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प्रकरण 9: नौवाँ प्रकरणश्लोक १/८13%

अध्याय 9 · निर्वेद और विरक्ति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 9.1

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल नहीं छपा; भावार्थ के संदर्भ से)

कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा । एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद्भव त्यागपरोऽव्रती ॥ १ ॥

IAST लिप्यंतरण

kṛtākṛte ca dvandvāni kadā śāntāni kasya vā | evaṃ jñātveha nirvedād bhava tyāgaparo ’vratī || 1 ||

सरल उच्चारण: kritaakrite cha dvandvaani kadaa shaantaani kasya vaa evam jnyaatveha nirvedaad bhava tyaagaparo vratee (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

कृताकृते, च, द्वन्द्वानि, कदा, शान्तानि, कस्य, वा, एवम्, ज्ञात्वा, इह, निर्वेदात्, भव, त्यागपरः, अव्रती

कृताकृते
किया हुआ और न किया हुआ (कर्तव्य-अकर्तव्य का आग्रह)
द्वन्द्वानि
सुख-दुख जैसे जोड़े
कदा शान्तानि कस्य वा
किसके, कब शांत हुए हैं?
निर्वेदात्
विचारपूर्वक उपजे वैराग्य से
त्यागपरः
त्याग की ओर झुका हुआ
अव्रती
व्रत-आग्रह से रहित (पुस्तक: हठ-रहित)

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

किया और न किया हुआ तथा सुख-दुख के द्वन्द्व किसके, कब शांत हुए हैं? यह जानकर, यहाँ विचार से उपजे वैराग्य के कारण, तू त्याग में तत्पर और व्रत-आग्रह से रहित हो।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

पुस्तक के अनुसार यहाँ से निर्वेदाष्टक नाम का नौवाँ प्रकरण शुरू होता है। पहले शिष्य ने गुरु के प्रति अपना अनुभव कहा था; उसे दृढ़ करने के लिए गुरु अब आठ श्लोकों में वैराग्य का स्वरूप दिखाते हैं।

टीका प्रश्न उठाती है कि त्याग कैसे किया जाए। उत्तर में कहा गया है कि ‘यह मुझे अवश्य करना चाहिए और यह अवश्य नहीं करना चाहिए’ का जो हठ है, वही ‘कृत-अकृत’ का आग्रह है; और सुख-दुख के जोड़ों के बारे में यह आग्रह कि ‘मैं इनसे अवश्य मुक्त हो जाऊँ’ भी एक आग्रह है। देह धारण करने वाले किसी के लिए ये जोड़े कभी पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं और न होंगे। इसलिए गुरु जनक से कहते हैं कि कृत-अकृत के इस आग्रह को छोड़कर भी तू वैराग्य को प्राप्त हो, और किसी भी बात में हठ न रख।

आगे टीका वैराग्य की प्रेरणा के रूप में गर्भ में जीव के कष्ट, मृत्यु के समय के भय और संबंधों की डोर का लंबा वर्णन देती है, और स्त्री, पुत्र, धन आदि को बंधन का कारण बताती है। (इस प्रसंग में स्त्रियों के बारे में कठोर कथन और एक कथा तथा संतान और अन्य मतों पर टिप्पणियाँ हैं; उन्हें यहाँ शब्दशः नहीं उतारा गया।)

सरल हिन्दी में समझें

नौवाँ प्रकरण वैराग्य का प्रकरण है। पहली बात बहुत सीधी है: करने-न करने का हठ और सुख-दुख के जोड़े किसी के भी जीवन में कभी पूरी तरह शांत नहीं होते। इसलिए गुरु कहते हैं कि इस लड़ाई को जीतने की ज़िद छोड़ दे।

यहाँ ‘अव्रती’ का अर्थ पुस्तक ने ‘हठ-रहित’ लिया है। यह कर्तव्य या नैतिकता छोड़ने की छूट नहीं है। यह उस कसकर पकड़ी हुई ज़िद को ढीला करने की बात है कि ‘मुझे यही करना है और यह तो कभी नहीं’।

