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प्रकरण 9: नौवाँ प्रकरणश्लोक ३/८38%

अध्याय 9 · निर्वेद और विरक्ति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 9.3

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल नहीं छपा; भावार्थ के संदर्भ से)

अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रितयदूषितम् । असारं निन्दितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति ॥ ३ ॥

IAST लिप्यंतरण

anityaṃ sarvam evedaṃ tāpatritayadūṣitam | asāraṃ ninditaṃ heyam iti niścitya śāmyati || 3 ||

सरल उच्चारण: anityam sarvam evedam taapatritayadooshitam asaaram ninditam heyam iti nishchitya shaamyati (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

अनित्यम्, सर्वम्, एव, इदम्, तापत्रितयदूषितम्, असारम्, निन्दितम्, हेयम्, इति, निश्चित्य, शाम्यति

अनित्यम्
अस्थायी
तापत्रितयदूषितम्
तीन प्रकार के तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक दुख) से दूषित
असारम्
सार-रहित
निन्दितम्
निंदित
हेयम्
त्याज्य (छोड़ने योग्य)
निश्चित्य शाम्यति
ऐसा निश्चय कर शांत हो जाता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

यह सब अनित्य है, तीन तापों से दूषित है, सार-रहित, निंदित और त्याज्य है; ऐसा निश्चय करके मनुष्य शांत हो जाता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

पुस्तक के अनुसार जितना दृष्टि का विषय यह प्रपंच है, वह सब अनित्य है, यानी चेतन में आरोपित है। टीका बताती है कि यह प्रपंच तीन तापों से दूषित है: शरीर और मन के कारण होने वाला आध्यात्मिक दुख (वात-पित्त-कफ के दोष, और काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या जैसे मानसिक दुख), मनुष्य-पशु-सर्प आदि से मिलने वाला आधिभौतिक दुख, और दैवी कारणों से होने वाला आधिदैविक दुख। इन तीन तापों से पुरुष सदा संतप्त रहता है, इसी कारण पुस्तक इस प्रपंच को असार और त्यागने योग्य कहती है। यह जानकर ज्ञानवान् किसी पदार्थ की इच्छा नहीं करता।

सरल हिन्दी में समझें

यह श्लोक बताता है कि जिन चीज़ों को हम सब कुछ मानकर पकड़ते हैं, वे बदलने वाली हैं और उनके साथ तीन तरह का ताप जुड़ा रहता है: शरीर-मन का, आसपास के लोगों और प्राणियों का, और प्रकृति-परिस्थितियों का। यह देख लेने पर मन उनके पीछे भागना कम करता है और शांत होता है।

यहाँ ‘निंदित’ और ‘हेय’ का अर्थ दुनिया, शरीर या किसी व्यक्ति से घृणा नहीं है। इसका अर्थ है कि उन पर टिककर अंतिम सुख खोजना छोड़ दिया जाए। देखभाल, कर्तव्य और संबंध फिर भी निभाए जाते हैं, बस उनसे मन को अंतिम सहारा नहीं माना जाता।

यदि आप स्वयं बहुत थके या निराश हैं, तो यह श्लोक आपका उपचार नहीं है; किसी से बात कीजिए।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक कहता है कि यह सब अनित्य और तीन तापों से दूषित है, यह निश्चय करके मनुष्य शांत होता है। 2. यह अनित्य चीज़ों को अंतिम सहारा बनाने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह अनित्य जगत् और शांत चित्त के संबंध को प्रकट करता है। 4. वैराग्य के आठ श्लोकों में तीसरा है, जो वैराग्य का कारण देता है। 5. 9.2 की इच्छा-शांति के लिए यहाँ अनित्यता का कारण बताया गया है। 6. यह परम दृष्टि है; यह जगत् की निंदा का नहीं, पकड़ ढीली करने का उपदेश है। 7. इसे संसार, शरीर या किसी व्यक्ति से घृणा का आधार न बनाएँ।

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें।

उदाहरण से समझें: जैसे रेत का महल बच्चे को सुंदर लगता है पर समझदार जानता है कि लहर आते ही वह बह जाएगा, वैसे अनित्य चीज़ों में अंतिम सहारा ढूँढने की भूल समझ आने लगती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या

संपादकीय सहायक चित्र; यह श्लोक का शाब्दिक अर्थ नहीं है।

वैराग्य

वस्तु का उपयोग, पर उस पर मानसिक निर्भरता नहीं।

चित्र का वर्णन: एक खुली हथेली पर रखी गोल वस्तु, उँगलियाँ उसे जकड़ती नहीं।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति देखता है कि हर नई उपलब्धि थोड़ी देर बाद पुरानी लगने लगती है और अगली की भूख जग जाती है। जब वह इसे साफ़ देख लेता है, तो वह हर चीज़ से कम माँगता है और काम का आनंद लेना जारी रखता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: जो बदलने वाला है, उसे अंतिम सहारा मत बनाइए; उसका आदर कीजिए, पर उस पर पूरा भार मत डालिए।

सामान्य गलतफहमी

पुस्तक में यहाँ ‘निंदित’ और ‘हेय’ शब्द आए हैं, पर इनसे दुनिया, शरीर या किसी वर्ग से घृणा सिखाना श्लोक का उद्देश्य नहीं है। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज किसी एक चीज़ के बारे में पूछिए: ‘अगर यह कल न रहे तो क्या मेरी शांति भी चली जाएगी?’ और उत्तर केवल देखिए। (लगभग 5 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: मैंने किस अस्थायी चीज़ को अपना अंतिम सहारा बना रखा है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट के लिए अपनी तीन प्रिय चीज़ों की सूची बनाइए और हर एक के आगे लिखिए: ‘इस पर कितना भार रखा है?’ हल्का करने का कोई उपाय जल्दी में न चुनिए।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: जो बदलने वाला और ताप-युक्त है, उसे अंतिम सहारा न मानने से मन शांत होता है।

English

Translation: All this is impermanent, afflicted by threefold suffering, without essence and to be let go of; having determined this, one finds calm.

Simple explanation: Seeing clearly that the world of experience is changing and troubled by three kinds of suffering, the mind stops depending on it as its final support and becomes calm. It does not teach contempt for the world, the body or any person.

विषय और संबंधित श्लोक

  • अनित्यता
  • वैराग्य
  • तापत्रय
  • शांति
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 9.2: इच्छा-शमन की प्रक्रिया।
  • श्लोक 9.4: द्वन्द्व हर अवस्था में बने रहते हैं।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 135–137 (PDF पृ. 142–144)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया। बाहरी स्रोत से कोई पाठ नहीं जोड़ा गया।