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अध्याय 17 · मुक्त आचरण
अष्टावक्र गीता, श्लोक 17.20
सत्यापित
मूल संस्कृत
मनःप्रकाशसंमोहस्वप्नजाड्यविवर्जितः । दशां कामपि सम्प्राप्तो भवेद्गलितमानसः ॥ २० ॥
IAST लिप्यंतरण
manaḥprakāśasaṃmohasvapnajāḍyavivarjitaḥ | daśāṃ kām api samprāpto bhaved galitamānasaḥ || 20 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
मनः-प्रकाश-संमोह-स्वप्न-जाड्य-विवर्जितः, दशाम्, काम्, अपि, सम्प्राप्तः, भवेत्, गलित-मानसः
- गलित-मानसः
- जिसका मन सर्वथा विगलित (शांत और लीन) हो चुका है, वह पुरुष
- मनः-प्रकाश-संमोह-स्वप्न-जाड्य-विवर्जितः
- मन के प्रकाश (सत्त्वगुण), संमोह (रजोगुण) और स्वप्न-जड़ता (तमोगुण) से सर्वथा रहित होकर
- काम् अपि दशाम् सम्प्राप्तः भवेत्
- किसी अनिर्वचनीय, अलौकिक परम दशा को प्राप्त हो जाता है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
मन के प्रकाश (सत्त्व), मोह (रज) और स्वप्न-जड़ता (तम) से रहित, विगलित मन वाला पुरुष किसी अनिर्वचनीय परम दशा को प्राप्त होता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
सत्रहवें प्रकरण का उपसंहार करते हुए बाबू जालिमसिंह जी लिखते हैं: यह श्लोक जीवनमुक्ति की अंतिम पराकाष्ठा को प्रकट करता है। मन तीनों गुणों से बना है—सत्त्वगुण से प्रकाश, रजोगुण से संमोह और तमोगुण से स्वप्न व जड़ता उत्पन्न होती है। जब साधक का मन इन तीनों गुणों और उनकी अवस्थाओं से ऊपर उठ जाता है, तब उसका मन ‘गलितमानस’—अर्थात मन के रूप में न रहकर साक्षात चिदानंद ब्रह्म बन जाता है। वह एक ऐसी अलौकिक और अनिर्वचनीय दशा को प्राप्त होता है जिसका वर्णन किसी भाषा या शास्त्र में नहीं किया जा सकता; वह केवल स्वयं ही अनुभव की जा सकती है।
सरल हिन्दी में समझें
सत्रहवें प्रकरण के आखिरी श्लोक में अष्टावक्र बताते हैं कि जब किसी का मन पूरी तरह शांत हो जाता है, तो क्या होता है।
हमारा मन कभी बहुत खुश और हल्का होता है (सत्त्व), कभी बेचैन और लालची होता है (रज), और कभी आलसी और सुस्त हो जाता है (तम)। मन इन तीनों चक्रों में घूमता रहता है।
लेकिन जब ज्ञानी व्यक्ति इन तीनों गुणों से पार हो जाता है, तो उसका मन मन नहीं रहता, वह पूरी तरह परमात्मा में पिघल जाता है। वह एक ऐसी अद्भुत और गहरी शांति में पहुँच जाता है जिसका कोई नाम नहीं दिया जा सकता। वह बस शुद्ध आनंद में लीन हो जाता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. सत्रहवें प्रकरण की पूर्णाहुति: गुणातीत और मनोनाश की चरम अवस्था। 2. मनःप्रकाश (सत्त्व), संमोह (रज) और स्वप्नजाड्य (तम) तीनों गुणों के मानसिक कार्य हैं। 3. गलितमानसः का अर्थ है मन का आत्यंतिक लय (amanībhāva/मनोनाश), जहाँ कोई मानसिक संकल्प नहीं बचता। 4. दशां कामपि सम्प्राप्तः स्पष्ट करता है कि यह तुरीयातीत स्थिति अनिर्वचनीय और अपरोक्षानुभूति-गम्य है। 5. माण्डूक्योपनिषद् के सातवें मंत्र ‘नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं’ का यह जीवंत साक्षात स्वरूप है। 6. यह साधक को समस्त गुणों के पार अपनी शुद्ध चैतन्य सत्ता में सदा के लिए विश्राम देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे नमक की पुतली जब समुद्र की गहराई नापने जाती है तो वह खुद समुद्र के पानी में घुल जाती है, वैसे ही ज्ञानी का मन परमात्मा में लीन होकर स्वयं ब्रह्म बन जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप किसी बहुत सुंदर सूर्यास्त या पहाड़ को देखकर कुछ पलों के लिए इतने स्तब्ध हो जाते हैं कि मन में कोई विचार, चिंता या शब्द नहीं बचता, तो वह उसी विगलित मन की एक छोटी-सी झलक है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: सारे मानसिक विचारों, गुणों और चिंताओं को विदा कर दीजिए; जब मन पिघल जाएगा, तो केवल अखंड शांति और आनंद ही शेष रहेगा।
सामान्य गलतफहमी
आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘गलितमानसः’ का अर्थ मानसिक संतुलन खो देना या पागल हो जाना नहीं है; यह समस्त मानसिक तनावों से मुक्त होकर परम आनंद में स्थित होना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज रात सोने से पहले 5 मिनट के लिए अपने सारे विचारों को शांत हो जाने दें और उस मौन का अनुभव करें जो शब्दों से परे है। (रात को)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अभी भी मन के अच्छे और बुरे विचारों के फेर में फंसा हूँ, या मैं उन दोनों से परे अपने शांत स्वरूप को देख पा रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "सत्त्व, रज और तम केवल मन के रंग हैं; मैं वह रंगहीन, शुद्ध और शांत आकाश हूँ जिसमें सब विलीन हो जाता है।"
एक पंक्ति में सार: तीनों गुणों और मानसिक अवस्थाओं से रहित, शांत मन वाला पुरुष किसी अनिर्वचनीय परम दशा को प्राप्त हो जाता है।
English
Translation: Freed from mental luminosity, delusion, dream, and dullness, he whose mind is utterly dissolved attains a supreme, indescribable state.
Simple explanation: Transcending the three gunas—the clarity of sattva, the agitation of rajas, and the stupor of tamas—the sage experiences the dissolution of the mind itself (galitamānasa). He enters that unutterable, sublime state where only pure, unconditioned consciousness remains.
विषय और संबंधित श्लोक
- गलित-मानस
- गुणातीत
- मनोनाश
- अनिर्वचनीय-दशा
- श्लोक 17.19: कुर्वन्नपि करोति न।
- श्लोक 18.1: यस्य बोधोदये तावत्।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सत्रहवें प्रकरण का अंतिम श्लोक।