वैराग्य यहाँ विचार से आता है, भय या नफ़रत से नहीं। जो समझ बनी है, वह लगाव में बहने की जगह साफ़ देखने की ओर ले जाती है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक कहता है कि कृत-अकृत और सुख-दुख के द्वन्द्व किसी के लिए कभी शांत नहीं हुए, यह जानकर विचारपूर्वक वैराग्य अपनाया जाए। 2. यह द्वन्द्वों को जीत लेने की कोशिश को ही अंतिम समाधान मानने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह वैराग्य और आग्रह के छूटने के संबंध को प्रकट करता है। 4. अध्याय का पहला श्लोक है, जो वैराग्य का प्रवेश-द्वार है। 5. 8.4 में न पकड़ने और न छोड़ने की सहजता के बाद यहाँ उसका विचारजन्य आधार दिया गया है। 6. यह परम दृष्टि और व्यावहारिक मनोविज्ञान-जैसा विवरण दोनों है। 7. इसे संसार या शरीर से घृणा, या अपने दायित्व छोड़ने का उपदेश न समझें।

वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती।

उदाहरण से समझें: जैसे कोई समुद्र की लहरों को पूरी तरह रोकने की कोशिश छोड़कर तैरना सीख ले, वैसे द्वन्द्वों को मिटाने का हठ छोड़कर उनके बीच संतुलित रहा जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या

संपादकीय सहायक चित्र; यह श्लोक का शाब्दिक अर्थ नहीं है।

वैराग्य

वस्तु का उपयोग, पर उस पर मानसिक निर्भरता नहीं।

चित्र का वर्णन: एक खुली हथेली पर रखी गोल वस्तु, उँगलियाँ उसे जकड़ती नहीं।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति सोचता है कि जब तक हर चिंता खत्म न हो जाए, वह चैन से नहीं बैठेगा, और इसी दौड़ में थक जाता है। जब वह देखता है कि चिंताएँ पूरी तरह कभी खत्म नहीं होतीं, तब वह उन्हें साथ लेकर शांति से काम करना सीखता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: सुख-दुख के खत्म होने का इंतज़ार छोड़िए; उनके बीच संतुलन सीखना ही यहाँ वैराग्य है।

सामान्य गलतफहमी

पुस्तक की टीका में यहाँ स्त्रियों, अन्य मतों और कुछ प्रकार के शिक्षकों पर कठोर टिप्पणियाँ और कथाएँ हैं; वे इस पुनर्लेखन में शामिल नहीं की गईं। किसी व्यक्ति, लिंग, वर्ग या मत को निम्न ठहराना इस श्लोक की शिक्षा नहीं है। ‘अव्रती’ का अर्थ नैतिक या सामाजिक ज़िम्मेदारियों से छूट नहीं है। यहाँ गर्भ, मृत्यु या संबंधों के कष्ट का वर्णन किसी को डराने या जीवन से विमुख करने के लिए नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज एक ऐसा आग्रह खोजिए जिसमें आप ‘यह अभी होना ही चाहिए’ पर अटके हैं, और उसे एक दिन के लिए ‘हो जाए तो अच्छा’ में बदलकर देखिए। (लगभग 5 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: मैं किस सुख-दुख के जोड़े के खत्म होने का इंतज़ार कर रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठकर लिखिए: ‘मुझे अवश्य करना ही है’ वाली तीन बातें। हर एक के आगे लिखिए: ‘अगर यह आज न हो तो क्या सचमुच बिगड़ेगा?’ केवल देखिए।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: सुख-दुख के जोड़े कभी पूरी तरह शांत नहीं होते; इसलिए विचार से उपजे वैराग्य में टिकिए।

English

Translation: The pairs of done and undone, pleasure and pain: whose have ever come to rest? Knowing this, through dispassion be intent on renunciation, free of rigid vows.

Simple explanation: The chapter on dispassion opens by noting that the pairs of opposites never fully settle for anyone, so the stubborn demand that they must is released. It does not ask anyone to abandon duties or to hate the world.

विषय और संबंधित श्लोक

  • वैराग्य
  • निर्वेद
  • द्वन्द्व
  • आग्रह-त्याग
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 8.4: न पकड़ने न छोड़ने की सहजता।
  • श्लोक 9.4: द्वन्द्व हर अवस्था में बने रहते हैं।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 129–130 (PDF पृ. 136–137)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया। छपे मूल की पहली पंक्ति में ‘च’ के साथ एक अतिरिक्त मात्रा-जैसा चिह्न (‘चा’) दिखता है; पदच्छेद ‘च’ देता है, इसलिए ‘च’ पढ़ा गया। टीका के लंबे प्रसंग (जन्म-मृत्यु के कष्ट, स्त्री, संतान और अन्य मतों पर टिप्पणी) शामिल नहीं किए गए।