श्लोक 9.1
कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा । एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद्भव त्यागपरोऽव्रती ॥ १ ॥
सुख-दुख के जोड़े कभी पूरी तरह शांत नहीं होते; इसलिए विचार से उपजे वैराग्य में टिकिए।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअध्याय 9 · नौवाँ प्रकरण
आठ श्लोकों के इस ‘निर्वेदाष्टक’ में अष्टावक्र वैराग्य का स्वरूप बताते हैं: द्वन्द्वों का कभी न थमना, अनित्य चीज़ों पर टिकना छोड़ना, सहज प्राप्त में जीना, देह को भूत-मात्र देखना और वासनाओं को ढीला करना।
आठवें प्रकरण में अष्टावक्र ने बंध और मुक्ति की कसौटी दी थी और ‘मैं’ की पकड़ को उसकी जड़ बताया था। नौवें प्रकरण को पुस्तक ‘निर्वेदाष्टक’ कहती है। पुस्तक की भावार्थ-टीका बताती है कि पहले शिष्य ने जो अपना अनुभव कहा था, उसकी दृढ़ता के लिए गुरु अब आठ श्लोकों से वैराग्य का स्वरूप दिखाते हैं। इस प्रकरण में भी पुस्तक कोई वक्ता-लेबल नहीं छापती; संदर्भ से वक्ता अष्टावक्र हैं।
आठ श्लोक एक सीधी राह बनाते हैं। पहला श्लोक कहता है कि करने-न करने और सुख-दुख के द्वन्द्व किसी के लिए कभी पूरी तरह शांत नहीं हुए (9.1)। दूसरा बताता है कि लोक-चेष्टा को देखने से जीने, भोगने और जानने की इच्छाएँ शांत होती हैं (9.2)। तीसरा सब कुछ अनित्य और तापों से दूषित जानकर शांत होने की बात करता है (9.3)। चौथा कहता है कि द्वन्द्व हर अवस्था में बने रहते हैं, इसलिए सहज प्राप्त में जिया जाए (9.4)। पाँचवाँ महर्षियों के भी अलग-अलग मतों को देखकर वैराग्य की बात करता है (9.5)। छठा सच्चे मार्गदर्शक का लक्षण देता है और आत्म-पुरुषार्थ पर ज़ोर देता है (9.6)। सातवाँ देह-इन्द्रियों को भूत-मात्र देखकर स्वरूप में स्थित होने की विधि बताता है (9.7)। आठवाँ सारे प्रकरण को वासना-त्याग में समेटता है (9.8)।
पढ़ने से पहले दो सावधानियाँ। पुस्तक की टीका में इस प्रकरण में जन्म-मृत्यु के भयावह वर्णन, स्त्रियों पर कठोर कथन और कथाएँ, अन्य मतों, परंपराओं और कुछ प्रकार के शिक्षकों पर कठोर टिप्पणियाँ हैं; उन्हें यहाँ शब्दशः नहीं दोहराया गया है और किसी व्यक्ति, लिंग, वर्ग या मत को निम्न ठहराना इस पुनर्लेखन का उद्देश्य नहीं है। और ‘जीने की इच्छा का शांत होना’ जैसी पंक्तियाँ उदासी या जीवन-विरोध के रूप में न पढ़ें।
मैं वैराग्य किसे कहता हूँ, और क्या वह संसार से घृणा है या पकड़ का ढीला होना?
