भाँति अचल रहता है। 5. यह बाह्य संन्यास की कठोरता और सांसारिक लोलुपता के बीच का आदर्श संतुलन है। 6. साधक को भोगों के प्रति भय या लोलुपता के बजाय साक्षी-भाव विकसित करने की सीख मिलती है।
उदाहरण से समझें: जैसे पानी में तैरती बत्तख के पंखों पर पानी की बूँदें नहीं ठहरतीं, वैसे ही ज्ञानी के मन पर सांसारिक अनुभवों का कोई मैल नहीं चढ़ता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब किसी को बड़ा प्रमोशन या धन मिले और वह सामान्य रहे, और जब नुकसान हो जाए तब भी शांत रहे; तो यह उसी अनासक्ति का आधुनिक उदाहरण है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: जो मिले उसे बिना चिपके स्वीकार कीजिए, और जो न मिले उसकी कोई चिंता मत कीजिए; इसी संतुलन में सच्ची स्वतंत्रता है।
सामान्य गलतफहमी
तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘भोगेषु भुक्तेषु’ का अर्थ मनमाना उच्छृंखल आचरण करना नहीं है, बल्कि विधिपूर्वक प्राप्त सात्त्विक निर्वाह के प्रति अनासक्त रहना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज भोजन करते समय स्वाद का आनंद लें, लेकिन मन में कोई यह हठ न रखें कि "कल भी यही मिलना चाहिए।" (भोजन के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अच्छी चीजों का आदी होकर उनके छिन जाने के डर में जी रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट आँखें मूँदकर विचार करें: "जो आया वह भी प्रकृति का था, जो गया वह भी; मैं दोनों में निर्लेप साक्षी हूँ।"
एक पंक्ति में सार: जो मिले हुए भोगों में लिप्त नहीं होता और अनमिले की चाह नहीं रखता, वैसा पुरुष इस संसार में अत्यंत दुर्लभ है।
English
Translation: Rare in this world is that noble soul who is not conditioned by the pleasures he enjoys, and remains utterly free of desire for those he does not.
Simple explanation: The hallmark of true liberation is the absence of residual impressions (adhivāsana). Enjoying whatever life brings without becoming enslaved by it, and harboring no craving for what is absent, the sage embodies supreme psychological freedom.
विषय और संबंधित श्लोक
- अधिवासन-मुक्ति
- दुर्लभ-महात्मा
- निराकांक्षा
- सहज-स्वीकार
- श्लोक 17.3: स्वारामं हर्षयन्त्यमी।
- श्लोक 17.5: बुभुक्षुरिह संसारे।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का चौथा श्लोक।