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अध्याय 17 · मुक्त आचरण
अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.2
सत्यापित
मूल संस्कृत
न कदाचिज्जगत्यस्मिन् तत्त्वज्ञो हन्त खिद्यति । यत एकेन तेनेदं पूर्णं ब्रह्माण्डमण्डलम् ॥ २ ॥
IAST लिप्यंतरण
na kadācij jagaty asmin tattvajño hanta khidyati | yata ekena tenedaṃ pūrṇaṃ brahmāṇḍamaṇḍalam || 2 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
न, कदाचित्, जगति, अस्मिन्, तत्त्वज्ञः, हन्त, खिद्यति, यतः, एकेन, तेन, इदम्, पूर्णम्, ब्रह्माण्ड-मण्डलम्
- अस्मिन् जगति तत्त्वज्ञः
- इस संसार में आत्मतत्त्व को जानने वाला ज्ञानी
- कदाचित् न खिद्यति हन्त
- कभी भी दुखी या उदास नहीं होता, यह परम हर्ष की बात है
- यतः एकेन तेन
- क्योंकि उस अकेले एक आत्मस्वरूप से ही
- इदम् ब्रह्माण्ड-मण्डलम् पूर्णम्
- यह संपूर्ण ब्रह्मांड परिपूर्ण और व्याप्त है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
इस संसार में तत्त्वज्ञानी कभी भी दुखी नहीं होता; क्योंकि उस अकेले आत्मस्वरूप से ही यह संपूर्ण ब्रह्मांड परिपूर्ण है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: दुख और शोक सदा द्वैत (भेद) के कारण होते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे को देखता है, तो उसे हानि, अपमान या मृत्यु का भय सताता है। किंतु तत्त्वज्ञानी देखता है कि पूरे ब्रह्मांड में उसकी अपनी ही चेतना का विस्तार है। जब अपने से अलग कोई दूसरा है ही नहीं, तो किससे डरना और किस बात पर शोक करना? वह हर जगह अपने को ही देखकर सदा आनंद में रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
ज्ञानी व्यक्ति कभी उदास या दुखी क्यों नहीं होता? अष्टावक्र इसका बहुत सीधा और गहरा कारण बताते हैं।
इंसान तब दुखी होता है जब उसे लगता है कि कोई दूसरा उसका नुकसान कर देगा या उससे कुछ छीन लेगा। लेकिन जिस व्यक्ति ने यह जान लिया है कि पूरी दुनिया में एक ही परमात्मा या आत्मा है—और वह खुद वही आत्मा है—उसके लिए कोई पराया बचता ही नहीं।
जैसे सागर में पानी की हर बूँद सागर का ही हिस्सा है, वैसे ही पूरी सृष्टि अपनी ही चेतना में तैरती दिखाई देती है। जब सब अपना ही स्वरूप है, तो डर और दुख का कोई कारण ही नहीं बचता।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. दुख का मूल कारण द्वैत-भावना और पृथकता का भ्रम है (द्वितीयाद्वै भयं भवति)। 2. सर्वं खल्विदं ब्रह्म का अपरोक्ष अनुभव शोक और मोह का आत्यंतिक अंत कर देता है। 3. ब्रह्माण्डमण्डलम् पूर्णम् पद अद्वैत की व्यापकता और अखंडता का उद्घोष है। 4. ईशावास्योपनिषद् के सातवें मंत्र ‘तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः’ का यह प्रत्यक्ष प्रमाण है। 5. ज्ञानी की प्रसन्नता किसी बाह्य अनुकूलता पर नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय एकता के बोध पर टिकी है। 6. यह साधक को संकीर्ण व्यक्तिगत अहंकार से उठाकर विराट चैतन्य में प्रतिष्ठित करता है।
उदाहरण से समझें: जैसे अपने ही दोनों हाथों को ताली बजाते देखकर कोई यह नहीं सोचता कि दाएँ हाथ ने बाएँ को मारा, वैसे ही संपूर्ण जगत को अपना स्वरूप देखने वाले को कोई दुख नहीं होता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब हम किसी टीम या परिवार के सभी सदस्यों को अपना मान लेते हैं तो उनके सुख में भी अपना सुख देखते हैं; ज्ञानी इसी अपनत्व को पूरी सृष्टि पर लागू कर देता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: सारे दुख दूसरों से अलग महसूस करने के कारण हैं; जब आप सबमें अपनी ही आत्मा को देखेंगे, तो दुख टिक ही नहीं पाएगा।
सामान्य गलतफहमी
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘न कदाचित् खिद्यति’ का अर्थ यह नहीं है कि यदि कोई व्यक्ति गंभीर मानसिक अवसाद में हो तो उसे अकेला छोड़ दिया जाए; ऐसे में चिकित्सकीय सहायता अवश्य लें।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब किसी व्यक्ति से मतभेद या चिढ़ महसूस हो, तो मन में याद करें: "इसके भीतर भी वही एक चेतना है जो मेरे भीतर है।" (दिनभर)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अभी भी लोगों को ‘अपने’ और ‘पराए’ के खांचों में बाँटकर खुद ही अपने दुख का कारण बन रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट आँखें बंद करके अनुभव करें कि आपकी चेतना कमरे, शहर और पूरे ब्रह्मांड में फैली हुई है और सब कुछ आपके भीतर है।
एक पंक्ति में सार: तत्त्वज्ञानी संसार में कभी दुखी नहीं होता, क्योंकि उस एक अकेले आत्मस्वरूप से ही संपूर्ण ब्रह्मांड परिपूर्ण है।
English
Translation: Never indeed does the knower of truth grieve in this world, for by that one Self alone is this entire cosmic sphere pervaded.
Simple explanation: Grief is born of separation and the perceived presence of an "other." The knower of truth recognizes that the entire universe is filled with the singular reality of pure consciousness, dissolving the very root of sorrow.
विषय और संबंधित श्लोक
- सर्वव्यापकता
- अद्वैत-पूर्णता
- शोक-मुक्ति
- ब्रह्मांड-चेतना
- श्लोक 17.1: तेन ज्ञानफलं प्राप्तं।
- श्लोक 17.3: न जातु विषयाः केऽपि।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का दूसरा श्लोक।