पुस्तक के अनुसार वैराग्य संसार के पदार्थों में ग्लानि और दोष-दृष्टि नहीं, बल्कि विचार से उपजा वह निर्वेद है जो द्वन्द्वों, अनित्य चीज़ों और मतों की बहुलता को साफ़ देखकर पकड़ ढीली करता है। द्वन्द्व हर अवस्था में बने रहते हैं, इसलिए उन्हें मिटाने का हठ छोड़कर सहज प्राप्त में जिया जाता है। अंतिम समझ अपने ही पुरुषार्थ से आती है; गुरु सहारा है। देह-इन्द्रियों को भूत-मात्र देखने से स्वरूप-स्थिति खुलती है, और संसार का सार वासनाओं के ढीले होने में बताया गया है। यह परम दृष्टि है; व्यावहारिक जीवन में कर्तव्य, देखभाल, स्वास्थ्य और ज़िम्मेदारियाँ बनी रहती हैं, और वैराग्य को निराशा या घृणा न समझें।
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कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा । एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद्भव त्यागपरोऽव्रती ॥ १ ॥
सुख-दुख के जोड़े कभी पूरी तरह शांत नहीं होते; इसलिए विचार से उपजे वैराग्य में टिकिए।
पूरी व्याख्या पढ़ेंकस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात् । जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमं गता ॥ २ ॥
लोक-चेष्टा को ध्यान से देखने पर जीने, भोगने और जानने की बेचैन पकड़ ढीली हो जाती है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रितयदूषितम् । असारं निन्दितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति ॥ ३ ॥
जो बदलने वाला और ताप-युक्त है, उसे अंतिम सहारा न मानने से मन शांत होता है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंकोऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम् । तान्युपेक्ष्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ ४ ॥
द्वन्द्व हर अवस्था में हैं; उनकी उपेक्षा कर सहज प्राप्त में जीना ही सिद्धि का मार्ग है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंनाना मतं महर्षीणां साधूनां योगिनां तथा । दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः ॥ ५ ॥
मतों की बहुलता देखकर वैराग्य उपजे तो मन शांत होता है; अपने अनुभव पर टिकना सहारा है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंकृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः । निर्वेदसमतायुक्त्या यस्तारयति संसृतेः ॥ ६ ॥
सच्चा मार्गदर्शक वैराग्य और समता से तारता है; पर समझ का अंतिम कदम अपना ही है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंपश्य भूतविकारांस्त्वं भूतमात्रान् यथार्थतः । तत्क्षणाद्बन्धनिर्मुक्तः स्वरूपस्थो भविष्यसि ॥ ७ ॥
देह-इन्द्रियों को केवल भूतों की हलचल देखने से ‘मैं’ की पकड़ ढीली होकर स्वरूप-स्थिति दिखती है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंवासना एव संसार इति सर्वा विमुञ्च ताः । तत्त्यागो वासनात्यागात् स्थितिरद्य यथा तथा ॥ ८ ॥
बंधन वासनाओं में है; उन्हें ढीला कर, जैसी स्थिति हो उसमें सहज रहना वैराग्य की परिणति है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंनौवाँ प्रकरण वैराग्य का प्रकरण है। पहले बताया गया कि सुख-दुख के जोड़े कभी पूरी तरह नहीं थमते, इसलिए उन्हें मिटाने की ज़िद छोड़ें। फिर कहा गया कि लोक-चेष्टा को देखने से इच्छाएँ शांत होती हैं और अनित्य चीज़ों पर अंतिम सहारा टिकाना ढीला पड़ता है। द्वन्द्व हर अवस्था में हैं, इसलिए सहज प्राप्त में जिया जाए। मतों की बहुलता देखकर अपने अनुभव पर टिकने की बात आती है, और सच्चे मार्गदर्शक का लक्षण बताते हुए यह भी याद दिलाया जाता है कि अंतिम कदम अपना है। देह-इन्द्रियों को भूत-मात्र देखने की विधि के बाद प्रकरण वासना-त्याग पर पूरा होता है। यह परम दृष्टि है; इसमें कर्तव्य, देखभाल और संवेदना की जगह बनी रहती है, और इसे निराशा या घृणा नहीं समझना चाहिए।
पाँच मिनट आराम से बैठिए। अपनी तीन चाहतें याद कीजिए और हर एक के आगे लिखिए या सोचिए: ‘यह बाँधती है, या चलाती है?’ फिर देखिए कि इन्हें देखने वाली जगह कैसी है। निष्कर्ष की जल्दी न करें। यह कोई चिकित्सा या उपचार नहीं, केवल एक चिंतन-अभ्यास है। कोई असुविधा या भारीपन बढ़े तो तुरंत रुकें और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात करें।
पुस्तक में इस प्रकरण में वक्ता का नाम छपा नहीं है। भावार्थ के संदर्भ से वक्ता अष्टावक्र हैं, जो शिष्य के अनुभव को दृढ़ करने के लिए वैराग्य का स्वरूप दिखाते हैं।
पुस्तक के अनुसार यह आठ श्लोकों का प्रकरण है जो निर्वेद यानी विचार से उपजे वैराग्य का स्वरूप दिखाता है।
नहीं। यह पकड़ और बाध्यकारी लगाव का ढीला होना है। देखभाल, कर्तव्य और संबंध बने रहते हैं।
नहीं। यह जीने की बेचैन पकड़ का ढीला होना है। यदि निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें और किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें।
पुस्तक अंतिम कदम को अपना कहती है, पर सच्चे मार्गदर्शक को तारने वाला भी कहती है। यह शिक्षकों के अनादर का उपदेश नहीं है।
टीका में स्त्रियों, अन्य मतों और कुछ प्रकार के शिक्षकों पर कठोर टिप्पणियाँ और कथाएँ हैं। उन्हें शब्दशः नहीं उतारा गया, क्योंकि किसी व्यक्ति या वर्ग को निम्न ठहराना इस पुनर्लेखन का उद्देश्य नहीं है; शिक्षा का सार सुरक्षित रखा गया है।